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परदेसी...जाना नहीं

प रदेसी...जाना नहीं     (एक) एयर इण्डिया का वायुयान पालम के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से अमेरिका के लिए उड़ चला. डबडबाई आँखों में बेटे के विछोह का भाव था तो उन आँखों में आशा की उम्मीद भी थी, ‘हरीश का भविष्य वहां संवर जाएगा.’ दयालदास    ने धीमी आवाज में किरण से कहा. किरण रो रही थी, उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, वह सुबकते रही. जाते समय हरीश के चेहरे पर खुशी दिखाई पड़ रही थी क्योंकि वह अमेरिका पढ़ने के लिए जा रहा था, उसे क्या पता कि उसकी माँ के मन की हालत कैसी है?  अपने बच्चे को इतनी दूर भेजना, वह भी अनिश्चित काल के लिए, एक माँ के लिए कितना दुखदायक होता है, उसे केवल माँ को ही समझती है.   दोनों टैक्सी में बैठकर हज़रत निजामुद्दीन स्टेशन की ओर निकल पड़े जहाँ से उन्हें अनुपपुर जाने के लिए ट्रेन मिलने वाली थी, वहां से १४ किलोमीटर की दूरी पर उनका गाँव था जैतहरी, वहां तक जाना था.  पालम हवाई अड्डे से हज़रत निजामुद्दीन स्टेशन बहुत दूर है. रास्ते में ट्रेफिक जाम था, किसी प्रकार डेढ़ घंटे में स्टेशन आया. वहां पता चला कि उत्कल एक्सप्रेस प्लेटफार्म नंबर १२ पर आए...