(एक)
एयर इण्डिया का वायुयान पालम के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से अमेरिका के लिए उड़ चला. डबडबाई आँखों में बेटे के विछोह का भाव था तो उन आँखों में आशा की उम्मीद भी थी, ‘हरीश का भविष्य वहां संवर जाएगा.’ दयालदास ने धीमी आवाज में किरण से कहा. किरण रो रही थी, उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, वह सुबकते रही. जाते समय हरीश के चेहरे पर खुशी दिखाई पड़ रही थी क्योंकि वह अमेरिका पढ़ने के लिए जा रहा था, उसे क्या पता कि उसकी माँ के मन की हालत कैसी है? अपने बच्चे को इतनी दूर भेजना, वह भी अनिश्चित काल के लिए, एक माँ के लिए कितना दुखदायक होता है, उसे केवल माँ को ही समझती है. दोनों टैक्सी में बैठकर हज़रत निजामुद्दीन स्टेशन की ओर निकल पड़े जहाँ से उन्हें अनुपपुर जाने के लिए ट्रेन मिलने वाली थी, वहां से १४ किलोमीटर की दूरी पर उनका गाँव था जैतहरी, वहां तक जाना था. पालम हवाई अड्डे से हज़रत निजामुद्दीन स्टेशन बहुत दूर है. रास्ते में ट्रेफिक जाम था, किसी प्रकार डेढ़ घंटे में स्टेशन आया. वहां पता चला कि उत्कल एक्सप्रेस प्लेटफार्म नंबर १२ पर आएगी. धूप तेज थी, टैक्सी में ए.सी. था, कुछ पता नहीं चला लेकिन अब दिल्ली के मौसम का पता चल रहा था. फुट ओवर ब्रिज तक जाने के लिए पहले तीस सीढ़ियाँ चढ़ो, उसके बाद लम्बी पैदल यात्रा, फिर उतनी सीढ़ियाँ उतरो, फिर ट्रेन के डिब्बे तक पहुँचाने के लिए पैदल यात्रा, घुटनों में दर्द बढ़ गया, पसीना चुचुआने लगा. दोनों थक-हार कर कोई बैठने की जगह खोजने लगे लेकिन नहीं दिखी इसलिए वहीं एक खम्भे के पास खड़े रह गए और ट्रेन के आने का इंतज़ार करने लगे. उद्घोषणा हुई, ट्रेन एक घंटा विलम्ब से चल रही है, बेचैनी और बढ़ गयी, गर्मी भी तेज होते जा रही थी. दोनों एक-दूसरे की ओर धीरे से चुपचाप देखते और फिर अनदेखा करने की मुद्रा में आ जाते. इतने में ट्रेन आ गयी. दोनों स्लीपर कोच में अपनी आरक्षित सीट पर बैठ गए. कुछ देर में किरण के आंसुओं से चुप्पी टूटी. ‘मत रो किरण, कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है. फिर, अपने साथ सतीश है, मनीषा है न!’ दयालदास ने समझाने की कोशिश की. बात सुनकर किरण के आंसू थमने लगे. वैसे भी, आंसुओं के आने की सीमा होती है, कोई कितना रोएगा, कब तक रोएगा? दुःख को दूर करने के लिए समय से बड़ा वैद्य कोई और नहीं है. वह क्षणिक आवेग जब थम जाता है तब जिंदगी उस दुःख को छोड़कर अपने रास्ते में चल पड़ती है.
(दो)
हरीश पढ़ने में तेज था. तेज क्या, उसमें पढ़ाई के प्रति लगन थी. दिन-रात किताबों में घुसा रहता था. न खेल-कूद के प्रति उसमें रूचि थी, न ही व्यापार में. वह अपनी कक्षा में सर्वोच्च अंक हासिल करता रहा और उसने अपनी प्रतिभा से यह पहले ही सिद्ध कर दिया कि वह जैतहरी में नहीं रहने वाला. वैसे तो जैतहरी उसकी मातृभूमि है, उसे प्यार है लेकिन वहां का वातावरण उसे पसंद नहीं था. एक तो उसकी किसी से दोस्ती नहीं हुई, केवल कुछ लोगों से जान-पहचान थी, दूसरा वह जिससे भी मिलता वह या तो राजनीति की बात करता या पैसे की. व्यक्तिगत उन्नति की बात जैसे उनके सिलेबस में थी ही नहीं. वह दौड़ती-भागती आधुनिक दुनिया के संग कदमताल करना चाहता था इसलिए उसे समझ में आया कि शिक्षा ही वह जरिया है जो उसे उसकी उन्नति की राह दिखाएगा, उसने स्वयं को पढ़ाई में झोंक दिया.
जैतहरी छोटी सी बस्ती है जो कभी एक गाँव हुआ करता था, यहाँ कम लोग बसते थे, खपरैल वाले घर थे, एक-दूसरे से सरोकार हुआ करता था. चूल्हे में जल रही लकड़ी की आंच में जब बटुओं में चांवल-दाल पका करता था तो उसकी खुशबू आसपास के घरों में फैलती तो सबको खबर हो जाती कि किसके घर में भोजन की तैयारी चल रही है. कस्तूरी के चौके में भात पक कर तैयार हो चुका था, बस, उसे पसाना बाकी था. सब्जी कटी हुई रखी थी, चूल्हा खाली हो तो कढ़ाही चढ़े. एक चूल्हे में दाल खौल रही है. भात के बटुए के मुंहाने में कपड़ा लपेट कर उसे एक खाली बर्तन में पलट दिया, धीरे-धीरे उसका गर्म पानी रिसने लगा. कुछ क्षणों में जितना निकलना था, निकल गया और उसने बटुए को सीधा करके उसके ऊपर एक तश्तरी ढँक दी. अब सब्जी छौंकने की बारी थी. आज भिन्डी पकने जा रही है. चूल्हे की लकड़ी को थोड़ा व्यवस्थित किया, कढ़ाही चढ़ाया, उसमें ज़रा सा घी डाला, जीरा डालकर उसे तड़काया, उसके बाद भिन्डी के छोटे-छोटे टुकड़ों को डाल दिया. गरम मसाला, लाल मिर्च, अमचुर और नमक डालकर उसे तश्तरी से ढँक कर पकने के लिए छोड़ दिया. आंच की तपिश से परेशान होकर कस्तूरी वहां से उठी और घर के बाहर चबूतरे में खड़ी हो गई. बालों को अपने हाथों से ठीक किया और साड़ी के आँचल से अपना सिर ढँक लिया ताकि सड़क पर आते-जाते किसी पुरुष की नज़र उसके खुले सिर पर न पड़े. अचानक उसकी नज़र सामने वाले घर पर पड़ी. दरवाजा खुला था लेकिन सन्नाटा था वहां. कच्ची सड़क पार करके वह वहां पहुँच कर सांकल बजाया और पुकारा, ‘प्रभा ओ प्रभा.’ प्रभा सामने आई तो उसने पूछा, ‘खाना पका ली?’ प्रभा के चेहरे पर उदासी छा गई, कुछ जवाब उसके मुंह से नहीं निकला, आँखों से आंसू भर आए.
‘क्या बात है?’ कस्तूरी ने पूछा.
‘अभी तक नहीं.’ प्रभा बुदबुदाई.
‘तो कब बनेगा?’
‘जब घर में सामान होगा.’
‘क्या मतलब?’
‘आज चावल का कनस्तर खाली पड़ा है, कोई सब्जी भी नहीं है घर में.’
‘चल, मेरे साथ.’ कस्तूरी उसका हाथ पकड़ कर अपने घर की ओर ले गई. एक दौरी में चार-पांच दिन तक पकाने लायक चांवल और एक बड़े साइज की लौकी देकर बोली. ‘अभी इसे ले जा और पका ले. बाद में और जब जरूरत होगी तो मेरे पास आ जाना, संकोच मत करना. कहते हैं, घर का चूल्हा रोज जलना चाहिए, नहीं तो देवता नाराज हो जाते हैं.’
‘देवता तो मुझसे वैसे ही रूठे हुए हैं. ये जब से बीमार हुए हैं, घर में ही रहते हैं. लड़का बिलासपुर में कहीं नौकरी पर लगा हुआ है. बीच-बीच में मनीऑर्डर भेजते रहता है, जब पैसा ख़तम हो जाता है तो चूल्हा बुझ जाता है दीदी? कल रात को बिना खाए-पिए सोए हम लोग.’
‘अरे, बताना था, हम लोग मर गए थे क्या?’
‘कैसे बताती दीदी, घर की दुर्दशा कैसे बताती? कभी-कभार की बात हो तो बता सकती हूँ, रोज का हाल है यह.’ प्रभा का बोलते-बोलते गला रूंध गया.
‘देख, मैं भी इस स्थिति को भोग चुकी हूँ. मैं जानती हूँ कि घर में जब कुछ नहीं रहता तो कुछ हो न हो, किसी को बताने में मन में कितनी झिझक रहती है. अब जा, चूल्हा जला और खाना पका ले, कल रात से भूखे हो तुम लोग.’ कस्तूरी ने उसके कंधे में हाथ रखते हुए कहा. साड़ी के पल्लू से आँखें पोछते हुए प्रभा सड़क पार करने लगी, उसी समय ठंडी हवा का एक झोंका नाचता हुआ सा उन दोनों के बीच से गुजरा. शहर और गाँव में यही अंतर है. शहर में आम तौर पर किसी को किसी से कोई मतलब नहीं रहता लेकिन गाँव में हर एक का ध्यान हर एक रखता है.
जैतहरी को न तो शहर कहा जा सकता है, न गाँव, बीच में है. आबादी कम है इसलिए शहर नहीं है, पर गाँव भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि पूरी बस्ती में शहर का असर दिखाई देने लगा है. पुरुषों ने कुरता-धोती पहनना छोड़ दिया है, अब पेंट-शर्ट में दिखाई देते हैं, लेकिन महिलाएं अभी साड़ी-ब्लाउज अपनाए हुए हैं. पुरुष पहले भी निर्लज्ज थे, अब भी निर्लज्ज हैं जबकि स्त्रियाँ पहले की तरह अभी भी सिर पर हल्का सा पल्लू ओढ़ कर, अपना सिर झुकाकर घर से बाहर निकलती हैं. बाजार में खरीदी का जिम्मा पुरुषों के हाथ में यथावत चला आ रहा है और घर की व्यवस्था स्त्रियों के जिम्मे है. बच्चे स्कूल जाते हैं और खाली समय में घर के बाहर चौकड़ी लगाते रहते हैं, गिल्ली-डंडा, टीप-रेस, हाकी-फ़ुटबाल-क्रिकेट में व्यस्त रहते हैं. बहुत कम बच्चे हैं जिनका पढ़ाई में मन लगता है, अधिकतर स्कूल की पढ़ाई को बचपन से युवावस्था के बीच टाइम-पास-एक्टिविटी मानते हैं. वे जल्दी बड़े होना चाहते हैं ताकि उनकी बात सुनी जा सके, उनका भी दबदबा हो, वे अपने मन की कर सकें, अपना रोजगार चुन सकें और उनकी अपनी गृहस्थी सज सके. माता-पिता का दखल असहनीय है लेकिन सहना पड़ता है, क्या करें? जब तक अपने पैरों पर खड़े नहीं होते तब तक सहना होगा. उनकी एक और समस्या है, लड़कियों को लड़कों के संग खेलने की मनाही है जबकि वे साथ-साथ बड़े हुए हैं, अब भी साथ चाहते हैं तो उनको यह समझ नहीं आता कि ऐसी रोक-टोक क्यों?
हरीश के घर का माहौल वैसा था जैसा देहाती व्यापारियों के घर का होता है. चालीस-पचास साल पहले बना हुआ घर जिसे पत्थर और मुरम से बनी नींव पर खड़ा किया गया था. सामने किराने की दुकान थी और पीछे रहवास था. यहाँ दो छोटे कमरे थे जिसमें से एक में दयालदास और किरण सोते थे, दूसरे में उनकी बेटी मनीषा और दोनों कमरों के बीच खाली जगह पर उनकी रसोई पकती थी. घर के पीछे की खाली पड़ी जमीन पर कब्जा किया हुआ था जिसमें एक लेट्रिन और एक नहानी घर था. नीचे के रहवास के ऊपर लकड़ी का पटाव डालकर एक मंजिल और बनाई गयी थी जिसमे चढ़ने के लिए लकड़ी की सीढ़ी थी. इसका उपयोग सतीश और हरीश किया करते थे. घर क्या था, इधर-उधर बिखरे सामानों की प्रदर्शनी थी. यह घर येन-केन-प्रकारेण जमीन खरीद कर दयालदास के पिता वरियलदास ने बनवाया था.
वरियलदास भारत-पाकिस्तान बंटवारे के समय पाकिस्तान के सिंध प्रांत के एक गाँव से अपनी और अपने परिवार की जान बचाकर भारत आए थे. अपने बच्चे दयालदास को गोद में लिए पहले पैदल, फिर बैलगाड़ी और उसके बाद एक ट्रेन में किसी प्रकार घुस कर भारत की ओर बढ़ चले. कई दिनों की यात्रा के बाद ट्रेन चलते-चलते एक स्टेशन में रुक गई जहाँ सारे यात्रियों को उतार दिया गया. ट्रेन से उतरकर वरियलदास ने देखा तो उसे नाम समझ में नहीं आया क्योंकि उसे हिंदी या अंग्रेजी समझ में नहीं आती थी, वह थोड़ी-बहुत उर्दू जानता था. एक ने स्टेशन का नाम बताया, जैतहरी. ट्रेन में बहुत से सिन्धी परिवार उतरे थे, कुछ जैतहरी में रुक गए और कुछ वहां से बैलगाड़ियों के माध्यम से आसपास के गाँव अनुपपुर, वेंकट नगर, गौरेला की ओर निकल गए. वरियलदास की हिम्मत कहीं आगे जाने की नहीं हुई इसलिए वह जैतहरी में ही रुक गया. जैतहरी छोटा सा गाँव था, यही हजार-पांच सौ की आबादी वाला. यहाँ पर राठौर बड़ी संख्या में और बनिया, ब्राह्मण, ठाकुर, लुहार, कुम्हार, कोल जाति के लोग भी रहते थे लेकिन उनकी आबादी कम थी. भूख और प्यास से व्याकुल वरियलदास और उसका परिवार निढाल होकर रेलवे प्लेटफार्म के एक कोने में टिक कर बैठ गया तब ही कुछ लोग उनके सामने टुकनियों में भोजन लेकर प्रकट हुए. उन्होंने दोने में रखकर पूरी और आलू की सब्जी उन्हें दी, मिट्टी से बने कुल्हड़ में पानी दिया. वरियलदास जो किसी समय सिंध में बड़ा आदमी माना जाता था, बहुत सफल व्यापारी था, आज मदद का मोहताज हो गया था. त्वरित गति से उसने तीन दोने लिए, एक बेटे को, दूसरा पत्नी को और तीसरा खुद लेकर खाने लगा. अब जैतहरी ही उनका वर्तमान था और भविष्य भी.
अनाज पेट में गया तो अक्ल ने काम करना शुरू किया. हाथ-मुंह धोकर वरियलदास ने चारों ओर नज़र घुमाई तो उसे रेल की पटरी के उस पार बस्ती दिखाई पड़ी. वे सब उठ खड़े हुए और थके हुए पाँव के बल पर उस अंजान बस्ती की ओर चल पड़े. बरसात के दिन थे, कोई छांह मिल जाती तो अच्छा रहता. पूछते-खोजते सड़क के किनारे एक झोपड़ीनुमा मकान में आसरा मिल गया जिसका किराया सवा रूपए माहवार था. वरियलदास की पत्नी अपने जेवर अपनी कमर में साफा बाँध कर पाकिस्तान से चोरी-छिपे लाने में सफल हो गई थी, वही पूँजी उनके हाथ में थी, उसी का सहारा था. दरवाजे की सांकल खोली और दो गठरियों के साथ उस मकान में घुस गए. ट्रेन में उकडू बैठे-बैठे कई दिन हुए, कई रातें बीत गई, अब कमर सीधा करना जरूरी लगा. जमीन में दो चादर बिछा कर वे सब सो गए. सुबह देर तक सोते रहे, जब वरियलदास के नींद खुली तो सूरज बीच आसमान में लटका हुआ था. उसने पत्नी और बेटे को जगाया. बाहर निकल कर देखा, नया देश, नया भेष, नयी धूप और नयी हवा. सिंध और यहाँ के माहौल में बहुत अंतर है. वहां इस मौसम में सूरज इतना तपता नहीं था और हवा में ठंडक रहती थी, यहाँ एकदम उल्टा. मकान के तीन तरफ निर्जन था, कुछ पेड़ लगे हुए थे जिन्हें देखकर ऐसा मालूम होता था जैसे वे बिना देखरेख के बच्चों की तरह बढ़ रहे हैं. सौ-डेढ़सौ कदम पर एक तालाब था, वहां स्नानादि करके वे वापस आए, अब भूख सताने लगी. भारतीय मुद्रा हाथ में नहीं थी, सोने के एक जोड़ी झुमके लेकर वे बाजार की और गए, सुनार की दुकान दिखी. वहां उसे बेचा, जो पैसा मिला, उसे आधा-आधा करके अपने-अपने अधोवस्त्र में गाँठ में संभाल कर रख लिया. अनाज की दुकान से गेहूं, दाल, घी, नमक, मिर्च और माचिस लिया, कुम्हार से खाना बनाने के काम में आने वाले मिट्टी के बर्तन और पानी रखने का मटका खरीदा और अपने घर पहुँच गए. घर के आसपास कुछ मिट्टी की ईंटें मिल गई, उनसे चूल्हा बना, पीछे से लकड़ी की सूखी टहनियां बटोर कर लाए और आग सुलगाई. आधे घंटे में भोजन तैयार हो गया. सबने पेट भर कर खाना खाया और फिर सो गए. कुछ दिनों तक खाना और सोना चलेगा, बहुत दिनों की थकान है, इसे उतरने में समय तो लगेगा. चार दिन इसी प्रकार बीत गए. पांचवीं सुबह वरियलदास ने पत्नी से कहा, ‘अब कोई व्यापार शुरू करना चाहिए, इस प्रकार कितने दिनों तक चलेगा? बाजार में कोई दुकान खाली है क्या, देखता हूँ.’
बाजार में अधिकतर व्यापारी बनिया थे. अनाज का व्यापार करने वाले एक बुजुर्ग से सज्जन से पूछना उसे ठीक लगा. उसके सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो गए, ‘राम राम साईं.’
‘राम राम, आओ बैठो.’ बुजुर्ग ने अपनी गद्दी पर बुलाया और बैठने का इशारा किया.
‘पाकिस्तान से भागकर आपके देश में आए हैं, आपकी कुछ मदद हो जाए तो किरपा होगी.’ वरियलदास ने विनीत भाव से अपनी बात रखी. बुजुर्ग के चेहरे पर संकोच के भाव आए, उन्हें लगा कि कुछ पैसे मांगने आया है, फिर भी उन्होंने पूछ लिया, ‘कैसी मदद?’
‘एक छोटी सी दुकान आप किराये की दिलवा देते तो मैं यहाँ कोई धंधा शुरू कर देता, मेरा परिवार पल जाता.’ वरियलदास की बात सुनकर बुजुर्ग के चेहरे के भाव बदले और कहा, ‘हाँ, क्यों नहीं. मेरी दुकान बहुत बड़ी है इसी में एक छोटे हिस्से में तुम अपनी दुकान डाल लो, किराया कितना दोगे?
‘जो आप तय करेंगे, मुझे मंजूर है सेठ जी.’
जगह और किराया दोनों ने आपस में बात करके तय कर लिया. लकड़ी के फ्रेम में टिन ठोकवा कर एक पार्टीशन तैयार किया गया और चौथे दिन वरियलदास की दुकान खुल गई जिसमें बच्चों और औरतों की जरुरत से सम्बंधित सामान लाकर सजा दिया गया. दुकान जल्दी चल निकली क्योंकि बुजुर्गवार की अनाज की दुकान में ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी जिसका फायदा वरियलदास को तुरंत मिलने लगा. वरियलदास की पत्नी सिलाई-कढ़ाई में दक्ष थी, उसने बिलासपुर से एक हाथ से चलने वाली सिलाई मशीन मंगवाई, कुछ दिनों में उसकी सिलाई के हुनर की चर्चा गाँव में फ़ैल गई, उसे बच्चों की कमीज, हाफपेंट, फ्राक, चड्डी और औरतों के साया और ब्लाउज आदि सिलने का काम मिलने लगा. दो महीने बाद ठण्ड का मौसम शुरू हो गया तो स्वेटर बुनने का काम मिलने लगा. वह कपड़े में धागे की कढ़ाई और क्रोशिया का काम भी जानती थी. उसके पास रोज इतना काम आने लग गया कि वह करते-करते थक जाती लेकिन जितने समय तक वरियलदास दुकान में रहता, वह सिलाई-बुनाई में लगी रहती. इसी काम से घर का खर्च निकलने लगा और दुकान से होने वाली आय से दुकान में पूँजी बढ़ने लगी. घर में एक समय खाना बनता था, दोपहर के समय ताकि रात को दुबारा भूख न लगे. रात को वे सब पानी पीकर सो जाया करते थे. एक-एक पैसा बचाते और जोड़ते उनकी आर्थिक स्थिति ठीक होती गई और पंद्रह साल जैतहरी के चौक बाजार में एक पुराना बना-बनाया मकान खरीद लिया. इसी मकान में उनका बेटा दयालदास बड़ा हुआ, उसका ब्याह हुआ, बाल-बच्चे हुए और इसी मकान से वरियलदास और उसकी पत्नी की अंतिम यात्रा निकली.
जैतहरी का व्यापार आसपास के गाँवों पर निर्भर था. आसपास के क्षेत्र में बेहद गरीबी थी. ग्रामीणों के चेहरे, उनके बदन और उनके पहरावे को देखकर किसी को भी दया आ जाए. ये लोग पैदल या सायकिल में अपनी उपज ले कर यहाँ आते थे और उसके बदले अपनी घरेलू जरूरत का सामान लेकर जाते थे. वे घर से तब ही निकलते थे जब घरेलू चीजों की कमी हो जाती थी. वे पोटली और झोले में घर में कुटा हुआ चावल, गेहूं, उड़द, चना, राहर, मसूर, अलसी, तिली, राई, महुआ इत्यादि लेकर आते थे. यहाँ के अधिकतर व्यापारी अनाज की खरीद-बिक्री, किराना, कपड़ा बेचने का काम करते थे, आटाचक्की, सायकिल, मिठाई और पुस्तक की दुकानें थी. जैतहरी के सेठों ने ग्रामीणों के भोलेपन का भरपूर लाभ उठाया, अपनी तिजोरियां भर ली, पक्के मकान बना लिए, बच्चों को पढ़ने के लिए बाहर भेज दिया, बड़े शहरों में जाकर इलाज करवाने लगे और ग्रामीणों को उनकी गरीबी से जूझने के लिए छोड़ दिया. व्यापार पनपता गया, झोपड़ियां जस-की-तस रहीं.
(तीन)
दयालदास और उसकी पत्नी किरण अपने छोटे बेटे को विदेश विदा करके जैतहरी वापस लौट आए. दयालदास के यहाँ आम लोगों की घरेलू जरूरत का सामान बिकता था जिसे किराने की दुकान कहा जाता है. दयालदास का बड़ा बेटा सतीश दुकानदारी में तेज है. हर मंगलवार को खरीदी के लिए कटनी जाता है क्योंकि वहां जाकर खरीदी करने में गल्ला वाजिब कीमत में मिलता है. जैतहरी में बैठकर ऑर्डर भेजो तो वहां के व्यापारी मनमानी कीमत लगाकर भेज देते हैं और कई बार क्वालिटी भी ठीक नहीं आती इसलिए कटनी से होलसेल खरीदी के लिए खुद जाना जरुरी होता है. इसके अलावा बाजार भाव का उतार-चढ़ाव और दुकान में स्टाक की स्थिति की जानकारी उसके दिमाग में सदैव बनी रहती है. उसकी सक्रियता के कारण दयालदास को ज़रा आराम हो गया है. सुबह नौ बजे दुकान खोलने की जिम्मेदारी दयालदास की है, साफ़-सफाई के बाद गद्दी पर बैठ जाना, सबसे पहले अखबार पढ़ना, उसके बाद खाताबही खोलकर रोकड़ मिलाना और खतौनी करना, फिर कोई किताब पढ़ना और पढ़ते-पढ़ते उड़ती नज़रों से दुकान की समस्त गतिविधियों पर नज़र रखना, यही उसकी दैनन्दिनी है. साढ़े नौ बजे सतीश आ जाता है और उसी समय ग्राहकों की आवक शुरू हो जाती है. बाप-बेटे के बीच कम बातचीत होती है लेकिन फुर्सत के क्षणों में सतीश अपने पिता के पास आकर बैठ जाता और घर-परिवार की चर्चा होने लगती. उस दिन सतीश से छोटी मनीषा के ब्याह की बात निकली.
‘बाबा, मनीषा के लिए कोई लड़का नज़र में आया?’
‘अभी तक नहीं. वैसे भी अभी हरीश को अमेरिका भेजने में बहुत पैसा लगा है, हाथ तंग है, ज़रा राहत मिले तो खोजूं और बात आगे बढ़ाऊँ.’ दयालदास ने कहा.
‘इस घर को भी ठीक करवाना है.’
‘हाँ, ये भी जरूरी है लेकिन सबसे जरूरी हरीश की पढ़ाई थी. उसे अमेरिका भेजना था, इसमें मेरी बचत के अलावा दुकान की पूँजी भी लग गई है. खैर, दुकान में तो फर्क नहीं पड़ेगा, अपनी इतने दिनों से कमाई गुडविल काम आएगी लेकिन मनीषा की शादी और घर को ठीक करवाने का काम साल-दो साल टालना पड़ेगा.’ दयालदास ने समझाया. इस बीच ग्राहक आ गए, सतीश उनमें व्यस्त हो गया. इतने में फोन की घंटी बजी. दयालदास ने फोन उठाया, ‘कौन?’
‘मैं हरीश बोल रहा हूँ बाबा, प्रणाम.’ उधर से आवाज़ आई.
‘हाँ. बेटा बोल.’ दीनदयाल ने सतीश को बोला, ‘हरीश का फोन है उसकी मां को भी बुला.’
‘मैं आज सेनफ्रांसिस्को पहुँच गया हूँ. बहुत अच्छी जगह है, अपने देश में तो ऐसे एयरपोर्ट की कल्पना भी नहीं की जा सकती.’
‘ऐसा क्या? और, क्या हाल है वहां तुम्हारा?’
‘अभी तो यहाँ पहुंचा हूँ. मुझे लेने के लिए मेरा दोस्त प्रदीप आया हुआ है. उसके घर में रुकूंगा, कल युनिवर्सिटी जाऊँगा.’
‘ठीक है, फिर वहां का हाल बताना. ले अपनी मां और भैया से बात कर ले.’ दयालदास ने क्रेडल किरण को पकड़ाया. ‘मां, प्रणाम.’
‘खुश रहो बेटा, कैसे हो तुम?’
‘मैं ठीक हूं. यहाँ ठण्ड बहुत भयानक है. पानी भी बरस रहा है, हवा तेज है, कंपकंपी हो रही है.’
‘देखना, संभल कर रहना, कहीं तबियत न खराब हो जाए.’
‘ठीक है मां, मैं सावधान रहूँगा. भैया से बात करवा दे मेरी.’ हरीश ने कहा.
‘हेलो, हरीश, कैसा है ?’
‘इत्थे सब ठीक आहे. तुम्हारा क्या हाल है?’
‘बस, यहाँ सकुशल पहुँच गया हूँ. कल से भागदौड़ शुरू होगी.’
‘अपना ख्याल रखना भाई.’ सतीश ने फोन वापस रख दिया.
(चार)
ठाकुरों की आबादी कम थी लेकिन एक परिवार का दबदबा पूरे गाँव में था. जो भी चुनाव हो, या तो वे जीतते थे या उनका आदमी. विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में प्रत्याशी उनके दरबार में आकर वोट दिलाने की चिरौरी करते थे. इस परिवार के प्रमुख थे ठाकुर विश्वम्भर सिंह. इनके दो पुत्र और चार पुत्रियाँ थी. चारों पुत्रियाँ संपन्न घरों में ब्याह दी गई, ब्याह दोनों लड़कों का भी हुआ लेकिन वे ठाकुर विश्वम्भर सिंह के मन की शांति भंग करने के लिए उन्हीं की हवेली में तैनात थे. एक शाम ठाकुर साहब आँगन में बिछे पलंग में बैठे हुए थे तब ही घर के भीतर से दोनों भाइयों के लड़ने-झगड़ने की जोर-जोर से आवाज़ आने लगी. झगड़े का कारण दोनों की घरवालियाँ थी.
‘क्यों, अपनी घरवाली को समझाता क्यों नहीं कि जेठानी से अदब से बात किया करे?’ बड़े भाई विक्रम सिंह ने छोटे भाई प्रह्लाद सिंह को कहा.
‘पहले अपनी भाषा सुधारो. मेरी घरवाली तुम्हारी भी कुछ लगती है, है कि नहीं?’
‘हाँ हाँ, बहू को समझाता क्यों नहीं?’
‘क्यों अदब करना चाहिए?’
‘बड़ी है वो.’
‘कैसे बड़ी है? उम्र में ढाई महीने छोटी है भाभी उससे.’
‘पद में तो वह बड़ी है, बहू को ये बात समझना चाहिए कि वह देवरानी है.’
‘देखो भैया, ठाकुरों में अदब करने का रिवाज़ नहीं होता.’ प्रह्लाद सिंह ने पलट कर जवाब दिया.
चलती बहस को ठाकुर साहब ने पहले तो अनसुना किया फिर सिगरेट का एक लंबा कश खींच कर खांसते हुए आवाज लगाई, ‘क्या हो रहा है उधर? इधर मेरे पास आओ.’ दोनों भाई चुप हो गए और उसके बाद शान्ति हो गई. उधर दोनों बहुएं एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा रही थी.
आए दिन किसी न किसी बात पर दोनों भाइयों के बीच विवाद होता रहता था. ठाकुर साहब बड़े के बजाय छोटे बेटे को अधिक भाव देते थे इस कारण विक्रम अपने पिताजी से खफा रहता था लेकिन उनसे बोलने की हिम्मत नहीं होती थी इसलिए वह सीधे प्रह्लाद से भिड़ जाया करता था लेकिन किसी भी विवाद में अंततः चुप रह जाने का काम विक्रम का ही होता था. विक्रम ज़रा सीधा पड़ता था, आवाज धीमी थी उसकी, ठाकुरों वाली खनक नहीं थी जबकि प्रह्लाद की आवाज़ बुलंद थी और वह स्वभाव का तेज था. परन्तु एक बात है, पिताजी के सामने दोनों की घिग्घी बंध जाती थी. ‘क्या बात है ? सामने क्यों नहीं आते?’ ठाकुर साहब गरजे. घर के सारे चूहे अपने-अपने बिलों में घुस गए. ठाकुर साहब रौब-दाब वाले व्यक्ति हैं. पूरे गाँव में उनका इतना भय है कि लोग उनके सामने पड़ने में भी कतराते हैं. ऐसा नहीं है कि वे किसी को डराते या धमकाते हैं लेकिन उनके नाम का आतंक इस कदर नगरवासियों के दिमाग में छाया हुआ है कि लोग उनकी उपस्थिति मात्र से भयभीत हो जाते हैं.
जैतहरी प्राथमिक शाला के प्रधानाध्यापक बद्रीप्रसाद ठाकुर साहब के घर हाजिरी बजाने आए हुए हैं. महीने में एक-दो बार वे ठाकुर साहब के दरवाजे में दस्तक दिया करते हैं. आंगन में बैठे ठाकुर साहब को जब उनके आने की खबर मिली तो वे बैठक में आ गए और प्रधानाध्यापक को बुलाया, ‘आइए, बद्रीप्रसाद जी, बैठिए.’
‘धन्यवाद है आपको. आप इस अदने से इंसान को इतनी इज्जत देते हैं, बहुत बड़ी बात है.’ बद्रीप्रसाद कुर्सी में बैठते हुए बोले.
‘शिक्षक को सम्मान देना भारतीय संस्कृति का अंग है, मैं उसी का पालन कर रहा हूँ. सुनाइए, क्या हाल है आपका और आपकी शाला का?’
‘हम दोनों ठीक हैं ठाकुर साहब, शाला ठीक है तो मैं ठीक हूँ और मैं ठीक हूँ तो शाला ठीक है.’
‘ये बात तो है. यह बताइए कि इन दिनों शाला में कितने बच्चे पढ़ने के लिए आ रहे हैं?’
‘पढ़ने वाले बच्चे सरस्वती शिशु मंदिर में जाते हैं, अपने यहाँ तो अधिकतर मध्यान्ह भोजन के लिए आते हैं.’
‘ऐसा क्यों?’
‘अधिकांश गाँव के गरीब परिवारों के बच्चे हमारी शाला में हैं. उनके घरों में शिक्षा के प्रति उदासीनता है. वे सोचते हैं कि क्या करना है पढ़-लिख कर. जल्दी से किसी प्रकार बड़े हो जाएं तो मजदूरी करें तो उनके परिवार में कुछ पैसा आए. वैसे भी ठाकुर साहब, मुझे सरकार की मंशा यही दिखती है कि ऐसे घरों के बच्चे पढ़ने के लिए न सही, भोजन करने के नाम से शाला पहुंचें. कक्षा में बैठेंगे तो थोड़ा-बहुत तो पढ़ेंगे, समझेंगे. इसी बहाने अक्षर ज्ञान तो हो जाएगा.’
‘फिर शिक्षा की अवधारणा का क्या होगा?’
‘कुछ बच्चे पढ़ाई में रूचि लेते हैं, बस उन्हीं के लिए हम लोग लगे रहते हैं. वैसे, आपको तो मालूम है ही कि प्राथमिक शाला में सभी बच्चों को अनिवार्य रूप से उत्तीर्ण करने का सरकारी आदेश है, यह बात शिक्षक भी जानते हैं, बच्चे भी और उनके माता-पिता भी. फेल हो जाने का भय नहीं है तो फिर पढ़ाई में अपना सिर क्यों खपाना? .’ बद्रीप्रसाद ने बताया और बोले, ‘अच्छा, चलता हूँ, अनुमति दीजिए.’ प्रधानाध्यापक चले गए और ठाकुर साहब के सामने वर्तमान शिक्षा पद्धति की विसंगति के कुछ अनुत्तरित प्रश्न छोड़ गए. वे सोच में पड़ गए कि आज़ादी के इतने साल बीत गए, अभी भी गरीबी है, अशिक्षा है, पुरानी सोच है, फिर कैसे देश की तरक्की होगी? सुना है कि गरीबी को दूर करने का मजबूत उपाय शिक्षा है तो गरीबों को शिक्षा से कैसे जोड़ा जाए? शिक्षा वह हथियार है जिसकी सहायता से निर्धनता से लड़ा जा सकता है तो क्या गरीब अपनी गरीबी से संतुष्ट हैं, वे अपना जीवन स्तर क्यों नहीं सुधारना चाहते? जब सरकार ने उनके लिए मुफ्त शिक्षा, मुफ्त गणवेश, मुफ्त किताबों की सुविधा दी है तो फिर उसका उपयोग करने में उन्हें क्या परेशानी है? आश्चर्य है कि वे केवल मुफ्त का खाना खाने के लिए स्कूल आते हैं, पढ़ाई-लिखाई से कोई मतलब नहीं !
उसी वक्त छोटी बहू ने बैठक में आकर पूछा, ‘बाबूजी, भोजन तैयार है, थाली लगा दूं क्या?’
‘हाँ, लगा दो, मैं हाथ धोकर आता हूँ.’ ठाकुर साहब बोले.
(पाँच)
कस्तूरी की पड़ोसन प्रभा का पति रामदास मेहनती और ईमानदार व्यक्ति था. सड़क पर बोरा बिछाकर सब्जी बेचा करता था. इतनी आमदनी थी कि घर चल जाता था लेकिन बचत नहीं होती थी. उनके तीन बच्चे थे, दो लड़कियां और सबसे छोटा लड़का. दोनों लड़कियां सुन्दर थी, अपनी सुन्दरता की वज़ह से युवती होते ही अपने-आप ब्याह गयी, कोई ख़ास खर्च नहीं हुआ. लड़का मेट्रिक तक पढ़ाई कर चुका था. उसे सब्जी दुकान में बैठना पसंद नहीं था इसलिए वह अपने पिता का साथ नहीं देता था. ‘कुछ कर बेटा’ सुनते-सुनते एक दिन वह जैतहरी से चुपचाप बिना बताए कहीं चला गया. मां-बाप उसकी खबर की बाट जोहते रहे, कुछ पता नहीं लगा. मां आंसू बहाती रही, पिता अपनी दुकान में रोज की तरह सब्जी बेचता रहा. एक दिन की बात है, जैतहरी का एक व्यापारी बिलासपुर के मालधक्के में मालिकराम मेलाराम की दुकान में खरीदी करने के लिए गया तो उसकी नज़र प्रभा के लड़के पर पड़ी, उसने उसे देखकर अनदेखा कर दिया. वापस लौटकर उसने लड़के के बारे में रामदास को बताया, वे दोनों पति-पत्नी तुरंत रेल की टिकट कटाकर बिलासपुर पहुंचे. बेटे को देखकर दोनों खुशी से रोने लगे. प्रभा ने उसे दुकान से बाहर बुलाकर गले से लगाया, छाती से चिपटा लिया और बोली, ‘तू यहाँ है, कम-से-कम हमें खबर तो कर दिया होता.’ उसके बाद वह दोनों को पास की हरी भाई की दुकान में ले जाकर गरम समोसे खिलाया और चाय पिलाया. दोनों को विदा करते वक्त उसने कुछ रूपए प्रभा के हाथ में पकड़ा दिए और कहा, ‘अम्मा, इसे अभी रख ले. तू कहती थी थी न, कुछ कर भाई, तो मैं यहाँ नौकरी करने लगा हूँ. दिवाली के समय घर आऊँगा, मुझे जैतहरी बहुत याद आती है.’ परन्तु दिवाली आने के पहले प्रभा के ऊपर मुसीबत का पहाड़ टूट गया, उसके पति रामदास को लकवा लग गया. वह बिस्तर से लग गया और प्रभा दिन-रात उसकी सेवा में. वैद्य और डाक्टर देखने आए, दवा दी, ढाढ़स बंधाया लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ. अब तो बेटे द्वारा भेजे गए पैसे से गृहस्थी घिसट रही थी. बेटे की तनख्वाह भी कम थी, उससे घर का काम नहीं चलता था. उपचार पहले ही बंद हो चुका था, अब तो खाने के लाले पड़ रहे थे. सामने वाले घर से रेडियो में बज रहा गाना सुनाई दे रहा था, ‘देने वाले किसी को गरीबी न दे, गर गरीबी जो दे बदनसीबी न दे...’ प्रभा फूट-फूटकर रो रही थी, वह और कर भी क्या सकती थी? एक रात रामदास सोया तो सदा के लिए सो गया. लड़का बिलासपुर से आया. रामदास का अन्तिम संस्कार किया. गरीबी-गुजरान दसगात्र निपटाया और प्रभा से बोला, ‘अम्मा, मेरे साथ बिलासपुर चलो, वहीं रहना.’ ना-नुकुर करते-करते प्रभा ने उसकी बात मान ली. लड़के ने कहा, ‘अम्मा, इस घर को बेच देते हैं.’
‘न, इस घर को बेचने की बात दोबारा अपने मुंह से मत निकालना. ये तेरे दद्दा की निशानी है. और फिर हम लोग जिंदगी भर के लिए बिलासपुर नहीं जा रहे हैं. बहुत जल्दी अपने गाँव जैतहरी आएंगे तब इसी घर में रहेंगे.’ प्रभा ने कड़े शब्दों में कहा.
घर में ताला लगाकर वे दोनों बिलासपुर पहुँच गए. प्रभा ने शहर के कुछ घरों में खाना पकाने का काम ले लिया. अभाव का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगा और एक दिन ऐसा भी आया कि लड़के ने अपनी मां से कहा, ‘अम्मा, चलो, जैतहरी चलते हैं, वहां मैं एक छोटा सा व्यापार शुरू करूंगा और हम दोनों उसी घर में रहेंगे जिसमें दद्दा रहते थे.’ प्रभा की आँखें सजल हो गयी, पूछा, ‘कब चलना है?’
‘जब इस महीने की पगार मिलेगी, मैंने सेठजी को अपने मन की बात बता दी है, उन्होंने मुझे घर जाने की इजाजत दे दी है.’ विकास ने कहा.
(छः)
दीनदयाल ने एक दिन किरण से कहा, ‘बहुत दिनों से घर में सिन्धी कढ़ी नहीं बननी है, किसी दिन बनाओ न.’
‘अच्छा याद दिलाया आपने. आज बाजार से शिमला मिर्च, हरी मिर्च, गाजर, खीरा, भिन्डी, मुनगा, टमाटर और धनियापत्ती मंगवा दो, कुछ अन्य सब्जियां घर में हैं, इमली तो अपनी दुकान में ही मिल जाएगी, मैं आज रात के भोजन में बना देती हूँ.’ किरण ने कहा.
सिन्धी कढ़ी में दही नहीं डाला जाता, समझ लीजिए कि मिक्स वेजिटेबल का गाढ़ा सूप जैसा बनता है. जिस दिन यह बनता है, दाल नहीं बनती. रोटी हो या भात या पराठा, सबको उसकी संगत पसंद है.
रात की थाली में आज लच्छेदार पराठा, पुलाव और सिन्धी कढ़ी बनी है. बाप-बेटे में होड़ लगी है आपस में, कौन ज्यादा खाएगा? दोनों को परसते-परसते मनीषा खिसिया कर बोल उठी, ‘कुछ हमारे लिए भी बचाओगे या पूरा आप दोनों चट कर जाओगे? हम भी तो चखें कि कैसी बनी है.’
‘खाते वक्त किसी को रोकते या टोकते नहीं, यह गलत है. यह रसोई मां अन्नपूर्णा की है, किसी के लिए कम नहीं पड़ता.’ मां ने तेज आवाज में कहा. ‘खाने दो जितना खाते हैं. ये लोग अधिक खा रहे हैं इसका मतलब है कि भोजन स्वादिष्ट बना है.’ मनीषा चुप हो गई. बाद में उसका ध्यान एक मंझोले गंज पर गया जिसमें कढ़ी रिजर्व रखी हुई थी, मनीषा को पूरी बात समझ में आ गई. उन दोनों के भोजन हो जाने के बाद मां-बेटी ने भोजन लिया और सब लोग घेरा बनाकर बैठ गए. ‘आज मज़ा आ गया. मां, इसे रोज बनाया करो.’ सतीश ने कहा.
‘रोज बनेगी तो ऊब जाओगे, कभी-कभी बनती है तो स्वाद आता है.’ किरण बोली. सतीश ने चर्चा आगे बढ़ाई, ‘बाबा, हरीश के ग्रेजुएशन का यह आखिरी साल है, वह पी.जी. करना चाहता है.’
‘अब उसकी पढ़ाई का और खर्च उठाने के लिए मैं तैयार नहीं हूँ. विदेश जाकर पढ़ने का उसका मन था इसलिए किसी प्रकार व्यवस्था बना दी, अब मुझे मनीषा की शादी करनी है और इस घर को ठीक करवाना है.’ दयालदास ने टका सा जवाब दिया. ‘एक किराना दुकान कितना बोझ उठा सकती है?’
‘बैंक से एजुकेशन लोन लिया जा सकता है. मुझे लगता है कि उसकी आगे की पढ़ाई में किसी प्रकार की रोक लगना, उसके भविष्य के साथ अन्याय हो जाएगा.’
‘लोन लोगे तो उसे पटाना भी तो पड़ेगा, कहाँ से पटेगा? इसी दुकान से न? एक बार कर्ज में फंस गए तो उससे छूटना बहुत मुश्किल हो जाता है. मैं लोन लेने के पक्ष में नहीं हूँ. हरीश वहीं कोई नौकरी पकड़ ले, खुद कमाए और अपने कमाई से जो पढ़ना है पढ़े, मैं अब इस उम्र में किसी भी देनदारी का बोझ सहने के लिए तैयार नहीं हूँ.’ दयालदास ने कहा और उस बातचीत को वहीं पर रोक कर उठ खड़े हुए.
‘परन्तु बाबा, हरीश की पढ़ाई इस तरह अधूरी रह जाएगी, आपको इस पर सोचना चाहिए.’
‘मैंने सोच लिया, अब और अधिक आर्थिक दबाव मैं सहन नहीं कर सकता.’ दयालदास ने जाते-जाते कहा. वातावरण में चुप्पी छा गई.
उधर सेनफ्रांसिस्को में हरीश ग्रेजुएशन अंतिम वर्ष परीक्षा की तैयारी में लगा हुआ था. अपने भविष्य को लेकर निश्चिन्त हरीश को इस बात की कल्पना भी नहीं थी कि उसकी आगे की पढ़ाई खतरे में है. किसी ने उससे चर्चा नहीं छेड़ी, यह सोच कर कि उसकी परीक्षा की तैयारी में बाधा उपस्थित न जाए.
परीक्षा हो गई, परिणाम घोषित हो गए. जैसी कि उम्मीद थी हरीश बहुत अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो गया, अब उसे एम.बी.ए. करना था. उसने घर फोन लगाया, पास होने की खबर सुनाई और आगे की योजना का ज़िक्र किया. खर्च बहुत अधिक था लेकिन उसने सकुचाते हुए बताया क्योंकि परिवार से मदद के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं था. दयालदास ने कहा, ‘अब तुम अमेरिका से वापस आ जाओ.’
‘क्यों बाबा, आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?’ हरीश ने विस्मित होकर पूछा.
‘अब हमारे पास तुम्हें वहां पढ़ाने लायक ताकत नहीं है. यहाँ मनीषा और सतीश की शादी करना है और अपना घर जर्जर हो गया है, उसे सुधरवाना है.’
‘वो तो ठीक है लेकिन मेरा क्या होगा?’
‘मैंने अपने हालात बता दिए, अब तुमको फैसला लेना है.’
‘मैं क्या करूँ? मेरा तो दिमाग काम नहीं कर रहा है.’
‘एक काम कर सकते हो, वहां कोई नौकरी खोजो, कुछ पैसे बचाओ और उससे अपनी आगे की पढ़ाई चालू रख सकते हो.’
‘मेरे जैसे हजारों ग्रेजुएट यहाँ के होटलों में बेयरे या बर्तन साफ़ करने की नौकरी करते हैं या गैस स्टेशन में गाड़ियों में पेट्रोल भरते हैं. इसके वेतन से बचत तो होने से रही.’
‘अब तुम देखो कि तुमको क्या करना है. परीक्षा में पास होने की हम सब की ओर से बहुत बधाई.’ दयालदास ने बात समाप्त करते हुए कहा.
हरीश माथा पकड़कर बैठा रहा. उसे सब ओर अँधेरा समझ में आ रहा था. वह बाबा से पूछना चाहता था कि जब ग्रेजुएशन ही करवाना था तो यहाँ क्यों भेजा, यह तो इंडिया में ही हो जाता? लेकिन वह पूछ न पाया. अब क्या करूँ? क्या इंडिया वापस जाना पड़ेगा?
शाम को उसकी मुलाक़ात उसके मित्र प्रदीप से हुई. हरीश का चेहरा बुझा हुआ सा था जिसे प्रदीप ने ताड़ लिया, ‘क्या बात है, तुम आज उदास दिख रहे हो?’
‘सब गड़बड़ हो गया है, क्या बताऊँ तुम्हें?’ हरीश ने बुझे स्वर में कहा.
‘बताने लायक हो तो बताओ.’
‘मुझे इंडिया वापस जाना होगा.’
‘क्यों, क्या कोई अनहोनी हो गई है?’
‘अनहोनी ही समझ.’
‘क्या हुआ यार, साफ़-साफ़ क्यों नहीं बताता.’
‘मेरे पिता कहते हैं कि वे अब और पैसे नहीं भेज सकते. मेरे सपने अधूरे रह जाएंगे प्रदीप.’ कहते-कहते वह रो पड़ा.
कुछ देर तक प्रदीप उसको सांत्वना देता रहा फिर बोला, ‘बस इतनी सी बात है और तू टेसुए बहा रहा है?’
‘तो क्या करूं? तू बता.’
‘तू यहीं रहेगा, यहीं पढ़ेगा.’
‘पर कैसे?’
‘ये तुझे कल बताउंगा.’
‘सच?’
‘हाँ, सच.’ प्रदीप ने कहा और बोला ‘चल बाहर चलकर कुछ खाएंगे.’ वे दोनों निकल पड़े. बाहर मौसम सुहाना था. हल्की बारिश के बाद आसमान खुला हुआ था, ठंडी मंद बयार बह रही थी.
अगले दिन जब प्रदीप मिला तो उसने हरीश को बताया, ‘तेरा काम हो गया.’
‘कैसे?’ हरीश ने आश्चर्यचकित होकर पूछा.
‘मैंने अपने पापा से तुम्हारे बारे में बात की, तुम्हारी तकलीफ बताई तो वे तुम्हारी आगे की पढ़ाई का खर्च फायनेंस करने के लिए तैयार हो गए हैं. जब तुम्हारी नौकरी लगेगी तो कमा कर वापस कर देना.’
‘सच?’
‘हाँ हाँ सच.’ प्रदीप मुस्कुराया और हरीश ने उसे गले से लगा लिया.
हरीश ने यह खबर अपने घर पर नहीं दी, न जाने क्यों? उसे मदद का इंतज़ार था या घर वालों से नाराजगी !
(सात)
आज दयालदास अपनी बेटी मनीषा को दिखाने के लिए कटनी जा रहा है, साथ में उसकी मां भी जा रही है. नर्मदा एक्सप्रेस आने का समय हो गया है, सब हड़बड़ी में हैं. दुकान से स्टेशन नजदीक है इसलिए ख़ास चिंता नहीं है लेकिन परिवार साथ में हो तो ट्रेन के आने के पहले पहुंचना ठीक रहता है. ‘चलो, जल्दी करो, ट्रेन आने वाली है.’ दयालदास ने व्यग्र होकर आवाज लगाई. तीनों एक साथ घर से निकले और स्टेशन को ओर बढ़ चले. उन लोगों के स्टेशन पहुँचने के पांच मिनट बाद ट्रेन आई. सब ट्रेन में बैठ गए. अचानक दयालदास का ध्यान मनीषा के चेहरे पर गया, वह खुश होने की जगह उदास दिखाई पड़ रही थी. मनीषा को समझ में आ रहा था कि अब उसके कुछ दिन ही बचे हैं, जैतहरी अब पराई जगह होने वाली है, संभवतः यही उसकी उदासी की वज़ह है. दयालदास ने उसकी ओर देखा, उसे मनीषा के दिल की बात समझ आ रही थी लेकिन लड़कियों को तो ब्याह कर एक दिन अपने नए घर में जाना होता है. यही परिपाटी युगों से चली आ रही है. एक घर छूटता है तो दूसरा घर बसता है. लड़कियों को बचपन से ही मानसिक रूप से तैयार किया जाता है कि उसे विवाह के पश्चात दूसरे घर जाना है, वहां घर और परिवार की व्यवस्था बनाना है, दोनों घरों की लाज बचानी है. कुछ जातियों को अपवाद स्वरूप छोड़ दिया जाए तो सम्पूर्ण विश्व में विवाह के पश्चात लड़कियाँ ही पुरुषों के घर जाती हैं.
बांग्ला कथाकार बिमल मित्र लिखते हैं, ‘बाप के घर सभी लड़कियाँ अच्छी हैं. वहाँ हजार दोष होने पर भी उन्हें माफ करने वालों की कमी नहीं रहती. लेकिन ससुराल? ससुराल में ही भले-बुरे की जाँच होती है. तेल की जाँच साग में, सोने की जाँच आग में. स्त्री के लिए ससुराल भी वही आग है.’
क्या मायके में उसे इस दौर से नहीं गुजरना पड़ता? उसका मायका असली प्रशिक्षण केंद्र है जहां किसी लड़की के व्यक्तित्व का निर्माण होता है. मां के कड़े अनुशासन में मिले मार्गदर्शन की वजह से अक्सर मां-बेटी के संबंधों में कड़वाहट तक विकसित हो जाती है. इसका एक अर्थ यह भी निकलता है कि चाहे मायका हो या ससुराल, लड़की को दोनों जगह चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, दोनों जगह आग से खेलना होता है. फ्रांसीसी विचारक सीमोन द बोउवार की इस बात में दम है कि विवाह की बेड़ियां बड़ी मजबूत होती हैं और स्त्री को अपने को उस स्थिति के अनुकूल बनाना ही पड़ता है, वह इससे छुटकारा नहीं पा सकती. यह अजब पहेली अनंत समय से अबूझ चल रही थी लेकिन अब नई इबारत गढ़ी जा रही है. पढ़ी-लिखी लड़कियां अब रोजगार से जुड़कर स्वावलंबी बन रही हैं, पैसे कमा रही हैं इस वजह से पारिवारिक बेड़ियां ढीली हो रही हैं. परिवार में अब उनकी भी आवाज होती है जो सुनी और मानी जाती है.
सब कटनी पहुँच गए. दयालदास के एक रिश्तेदार के घर में लड़की दिखलाना था. लड़के वाले सपरिवार आए, चाय-नाश्ता हुआ, उन्होंने लड़की देखी, उससे बातें की और तुरंत अपनी पसंदगी ज़ाहिर कर दी. लड़के और लड़की वालों ने नेग किया और रिश्ता पक्का हो गया. शादी की तारीख भी तय हो गई. सब खुश थे. दयालदास सपरिवार जैतहरी लौट आए.
आम तौर पर सिंधी परिवारों में समान हैसियत में वैवाहिक संबंध तय होते हैं ताकि विवाह में लड़की वालों को क्या-कुछ देना है, मतलब, नकद, सोना-चांदी, घरेलू जरूरत का सामान, कपड़े आदि, यह बात खुलकर करने की जरूरत न रहे, मौन समझ रहती है. वैसे, जरूरत महसूस होने पर कुछ बातें मध्यस्थ के माध्यम से स्पष्ट कर ली जाती हैं.
शादी की तिथि आई, दयालदास अपने रिश्तेदारों तथा मित्रों को साथ लेकर कटनी पहुँचे. सिंधी परिवारों मेंं रिवाज़ है कि लड़की पक्ष 'बारात' लेकर लड़के वालों के यहाँ आते हैं जिसे 'मन्य' कहा जाता है. लड़के वाले लड़की पक्ष को अपनी जगह में बुलाकर ससम्मान ठहराते हैं, उनके खाने-पीने का पूरा इंतज़ाम करते हैं और उन्हें आने-जाने का यात्रा-व्यय भी देते हैं.
शुभ मुहूर्त पर विवाह सम्पन्न हुआ. उसी दौरान सतना में रहने वाले एक सिंधी परिवार ने अपनी कन्या दयालदास के पुत्र सतीश के लिए दिखाई, पसंद आ गई, रिश्ता पक्का हो गया. चार माह बाद शादी करने बात तय हो गई. सब लोग खुशी-खुशी जैतहरी वापस आ गए.
(आठ)
प्रभा के बेटे विकास की याद तो आपको होगी ही. वही, जो घर में बिना बताए बिलासपुर काम करने चला गया था और एक दिन अपनी माँ को वापस जैतहरी ले आया था. जैतहरी आकर उसने अपने पिता के एक पुराने सहपाठी से मिला. उनकी एक दुकान खाली थी जिसको वे किराये से देना चाहते थे. वे विकास को नहीं पहचानते थे लेकिन जब विकास ने अपने पिता का ज़िक्र किया तो वे खुशी-खुशी देने को तैयार हो गए. इस प्रकार विकास की किराने की दुकान शुरू हो गई. उसके पास पूंजी का अभाव था लेकिन बिलासपुर में जिस दुकान में काम करता था उसके सेठ ने उसकी दस हजार रुपए उधार की लिमिट बांध दी जिससे उसे बहुत सहारा हो गया. धीरे-धीरे बिलासपुर के अन्य व्यापारियों के यहाँ उसे उधार में माल मिलने लगा. उसके अच्छे व्यवहार से प्रभावित होकर ग्राहकों की संख्या बढ़ने लगी, उसका व्यापार चल निकला.
प्रभा एक दिन अपनी पड़ोसन कस्तूरी के घर बैठने गई. कस्तूरी उसे देखकर खुश हो गई और जमीन पर चटाई बिछाकर बिठाया. 'कैसी हो प्रभा?' कस्तूरी ने पूछा.
'ठीक हूँ दीदी.' प्रभा ने उत्तर दिया. 'विकास की दुकान अच्छी चल रही है, अब किसी बात की तकलीफ नहीं है.'
'चलो, अच्छा हुआ. अच्छा ये तो बताओ, बहू कब ला रही हो?'
'लाना तो है लेकिन गांव में अपनी लड़की कोई देना नहीं चाहता, सब शहर में ब्याहना पसंद करते हैं. फिर ऊपर से आजकल की बहुओं के बारे में जो कुछ सुनाई देता है, उससे मुझे डर लगता है दीदी, क्या करूँ?'
'अरे, सब एक जैसी नहीं होती रे. कुछ अपना भाग्य भी तो होता है.'
'मैं अपने भाग्य के बारे में अच्छी तरह से जानती हूँ, मेरे भाग्य के आगे-पीछे दुर्भाग्य चलता है.'
नहीं, ऐसा नहीं है. ग्रहों की दशा बदलते
रहती है. सुना है कि जब शनि की दशा होती है तब सब तरफ उल्टा होता है. अब तेरी
ग्रहदशा बदल गई होगी, देख लड़का घर वापस आ गया, उसका
धंधा भी ठीक चल रहा है. मेरी बात मान, तेरी बहू भी अच्छी आएगी, अब
उसका ब्याह कर दे.’ कस्तूरी ने प्रभा को समझाया. ‘बैठ, तेरे
लिए चाय बनाती हूँ.’ कस्तूरी चूल्हा सुलगाने लगी.
एक जमाना था, अग्नि को
साक्षी मानकर फेरे लेने का प्रभाव आजीवन रहता था. हमें मालूम था कि इस फेरों को
वापस नहीं घुमाया जा सकता. ऐसा नहीं है कि उन दिनों मनपसंद शादियाँ होती थी या
वैवाहिक जीवन निष्कंटक होता था. अनेक उतार-चढ़ाव आते थे लेकिन साथ निभाने का संकल्प
हर समय स्मरण रहता था. सब 'साथ जियेंगे, साथ मरेंगे' वाला सद्भाव
लिए लम्बा समय व्यतीत किया करते थे . सवाल पसंदगी
या नापसंदगी का नहीं है, सवाल यह है कि
किसी का हाथ थामा तो थाम लिया, उसके बाद कोई
तर्क-वितर्क नहीं. पहले निभाने की
अनिवार्यता थी, पसंद या नापसंद का सवाल नहीं था. अब निभने
का माहौल है. निभी तो निभी अन्यथा दूरी बना ली. आज के माता-पिता ससुराल से वापस आई
लड़की को खुशी-खुशी वापस अपना लेते हैं जबकि पुराने युग में ‘जिस घर में डोली जाती है, उसी घर से अर्थी उठती है’ की सोच थी. इसी वजह से अनेक
लड़कियों की अर्थी असमय ही उठ गई.
लोग कहते हैं कि विवाह के शुरुआत समय में प्यार अधिक रहता है, उसके बाद कम होता जाता है। असल में ऐसा
नहीं होता। शुरुआती दिन एक दूसरे को समझने में लग जाते हैं। कई साल खप जाते हैं तब
तालमेल बैठता है। यह समझ आते-आते आती है। पति-पत्नी
गाड़ी के दो पहिए नहीं, संपूर्ण गाड़ी
हैं। भले खड़खड़ होती है पर चलते रहती है और आगे बढ़ती है।
वैवाहिक संबंधों का मिज़ाज अब बदल गया है। अदालतों तक कम मामले पहुँचते हैं लेकिन घर-घर में मुकदमें चल रहे हैं। आरोप हैं, प्रत्यारोप हैं। पहले चुप्पी रहती है फिर आवाजें मुखर हो लगती हैं। बीच-बचाव चलता है लेकिन काँच में एक बार दरार आ गयी तो उसे कैसे भरेंगे? उसके बाद रिश्तों की दीवार भसकने लगती है, पति, पति नहीं रह जाता और पत्नी, पत्नी। जब सीधा रिश्ता निरर्थक हो जाता है तब सास-ससुर, जेठ-जेठानी, देवर-देवरानी की क्या वकत? मनुष्य के गुणों को देखो तो गुण ही गुण, दोष देखो तो दोष ही दोष। दो परिवार जो जीवन भर के सम्बन्धों के लिए गाजे-बाजे के साथ जुड़ते हैं, उनमें खटास उत्पन्न हो जाती है, अनबोला हो जाता है, अनदेखा हो जाता है। लड़के के परिवार की नज़र में लड़की के माता-पिता दोषी समझ आते हैं, लड़की के परिवार की नज़र में लड़के के माता-पिता। सच पूछें तो कोई दोषी नहीं हैं। दरअसल, लड़का हो या लड़की, दोनों विवाह नहीं करना चाहते। अब लड़कियां किसी की पत्नी बनने में संकोच कर रही हैं, बहू तो किसी भी हालत में बनना ही नहीं चाहती। सच पूछिए तो शादी भी वे अपने माता-पिता के दबाव में कर रहें हैं। वे स्वतन्त्रता चाहते हैं। उन्हें खुला वातावरण चाहिए, काम करने या न करने की आज़ादी चाहिए, किसी प्रकार की टोक-टाक नहीं चाहिए, उन्मुक्त यौन की स्वतंत्रता चाहिए।आधुनिकता और आधुनिक शिक्षा के वैचारिक प्रभाव ने सब कुछ बदल दिया है। आज की लड़कियां योनि से स्त्री हैं, स्वभाव से पुरुष। अब दो पुरुष स्वभाव के लोग आपस में विवाह कर रहे हैं, यही वास्तविकता है। टकराव संभव है, वह दिख रहा है। घर की अदालत निष्प्रभावी हो चुकी है, कानूनी अदालतें चालू हैं। खैर, यह तो इस ज़माने की बात है, अपनी कहानी तो जरा पुरानी है. उस वक्त इतने उदाहरण नहीं थे फिर भी सासों को बहुओं के नाम से भय लगता था. सबसे बड़ी समस्या थी, अपना वर्चस्व खो जाने का संकट.
जैतहरी से कटनी मार्ग पर एक छोटी सा स्टेशन है चंदिया, वहां से एक पोस्टकार्ड प्रभा के पास आया जिसमेंं विकास से शादी के लिए एक कन्या के पिता ने प्रस्ताव भेजा. प्रभा मन ही मन बहुत खुश हुई कि कस्तूरी दीदी की बात मानने की बात शुरू हो रही है. कुंडली मंगवायी गयी, 22 गुण मिले तो प्रभा लड़की को देखने के लिए चंदिया पहुंच गयी. देखने में सुंदर, घरेलू कामों में निपुण, और बातचीत में कुशल लड़की प्रभा को पसंद आ गयी. रिश्ता पक्का हो गया, विवाह के मुहूर्त के लिए पंडित जी से बात करने के लिए प्रभा ने लड़की वालों पर भार सौंप कर प्रभा जैतहरी वापस आ गयी.
शुभ मुहूर्त पर विवाह संपन्न हो गया, बहू घर में आ गई. बहू का नाम है नीलम. नीलम के लिए जैसा चंदिया था, वैसा ही जैतहरी. छोटा सा घर, बाहर एक परछी, बीच में दरवाजा, उसके बाद एक कमरा, कमरे में एक तरफ टिन की दो कुर्सियां, दूसरी तरफ एक खाट जिसमें कथरी बिछी हुई थी. इस कमरे से लगा हुआ दूसरा कमरा जिसमें एक ओर दो चूल्हे बने हुए थे. चूल्हे के बगल की दीवार में खुली आल्मारी जैसी व्यवस्था थी जिसमें टिन में दाल, चावल, आटा, सब्जी के लिए मसाला, बटुआ, गंजा, पटा, बेलन, चिमटा आदि खाना बनाने का सामान रखा हुआ था. नीलम को अपने घर में खाना बनाने का मौका कम मिलता था क्योंकि उसकी अम्मा बनाया करती थी फिर भी रसोई का मोटा-मोटा काम जानती थी, बस रोटी बेलने में कमजोर थी, गोल नहीं बेल पाती थी. कमरे की दूसरी तरफ शादी के दहेज में मिला एक बड़ा पलंग था. कुल मिलाकर यही नीलम का 'किचन-कम-बेडरूम' था. पीछे जाने पर एक संडास और नहाने के लिए बोरों से छुपाया हुआ नहानी घर जो ऊपर से खुला हुआ था.
प्रभा ने नीलम को समझाया, 'देख बेटा, हम लोग गरीबी में गुजारा करने वाले हैं. विकास पहले बिलासपुर में नौकरी किया करता था, नौकरी छोड़ कर यहां नया व्यापार शुरू किया है. खाना-खर्चा चल जाता है लेकिन हाथ तंग रहता है. धीरे से हालत सुधरेगी तो सब बदल जाएगा लेकिन तुम्हारा किया ही काम आएगा. विकास के दद्दा तो रहे नहीं, अब घर में कमाने वाला विकास अकेला है. तुमने यदि हाथ खींच कर अपनी गृहस्थी चलाई तो बचा हुआ पैसा आगे चल कर बढ़ेगा और तरक्की होगी.'
'जी, मां जी.' नीलम ने उत्तर दिया.
(नौ)
ठाकुर साहब के घर में इन दिनों चहल-पहल कुछ अधिक है. कारण है, विधान सभा का चुनाव नज़दीक है और सभी प्रत्याशियोंं की नज़र उनके समर्थन पर टिकी हुई है. दरअसल ठाकुर साहब किसी एक पार्टी से जुड़ कर कभी नहीं रहे, वे चुनाव के संभावित नतीजों को भांप कर जीतने वाले दल या प्रत्याशी को अपना समर्थन दिया करते हैं ताकि सरकार बनने के बाद उनके व उनके बच्चों के काम आसानी से हो सकें. उनके दोनों लड़के हैं तो होशियार लेकिन अपने पिता के सामने उनकी चलती ही नहीं. जो पिता जी कहेंं, वही उनके लिए ब्रह्मवाक्य है लेकिन लापरवाह हैं. ठाकुर साहब ने दोनों को ठेकेदारी में लगा रखा है लेकिन सही मायने में दोनों का नाम ही रहता है, काम उनके पुराने कारिंदे किया करते हैं. लड़कों का काम केवल फील्ड में जाकर खड़े होने का रहता है, जरा सी डांट-डपट की, मुंशी से थोड़ी पूछ-ताछ की और मोटरसायकिल में आगे-पीछे बैठकर घर वापस आने का होता है.
जैतहरी आदिवासियों की रिजर्व सीट है इस कारण ठाकुर साहब या उनकी औलादों के विधायक बनने की कोई गुंजाइश नहीं है इसका उनके मन में मलाल बना रहता है लेकिन क्या करें, वे आरक्षण के प्रावधान से दुखी हैं. जो भी प्रत्याशी खड़ा होता है वह आदिवासी होने के कारण भोला-भाला और सीधा-सादा होता है, हां, चुनाव जीतने के बाद उसका व्यवहार बदलने लगता है, वह समझदार हो जाता है, या होशियार हो जाता है, या चालाक हो जाता है. 'जी ठाकुर साहब' के बदले 'कहिए ठाकुर साहब' बोलने लगता है. पर ठाकुर साहब को इन बातों से बहुत फर्क नहीं पड़ता क्योंकि राजनीति करते हुए उन्हेंं लंबा समय हो चुका है, वे राजनीति और राजनीतिज्ञों के स्वभाव से भली-भांति परिचित हैं. वे जानते हैं कि कुर्सी का असर उसमेंं बैठते ही शुरू हो जाता है, कोई खास बात नहीं. फिर, जो समर्थन उन्होंने दिया था उसकी वसूली करना उन्हें बखूबी आता था. विकासशील भारत में विकास के काम होते रहते हैं, नए पैदा भी होते रहते हैं, उन पर उनका नज़र बनी रहती है. जिस काम में फायदा नज़र आया तो वह काम ठाकुर साहब की झोली में आया हुआ समझो. मिनिस्टर से लेकर ऑफिसर तक सबको खुश कैसे रखना यह ठाकुर साहब को बहुत अच्छे से मालूम है. समझ लो, उनके सामने बिछे रहते हैं. उनके दोनों लड़के उनसे उलट हैं. उनमें न तो बातचीत में लोच है, न अपना काम निकालने का हुनर. बाप की बोई हुई फसल को काट रहे हैं और ऐश कर रहे हैं. ठाकुर साहब इस बात को अच्छे से जानते हैं लेकिन क्या करें, अपनी नालायक औलाद के आगे मजबूर हैं.
इस वक्त ठाकुर साहब अपनी बैठक में विराजमान हैं, छोटा बेटा अपनी उंगली में मोटरसायकल की रिंग घुमाते हुए उनके सामने से गुजर रहा है. 'कहां के लिए सवारी निकल रही है?' ठाकुर साहब ने पूछा.
'अपने दोस्त के घर जा रहा हूं.' प्रहलाद सिंह ने बताया.
'इरीगेसन वाले भार्गव साहब के यहां जाना था न ?'
'वहां कल जाऊंगा.'
'आज क्यों नहीं?'
'मैने बताया न कि दोस्त के यहां जा रहा हूं.'
'वो तो तुमने बताया, मैंने सुना लेकिन साहब के यहां आज जाकर उसे पैसा देना जरूरी है.'
'पैसा कहीं भागा जा रहा है या साहब? कल दे दूंगा.'
'अभी देते हुए चले जाओ न.'
'एक काम करिए, अगर आज जरूरी है तो विक्रम के हाथों भिजवा दो. वह तो घर में खाली बैठा है.'
'मुझे मालूम है लेकिन मैं तुम्हारी प्राथमिकता की जांच कर रहा था.'
'तो जांच हो गई न?'
'हो गई और मुझे समझ में आ गया कि मेरे जिंदा रहते ही ये सब काम-काज चलेगा. इधर मेरी आंखें मुंदी, उधर सब बैठ जाएगा.'
'आप बेवजह चिंता करते हो पिताजी, कुछ नहीं होगा. आपके जाने के बाद हम लोग अधिक जिम्मेदारी महसूस करने लगेंगे.'
'चलो, आज से मैं बेफिक्र हुआ.' ठाकुर साहब खिसिया कर बोले. मन-ही-मन वे सोच रहे थे कि लड़के मेरे मरने का इंतजार कर रहे हैं. उन्होंने विक्रम को आवाज़ दी. विक्रम सामने आया, 'जी पिता जी.'
'कुछ नहीं, यह जानने के लिए आवाज लगाया था कि तुम घर में हो या नहीं हो.' ठाकुर साहब ने कहा और चुप हो गए.
घर में जब लड़का पैदा होता है तो सब खुशी मनाते हैं. सोचते हैं, बड़ा होकर काम संभालेगा, घर की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेगा लेकिन असली बात बाद में समझ आती है जब लड़का बड़ा होकर बाप के ऊपर बोझ बनने लग जाता है. ठाकुर साहब को आश्चर्य होता है कि उनके लड़कों में उनके कोई गुण विकसित नहीं हुए. गैर-जिम्मेदारी तो जैसे कूट-कूट कर भरी हुई है. परंतु क्या किया जा सकता है? बुढ़ापा बड़ा बुरा समय है, खुद का शरीर साथ नहीं देता और जिनका शरीर मजबूत है वे भी साथ नहीं देते. खैर, मेरे मरने के बाद क्या होगा, इस बात पर माथाफोड़ी करने से अच्छा ये है कि मेरे जीते जी जितना हो सके, इनके लिए सुरक्षित कर जाऊं, उसके बाद ये अपना किया ये खुद भुगतेंगे.
ठाकुर साहब का बहुत रुतबा था जैतहरी भर में. रुतबा इसलिए नहींं कि वे बलशाली थे या उनका किसी प्रकार का आतंक था, दरअसल वे बहुत ताकतवर थे. पूरे गांव में उनकी बात टालने की हिम्मत किसी में नहीं थी. उनकी ताकत थी उनका सद् व्यवहार और सबसे प्रेमपूर्ण सम्बंध. रुपए-पैसे की कोई कमी न थी फिर भी उसे और बढ़ाने की चाहत थी क्योंकि उनका मानना था कि पैसा यदि बढ़ाया न जाए तो घटने लगता है. वे अपना नाम जैतहरी के इतिहास में दर्ज करवाना चाहते थे इसलिए निरंतर प्रयासरत रहते थे. संतोष करना और शांति से रहना सामान्य लोगों की सोच होती है, असामान्य लोग सदैव आगे बढ़ने के प्रयास में लगे रहते हैं, वे लगातार बेचैन रहते हैं, संतोष और शांति शब्द उनके शब्दकोष में नहीं होते.
ठाकुर साहब की पत्नी मालती को गुजरे सात साल हो गये हैं, मालती के जाने के बाद उनकी ज़िंदगी अधूरी सी हो गई. मालती थी तो उनकी घर में चलती थी, मालती के जाने के बाद वे धीमे पड़ गए. पहले दिन से शाम तक में सात-आठ कप चाय पी लेते थे, अब केवल दो चाय में ज़िंदगी सिमट गई है, एक सुबह और एक शाम. हां, कोई मेहमान आ गए तो ज्यादा हो जाती है. बहुएं मना नहीं करती लेकिन उन्हें बिना-वज़ह तंग करना ठाकुर साहब को उचित नहीं लगता क्योंकि दोनों बहुएं शहरों से आई हैं, इस वज़ह से जितना कर देती हैं, उतना ही बहुत है. जब कभी मालती की याद आती है ठाकुर साहब की आंखें नम हो जाती हैं.
इस जीवन के खेल भी अज़ब हैं, न जाने कौन है जो हंसाता भी है और रुलाता भी है. उनका दिल करता है 'मालती के पास चला जाऊं' लेकिन अपनी सांसों का आना-जाना उनके हाथों में नहीं है. अब तो उनकी जीने की चाहत नहीं रही लेकिन मरने में डर भी तो लगता है. अजीब बात है, मरने की इच्छा है लेकिन जीने की मज़बूरी भी है. यही द्वैत मनुष्य को सही ढंग से जीने नहीं देता. उम्र बढ़ने के साथ-साथ शरीर के अंग कमजोर पड़ने लगते हैं, याददास्त कमजोर होने लगती लेकिन इच्छाएं उसी तरह बलवती होती हैं जिस तरह जवानी में हुआ करती थी. जब तक सांस है, तब तक आस है. आस अच्छे दिनों की रहती है लेकिन आने वाले दिन जैसे इंसान से बदला लेने के लिए उतारू रहते हैं.
ठाकुर साहब के घर आज कांग्रेस के प्रत्याशी नरपत सिंह आए हुए हैं. नरपत सिंंह के साथ उनके चार साथी भी आए हुए हैं.
'ठाकुर साहब, आपका आशीर्वाद चाहिए.' नरपत सिंह ने विनयपूर्वक कहा.
'ये कोई कहने की बात है? हम तो हमेशा आपके साथ रहे हैं.' ठाकुर साहब ने मुस्कुराते हुए कहा.
'वो तो है लेकिन इस बार चुनाव में चुनौती जरा कड़ी है. सामने वाला उम्मीदवार मजबूत है.'
'उससे कुछ नहीं होता. जनता के बीच आप लोकप्रिय हैं, इसका लाभ आपको अवश्य मिलेगा.'
'वो तो है. कृपा दृष्टि बनाए रखिएगा.'
'वाह, आप तो जीत के जुलूस की तैयारी अभी से कर लीजिए.' ठाकुर साहब ने उनका हौसला बढ़ाया.
'अब मैं चलता हूं.' कहते हुए वे उठे और चल दिए.
ठाकुर साहब सोच रहे थे, राजनीति भी कमाल का खेल है, बिना संगमरमर के उम्मीदों के ताजमहल खड़ा देती है.
(दस)
सतीश के विवाह की तिथि नजदीक आ रही थी. दयालदास को चिंता थी कि बहू के लिए कपड़े और गहने आ जाते तो जरा सी बेफिक्री हो जाती. पति-पत्नी के बीच यह तय हुआ कि बिलासपुर से इनकी खरीदी की जाए. एक दिन दोनोंं बिलासपुर पहुंचे, गहने, कपड़े और रिश्तेदारों के लिए विदाई का सामान की खरीदी करके आ गये.
जैतहरी छोटी सी जगह है, यहां ऐसी कोई जगह नहीं है जहां विवाह के समय लड़की वालों को ठहराया जा सके इसलिए यह तय हुआ कि वैवाहिक कार्यक्रम कटनी से किए जाएं. निश्चित दिन सतना से लड़की वाले कटनी पहुंचे, धूमधाम से विवाह संपन्न हुआ, दयालदास और किरण अपनी बहू को लेकर घर आ गए. घर में ऊपर वाला कमरा नवविवाहित जोड़े को दे दिया गया. कुछ दिनोंं तक ठीक-ठाक चला उसके बाद बहू ने घर में होने वाली असुविधा का जिक्र सतीश से किया. सतीश भी उसकी परेशानी को महसूस कर रहा था, उसने पिता से अपनी तकलीफ बताई. दयालदास सतीश की शादी के पहले ही घर को बनवाना चाहता थे लेकिन आर्थिक व्यवस्था ने अनुमति नहीं दी, आखिर वह परेशानी सामने आ गयी. संकट यह था कि घर के पुनर्निर्माण के लिए यदि दुकान में लगी पूंजी लग गई तो व्यापार चौपट हो जाएगा और यदि घर नहीं बनता तो परिवार टूट जाएगा. सबने मिलकर चर्चा की और दूसरे विकल्प का चुनाव किया गया, सतीश के लिए एक किराये के घर की तलाश शुरू हुई. एक सप्ताह बाद दयालदास का घर सूना हो गया. नयी बहू के आने से किरण को जरा सा आराम मिला था लेकिन वे अच्छे दिन बहुत जल्दी समाप्त हो गए, किरण फिर से घर की अकेली बहू हो गई. किरण को कुछ दिनों से बहू के व्यवहार से आभास होने लगा था कि वह इस घर में खुश नहीं है. यद्यपि उसने कभी कुछ कहा नहीं लेकिन उसके चेहरे पर तनाव नजर आ रहा था. नई बहू के चेहरे पर जो मुस्कुराहट और खुशी दिखनी चाहिए, वह गायब थी. फिर भी, ऐसा अलगाव शादी के बाद इतनी जल्दी हो जाएगा, इसका अनुमान नहीं था.
'शहर की पढ़ी-लिखी लड़की लाए हो, उसे यहां का घर, परिवार और माहौल कहां से जमेगा?' किरण ने दयालदास से कहा.
'लड़की वाले तो यहां आकर सब देख-दाख कर गए थे, हमने तो उनसे कुछ छुपाया नहीं.'
'वह तो ठीक है लेकिन लड़की ने तो आकर नहीं देखा था न. उसे जब यहां का हाल मालूम हुआ तो उसका दिमाग फिर गया. वो गई तो गई, हमारे लड़के को भी ले गई.'
'ये तो एक न एक दिन होना ही था, अच्छा हुआ कि ये सब जल्दी हो गया, बाद में होता तो आपसी सम्बंधों में कड़ुवाहट आ जाती. अभी कम से कम वह बात नहीं है, प्रेम बना हुआ है.' दीनदयाल ने कहा.
'वो तो है.' किरण ने गहरी सांंस ली.
दयालदास के दोनों लड़के अब घर से बाहर हैं. एक जैतहरी में और दूसरा सेनफ्रांसिस्को में. अमेरिका वाला हरीश अपनी बहन की शादी में नहीं आ सका था और सतीश की शादी में भी शामिल नहीं हो सका क्योंकि उन दिनों उसकी परीक्षा चल रही थी. वैसे भी परिवार से आर्थिक सहयोग न मिलने के कारण वह खफा-खफा सा था. क्या पता कि परीक्षा चल रही थी या परीक्षा का बहाना था. दयालदास को यह फिक्र नहीं थी कि वह क्यों नहीं आया, वह तो दोनोंं बच्चों की शादी निपट गयी इस बात से खुश था. उसकी जिम्मेदारी खत्म हुई, अब लड़के जाने और उनका काम. दयालदास के दिमाग में एक और बात चल रही थी कि सतीश के लिए एक अलग दुकान करवा दी जाए. दुकान खोजने की जिम्मेदारी उसने सतीश के ऊपर डाल दी. एक दुकान किराये की मिल गयी, उसका फर्नीचर बनवा दिया और नयी दुकान में उसे बैठा दिया. इधर दयालदास अकेला पड़ गया लेकिन उसके पास पुराने नौकर थे इसलिए काम बन गया. दयालदास इस बात से खुश था कि इधर सतीश की शादी हो गयी और उधर उसका स्वतंत्र कारोबार हो गया.
समय का चक्र अनवरत चलते रहता है, यह पीछे नहींं होता, कोई उपाय नहीं है इसे पीछे करने का. इसकी तो आदत है आगे बढ़ने की. संसार बदलते रहता है, लोग इस दुनिया में आते हैं, जाते हैं. समय सबको बिना किसी प्रतिक्रिया के चुपचाप देखते रहता है, नाराज या खुश नहीं होता, जो मर्जी आए करो, जैसा दिल आए वैसा जियो, हंस कर जियो या रोकर जियो, किसी की ज़िंदगी से उसे कोई मतलब नहीं. सत्य यह है कि इस दुनिया में जो आया है उसे एक दिन जाना है. दरअसल समय सबका मालिक है. वही पूजनीय है, वही स्मरणीय है.
दयालदास वल्द वरियलदास बच्चे से युवा हुआ, फिर प्रौढ़, अब वृद्ध. छप्पन साल की उम्र में कोई बूढ़ा तो नहीं होता लेकिन उसके बड़े लड़के सतीश ने उसे बूढ़ा बना दिया. जब साथ में था तब दूकानदारी वह सम्भाला करता था, दयालदास गद्दी में बैठा हिसाब-किताब बनाते रहता था, धीरे-धीरे आलसी हो गया, अब जब सतीश साथ नहीं है तो दूकान की पूरी जिम्मेदारी दयालदास के सिर पर आ गयी. जब सतीश था तो दुकान सुबह आठ बजे खुल जाती थी और रात नौ बजे तक खुली रहती थी, अब ग्यारह बजे खुलती है, इस कारण से बिक्री में फर्क आ गया है लेकिन क्या करोगे? एक अकेला इंसान कितना कर सकता है? दूकानदारी में दूकानदार का ग्राहकों से संबंध बनाकर रखना जरूरी होता है. ग्राहक को जहां अच्छा सामान मिलेगा, सामान का मूल्य उचित होगा, उसकी जरूरत का पूरा सामान मिलेगा, वह वहीं से सामान लेना पसंद करता है. दयालदास का अब शरीर उतना साथ नहीं दे रहा है लेकिन उसका मन मजबूत है, उसी के सहारे अब परिवार चलेगा. अब उसे हरीश की शादी की चिंता घेर रही है लेकिन अमेरिका में क्या हो रहा है, उसे क्या पता?
(ग्यारह)
हरीश अपनी पढ़ाई के प्रति ईमानदार था इसलिए वह सभी टेस्ट पास करते चला आ रहा था. एक दोस्त था प्रदीप, उसके अलावा उसका कोई अन्य दोस्त न था, कुछ सहपाठियों से जान-पहचान अवश्य थी. उसकी एक सहपाठी थी नेहा. वैसे, दोनों की मुलाकात नहीं हुई थी लेकिन आमना-सामना होते रहता था. एक दिन कालेज में उसने इशारे से हरीश को रोका, 'हरीश.'
'येस.' हरीश ने रुककर उत्तर दिया.
'मैं नेहा, नेहा गोयल.'
'अच्छा लगा तुमसे मिलकर.'
'मैं कानपुर से हूं, तुम कहां से हो?'
'जैतहरी से, मध्यप्रदेश के एक गांव से.'
'आई सी.' नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा. 'क्या हम दोस्त बन सकते हैं?'
'हां, क्यों नहीं.' हरीश ने कहा. इस मुलाकात के बाद रोज मुलाकात होने लगी. हरीश को वह अच्छी लगने लगी. मुलाकातें अधिक होने लगी. नेहा को देखकर उसे फागुन के समय भारत में खिलने वाले पलाश के फूलों की याद हो आती. जब वह जैतहरी से बिलासपुर ट्रेन में बैठकर जाता था तो रास्ते में फरवरी और मार्च के महीने में अचानकमार के जंगल और अगल-बगल के खेतोंं में पलाश के वृक्ष जब फूलते तो उनके केसरिया रंग से मानो पूरी धरती सराबोर हो जाती. उस रंग के सामने प्रकृति के सारे रंग गुम हो जाते. पूरे वातावरण में जैसे आग सी लग जाती और और उस रंग का धधकना चारों ओर तारी हो जाता. जब वह नेहा से मिलता तो उसकी आंखोंं से पलाश के फूलों का रंग टपकता हुआ सा महसूस होता था. मदहोश करने वाली उसकी आंखों पर वह दिनोंदिन लट्टू होते जा रहा था.
एक दिन हरीश ने नेहा से पूछा, 'मुझसे शादी करोगी?'
'पर हम तुम तो दोस्त हैं, केवल दोस्त.' नेहा ने उत्तर दिया.
'वो बात तो सही है लेकिन क्या दो दोस्त आपस में शादी नहीं कर सकते?'
'कर तो सकते हैं लेकिन मेरी समस्या कुछ और है.'
'क्या समस्या है तुम्हारी?'
'मेरा परिवार.'
'परिवार कैसे समस्या बन सकता है?'
'मेरे मम्मी-पापा पुराने ख्यालात के हैं, वे मेरा विवाह अग्रवालों में ही करना पसंद करेंगे.'
'यह तो मेरी भी समस्या है. मेरे घर वाले भी ऐतराज कर सकते हैं.'
'फिर क्यों उन्हें दुखी करना?'
'परिवार की बात बाद में, पहले यह बताओ कि क्या तुम मेरा साथ दोगी?'
'जोड़ी तो जम जाएगी लेकिन निभेगी या नहीं.'
'यह संदेह तुम्हारे दिमाग में क्यों आया?'
'इसलिए कि मेरी और तुम्हारी परवरिश में फर्क है.'
'अपन दोनों हिंदुस्तानी हैं, मोटे तौर पर एक जैसी परवरिश में पले-बढ़े हैं.'
'लेकिन तुम सिंधी हो.'
'उसकी चिंता मत करो, शादी के बाद मैं अग्रवाल बन जाऊंगा और तुम सिंधी.' हरीश ने कहा. दोनोंं बहुत देर तक एक-दूसरे को देखते हुए हंसते रहे. 'तो बात पक्की रही?'
'अरे, इतनी जल्दी भी क्या है?'
'जल्दी है. तुमने रामचरित मानस तो नहीं पढ़ा होगा. मैं बताता हूं. जब लंकाधिपति रावण मृत्यु शैया पर था तब राम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को उनसे ज्ञान लेने के लिए भेजा था. रावण ने जो ज्ञान की बातें बताई उनमेंं एक यह थी कि जब कोई अच्छा कार्य करने का निर्णय लिया गया हो तो उसे शीघ्रातिशीघ्र क्रियान्वित कर देना चाहिए क्योंकि विलम्ब हो जाने पर मन बदल सकता है.'
'ये लो, रामचरित मानस की बात यहां कैसे आ गई?'
'बाद में तुम्हारा मन भी बदल सकता है.'
'मेरा मन तो तुम्हें अभी हाँ करने के बाद भी बदल सकता है.'
'बाद की बात बाद में, अभी तुम्हारा मन क्या कह रहा है, मैं यह जानना चाहता हूँ.'
'फिलहाल मेरे मन में ऐसी कोई बात नहीं है, इस विषय पर विचार करके कुछ कह सकूंगी.'
'मतलब, गई भैंस पानी में.'
'नहीं, तुम्हारी भैंस भी पानी में उतरा रही है, डूबी नहीं है.' नेहा ने कहा. हरीश उसे संशय की दृष्टि से देखता रहा, नेहा ने 'बाय' कहा और वहांं से चली गई.
सेनफ्रांसिस्को से बहुत दिनों बाद फोन आया है. दयालदास से बात हो रही है. 'कहो बेटा, क्या हाल है, कैसे हो, बहुत दिनों बाद फोन किए?' दयालदास ने सवालों की झड़ी लगा दी.
'मैं ठीक हूं बाबा.' उधर से उत्तर आया.
'बोलो.'
'एक काम था.'
'हां, बताओ.'
'आपकी इज़ाज़त चाहिए बाबा.'
'कैसी इज़ाज़त?'
'मुझे यहाँ एक लड़की पसंद आ गई है, आपकी बहू बनाना चाहता हूं.'
'यह तो बहुत खुशी की बात है. रुको, तुम्हारी मांं को खबर करता हूं.' दयालदास ने किरण को आवाज लगाई, 'किरण, यहाँ आओ, खुशखबरी है.' किरण दौड़ती-भागती आई, 'कैसी खुशखबरी?'
'हरीश ने अपने लिए लड़की पसंद कर ली है.'
'हेलो, हरीश बेटा, कैसे हो?'
'ठीक हूं मां, आप कैसी हो.'
'बढ़िया. बाबा बता रहे हैं कि तुमने अपने लिए लड़की पसंद कर ली?'
'हां मां, कानपुर में उसके माता-पिता रहते हैं, लड़की मेरे साथ यहां सेनफ्रांसिस्को में पढ़ती है.'
'क्या नाम है उसका?'
'नेहा गोयल.'
'अच्छा, तो लड़की अग्रवाल समझ में आ रही है.'
'हां मां. उनके परिवार वाले इस सम्बंध के लिए राजी हैं.'
'तुमने उनसे बात भी कर ली?'
'नहीं, नेहा ने खुद उनसे बात की और उनकी मंजूरी ले ली.'
'फिर तो अच्छा है, सच में खुशखबरी सुनाई तुमने. लो बाबा से बात करो.' किरण ने फोन दयालदास को दिया. 'हां बोलो हरीश.'
'जी बाबा, तो फिर आप दोनों की हां है न ?'
'हांं ही समझो.'
'ऐसा क्योंं कह रहे हैं बाबा?'
'हमारे पास तुम्हारे इस फैसले का कोई आप्शन नहींं है. फैसला तो तुमने कर लिया है, तुम तो हमें सिर्फ सूचना दे रहे हो.'
'आप मना कर सकते हैं.'
'मैं मना करूंगा तो तुम मेरी बात मान जाओगे क्या?'
'मैंं आपकी बात पर विचार करूंगा.'
'फिर?'
'फिर, आपको समझाऊंगा कि आपको पुनर्विचार करना चाहिए.'
'फिर?'
'शादी तो नेहा से ही होगी.'
'मैं वही कह रहा था कि फैसला हो चुका है, तुम्हें हमारी मंजूरी की जरूरत नहीं है, शादी तुम्हारी है, तुम कर रहे हो, कहां आना है, कब आना है, बता दो तो हम लोग पहुंच जाएंगे.'
'बाबा, आप नाराज हो गए क्या?'
'नहीं बेटा, नाराज होने की गुंजाइश नहीं रह गई है. सोच रहा हूंं कि जमाना कितना बदल गया, इतना कुछ हो गया और हमें खबर तक नहीं लगी.'
'ओके बाबा, मैं शादी की तारीख और जगह फायनल होते ही आपको खबर कर दूंगा, आप सब आ जाइएगा.'
'ठीक है.' दयालदास ने फोन रख दिया. किरण दयालदास से भिड़ गई, 'तुमने इस ढंग से क्यों बात की उससे?'
'न हमने लड़की को देखा, न उसके मां-बाप से मिले, न उसका घर देखा, शादी पक्की हो गई. हमें वह केवल सूचित कर रहा है तो गुस्सा नहीं आएगा?'
'उसने शादी करने के बाद नहीं, पहले हमें बताया है.'
'इसका मतलब ये हुआ कि उसने शादी के पहले बता कर हमारे ऊपर अहसान किया?'
'बात को इतना बढ़ा क्यों रहे हो? समझते क्यों नहीं कि वह अमेरिका में रह रहा है, भारत में नहीं. वहां की बात कुछ और है और यहां की कुछ और.'
'तुम उसकी मां हो, तुम तो उसकी वकालत करोगी.'
'तुम उसके बाप हो कि नहीं? तुमको खुश होना चाहिए कि उसने खुद रिश्ता देख लिया, नहीं तो तुमको इधर-उधर भटकना पड़ता. अच्छा ये बताओ, अगर वह वहां कोर्ट मैरेज कर लेता और उसके बाद बताता तो तुम्हें कैसा लगता? उसने यह तो नहीं किया. अरे, वो खुश तो अपन खुश.' किरण ने समझाने की कोशिश की. दयालदास चुप हो गया क्योंकि बात खुशी की आ गई.
निश्चित तिथि पर कानपुर में दोनोंं का विवाह सम्पन्न हो गया. वहीं से नव-विवाहित जोड़ा हनीमून मनाने के लिए कुल्लू-मनाली चला गया. हनीमून से वापस जैतहरी आये, दो दिन रुके और अमेरिका जाने के लिए दिल्ली निकल गये.
(बारह)
व्यापार करने का मतलब है, अपना सामान बेचना. सामान कौन सा? वह सामान जिसकी ग्राहक को जरूरत हो. ग्राहक की जरूरतें अनंत होती हैं जिसका पता करना किसी भी व्यापारी के लिए अनिवार्य होता है. आज जिस चीज की उसे जरूरत है, कल नहीं रहेगी. कल जिसकी होगी, परसों नहीं रहेगी. ग्राहक की मांग दिनोंंदिन बदलती रहती है या घटती-बढ़ती रहती है. व्यापारी के लिए यह बहुत बड़ा सिरदर्द होता है. खास तौर से किराना और कपड़े की दूकानदारी करने वाले इस समस्या से रोज जूझते हैं. इनका बिना बिका हुआ सामान बिना मोल का हो जाता है, दूकान में जगह अलग घेरता है.
यही हाल परिवार में बुजुर्गों का होता है. अधिक उम्र की विवशता उन्हें अक्षम बना देती है, इसका लब्बोलुआब यह होता है कि वह इंसान किसी काम का नहीं रह जाता और उनकी उपस्थिति युवा और अधेड़ पीढ़ी के लिए बोझ बन जाती है. एक पेंच और है, वृद्ध व्यक्ति का शरीर शिथिल हो जाता है लेकिन वह मानसिक रूप से सक्रिय रहता है. उसका दिमाग तेज चलता है और जुबान भी तेज चलती है. भले ही थोड़ा सा खाता हो लेकिन उसका चटोरापन बढ़ता जाता है. कुछ समय तक तो परिवार के लोग सह लेते हैं लेकिन यदि उसका बुढ़ापा लम्बा खिंच गया तो फिर उसके प्रति उपेक्षा शुरू हो जाती है और जीवन कठिन हो जाता है. न सांस जाती है, न मौत आती है, बस, यूं ही जिंदगी घिसटती हुई किसी तरह बीतती है.
दयालदास को अभी मृत्यु तक पहुंचने में देर है. बड़ा लड़का है तो इसी गांव में लेकिन वह कम आता-जाता है. छोटा अमेरिका में है तो उसका आना असम्भव जैसा है. दयालदास की उम्र बढ़ रही है किंतु अभी वह समर्थ है. दूकान का काम अच्छी तरह से कर रहा है, घर-गृहस्थी की देखभाल किरण के जिम्मे है. दयालदास को दूकानदारी के अलावा और कोई काम नहीं आता क्योंकि बचपन से वह व्यापार से ही जुड़ा हुआ है. स्वभाव से डरपोक है, व्यापारी है तो डरपोक तो होगा ही. व्यापार का डर से चोली-दामन का साथ है. उसे व्यापार करने से डर नहीं लगता, व्यापार करने की वज़ह से डर लगता है. उसे सरकारी जांच से डर लगता है, पुलिस के दखल से डर लगता है, ग्राहकों को उधार देने से डर लगता है, नौकरों की गैरहाज़िरी और उनके द्वारा की जाने वाली चोरी से डर लगता है आदि अनेक डर उसके मस्तिष्क में हमेशा सवार रहते हैं. अब एक नया डर उसे लगने लग गया है, उसके दोनों लड़के उससे दूर हो गये हैं, अगर हमें कोई गम्भीर बीमारी हो गयी तो क्या होगा? हमारी वृद्धावस्था में हमारा क्या होगा? हम दोनों में से जब कोई एक कम हो जाएगा तब क्या होगा? इस प्रकार के सवाल आजकल उसके दिमाग में घूमते रहते हैं.
सवाल हैं तो मन में उठेंगे ही. यह जीवन उन्हीं सवालों के जवाब खोजने की यात्रा है. उलझन तब होती है जब कुछ सवाल इस कदर उलझे हुए होते हैं कि उनका ओर-छोर पकड़ में नहीं आता. दिमाग काम नहीं करता, तब मनुष्य उनके जवाब खोजना स्थगित करके उनका निर्णय समय के ऊपर छोड़ देता है. जो होगा, देखा जाएगा.
(तेरह)
छत्तीसगढ़ में अमरकंटक का क्षेत्र वनाच्छादित है. इस कारण से यहाँ का मौसम आसपास के क्षेत्रों की तुलना में थोड़ा ठंंडा और खुशनुमा रहता है. शीतऋतु में इस क्षेत्र में पहाड़ी ठंड होती है, हाड़ कँपा देने वाली ठंड. जैतहरी अमरकंटक से करीब है इसलिए यहाँ भी ठंड का ऐसा ही असर रहता है. ऐसे मौसम में प्रभा के घर में नया मेहमान आया, उसके बेटे और बहू को लड़का हुआ. जैतहरी में शीतलहर का प्रकोप था, ऐसे में नवजात शिशु को ठंड से बचाना जरूरी था. एक कोने में गोरसी में कंडे सुलगा कर कमरे को गर्म रखने का प्रयास किया गया. सबसे बड़ी समस्या सुबह के समय होती थी जब नंग-धड़ंग बच्चे की मालिश की जाती थी. प्रभा बच्चे को अपने पैर फैला कर, उस पर लिटा देती थी, उसके बाद पूरे बदन में सरसों तेल की मालिश होती थी. बच्चा लगातार 'क्यों-क्यों' रोता रहता था, उसे क्या मालूम कि जब वह बड़ा हो जाएगा तो वह वैसी मालिश के लिए तरसेगा. बच्चों का बचपन आरामदेह होता है. दिन भर में 21-22 घंटे की नींद, जगे तो दूध पिलाया जाएगा, हगे-मूते तो सफाई की जाएगी. आराम से पैर पसारे लेटे रहो, सारी क्रिया सम्पन्न करवाने के लिए माँ-दादी-नानी लगी रहती हैं. बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होने लगता है, उसे आत्मनिर्भरता सिखाई जाती है, ये आत्मनिर्भरता पूरी ज़िंदगी भर लिए अनिवार्य हो जाती है. मनुष्य के सर्वाधिक प्रिय विश्राम में कष्टदायक बाधा.
उन दिनों हर साल एक बच्चा हो जाता था. विकास और नीलम के तीन बच्चे हो गये. दो लड़के और एक लड़की, चार साल में तीन बच्चे. प्रभा का समय बच्चों की देखभाल में और नीलम का चौका-बर्तन, कपड़े और घर की साफ-सफाई में लगा रहता. प्रभा और नीलम के बीच अच्छा तालमेल था, दोनोंं एक-दूसरे को दिल से चाहते थे. आज चूल्हे में दाल और चावल का बटुआ चढ़ा हुआ था. सास-बहू में कुछ बातें चल रही हैं :
'तुम्हारी शादी हुए चार साल हो गया, आज तक तुम्हारी अम्मा और बाबू जी जैतहरी नहीं आए?' प्रभा ने पूछा.
'आप बुलाओगी तो क्यों नहीं आएंगे? वैसे, उनको लड़की की ससुराल में जाने में संकोच होता है.' नीलम ने उत्तर दिया.
'गया जमाना पुराना जब लड़की की ससुराल में पानी तक नहीं पीते थे, अब समय बदल गया. यहाँ आएं रहें और खाएं-पिएं.'
'तो आप एक चिट्ठी लिख दीजिए तो शायद उनका आने का मन बन जाए.'
'ठीक है, लिखती हूंं. एक बात बताओ, तुम्हारा मन नहीं होता अपने मायके जाने का?'
'होता तो है लेकिन आप अकेली पड़ जाओगी इसलिए नहीं जाती.'
'तुमको इतना ख्याल है मेरा?'
'हां अम्मा जी, आपका ख्याल मैं नहीं रखूंगी तो और कौन है आपका?' नीलम ने कहा. प्रभा की आंखों में आँसू आ गये, उसने बहू की उंगलियोंं को अपनी उंगलियों से थामा और बहुत देर तक थामी रही.
नीलम ने धीरे से अपनी उंगलियां अलग करते हुए कहा, 'लगता है चावल पक गया है, देखूँ जरा.'
रिश्ते इस संसार में बनते हैं, बिगड़ते हैं. बने हुए रिश्तों को संभालना मुश्किल काम है. रिश्ते लम्बे समय तक चलें इसके लिए समझदारी के साथ-साथ सद्भावना और धीरज की ज़रूरत होती है. कई बार कुछ ऊंचा-नीचा हो जाता है, उस वक्त दोनों की समझदारी से संतुलन बनता है. कई बार उनमें से एक ज़िद में आ जाता है, तब दूसरे का संयत होना आवश्यक होता है. बात-बिना-बात मनमुटाव हो जाता है, बातचीत बंद हो जाती है, एक-दूसरे की ओर देखना छूट जाता है. ऐसी हालत में क्या किया जाए, यह ऐसी समस्या है जो अब तक अनसुलझी है.
रिश्ते बनाने और निभाने के लिए सकारात्मक सोच जरूरी होता है. जब दोनों पक्ष एक जैसा सोच रहे हों तब तो सहज रूप से बात बन जाती है लेकिन जब विपरीत विचारधारा से सामना होता है, उस समय बने हुए रिश्ते को निभाना मजबूरी जैसा हो जाता है, जैसा कि पति-पत्नी सम्बंधों में दिखाई पड़ता है. इन दोनों का पारिवारिक और समाजिक परिवेश अलग-अलग होता है, प्रचलित समाजिक अनुष्ठान के बाद दोनों एक साथ रहने के लिए सहमत हो जाते हैं किंतु दोनों की सोच में जो विरोधाभास होते हैं वे धीरे-धीरे उभर कर सामने आ जाते हैं. आपसी बहस और विवाद होते हैं, समय-समय पर मतभेद होते हैं लेकिन मनभेद न हो जाए इसके प्रयास भी चलते रहते हैं. ऐसे में तालमेल बना कर चलना स्वाभाविक नहीं रहता, मजबूरी बन जाता है. मजबूरी में चल रहे इन परस्पर सम्बंधों के बावजूद इन रिश्तों की आयु लम्बी होती है और ये आजीवन बने रहते हैं.
ऐसा ही नाजुक रिश्ता होता है सास और बहू का. जब नयी बहू घर में प्रविष्ट होती है तो बाहरी तौर पर सास का चेहरा चमकता हुआ दिखाई पड़ता है लेकिन उसके दिल में घबराहट रहती है, 'आ गयी ये, मेरे वर्चस्व पर कब्जा करने वाली.' देखने में यह आया है कि सास-बहू के सम्बन्धों में मधुरता बनाए रखने के लिए जो यत्न किए जाने चाहिए वे नहीं होते। इसमें सबसे बड़ी बाधा है- वर्चस्व का हस्तांतरण। कोई भी जीते-जी अपनी सत्ता दूसरे व्यक्ति को नहीं सौंपना चाहता क्योंकि सत्तासीन को असुरक्षा का भय रहता है। शुरू के दिनों में बहू सास के निर्देशों को सुनती है, उनका पालन करती है लेकिन धीरे-धीरे अवज्ञा करने लगती है क्योंकि सास की लगातार दखलंदाजी बहू को सहन नहीं होती. सास का चलन पुराना रहता है जबकि बहू नये ढंग से अपनी गृहस्थी बसाना चाहती है. यहींं पर अंतर्विरोध उभरने लगते हैं और उन दोनों में जो ताकतवर होता है, वह दूसरे पर हावी हो जाता है. सास तेज हुई तो बहू को दबा लेगी और बहू तेज हुई तो सास दब जाती है. संयोग से दोनों तेज हो गये तो फिर घर में महाभारत प्रारम्भ हो जाती है जिसका अंत परिवार में टूटन के रूप में परिलक्षित होता है. इस विवाद से बचने के दो रास्ते हैं, पहला, कि घरेलू वर्चस्व को दो हिस्सों में बाँट लिया जाए. जैसे, किचन का काम और घर के बाहर का काम बहू के जिम्मे और घर के अंदरूनी काम सास के जिम्मे, अर्थात सिंहासन के दो टुकड़े कर लिए जाएं और चुपचाप अपना-अपना कार्यक्षेत्र देखें. दूसरा रास्ता है कि दोनों आपस में ऐसी समझ विकसित कर लेंं कि दोनों एक-दूसरे के काम में दखल न दें और घर-गृहस्थी को शांतिपूर्वक चलने दें, अर्थात सिंंहासन में दोनों थोड़ी जगह बना कर अगल-बगल बैठ जाएं. प्रभा और नीलम ने दूसरे रास्ते को स्वीकार कर लिया है इसलिए दोनों में आपसी प्रेम और सौहार्द्र है.
विकास की दूकान शुरू हुए पांच-छः साल हो गये. ग्राहकी अच्छी जम गयी है. कुछ पैसा हाथ में है. उसके मन में आया है कि घर छोटा पड़ता है, उसे पक्का बनवा लेते, एक मंजिल ऊपर बन जाती तो सबको आराम हो जाता. इस विचार को साकार करने के लिए विकास ने अपने पड़ोस में एक घर किराये से ले लिया और अपने घर को धराशायी करके नया निर्माण शुरू करवा दिया. साल भर में नया घर तैयार हो गया.
आज गृहप्रवेश है. इस अवसर पर नीलम के मायके से भी परिवार के सभी लोग आये हुए हैं. मोहल्ला पड़ोस के अतिरिक्त गाँव के कुछ परिचितों को भी आमंत्रित किया गया है. बधाइयों का ताँता लगा हुआ है. प्रभा की पड़ोसन कस्तूरी भी आयी हुई है. दोनों के बीच बातचीत हो रही है :
'मुझे बहुत खुशी हो रही है प्रभा, सच में.' कस्तूरी ने कहा.
'आपका आशीर्वाद है दीदी. मुझे आज भी वो दिन याद है जब मेरे घर में अन्न न होने के कारण चूल्हा नहीं जला था तब आपने हमारी मदद की थी.' प्रभा की आँखों में आँसू आ गये.
'अब भूल जा उन सब बातों को. जब अच्छे दिन आते हैं तो सब ठीक हो जाता है. फिर, तुम दोनों की मेहनत रंग लाई.'
'बहू भी अच्छी मिली दीदी.'
'हाँ, नीलम की खूब तारीफ सुनी है मैंने.'
'बहुत ख्याल रखती है मेरा.'
'बहू हो तो ऐसी. अच्छा ये बताओ कि आज क्या खिला रही हो?'
'चलो दीदी, खुद देख लो.' प्रभा ने कस्तूरी का हाथ पकड़ा और ऊपर ले गई जहाँ सब लोग भोजन कर रहे थे.
(चौदह)
ठंड का मौसम है. ठाकुर साहब लकड़ी की आराम कुर्सी पर बैठे ताज़ा अखबार पढ़ रहे हैं. उनका छोटा बेटा प्रह्लाद सिंंह उनके सामने आकर खड़ा हो गया. ठाकुर साहब ने नज़रें उठाकर देखा और पूछा, 'कोई काम है क्या?'
'मैं घर से अलग रहना चाहता हूं.' उसने कहा.
'ठीक है. रहो.'
'आपकी अनुमति है?'
'है.'
'कहाँ रहूं?'
'जहां तुम्हारा मन हो.'
'मन तो है पर घर नहीं है.'
'फिर यहीं रहो.'
'यहां नहीं रह सकता.'
'क्यों?'
'विक्रम से मेरी नहीं जमती.'
'अगर विक्रम से नहीं जमती तो फिर संसार में तुम्हारी किसी से नहीं जमेगी.'
'आप विक्रम के पक्ष में बोल रहे हैं.'
'मैं सही बात कह रहा हूं.'
'आपको सही बात मालूम नहीं है.'
'क्या नहीं मालूम?'
'यही कि विक्रम अपने बड़े होने का रोब बताता रहता है.'
'तो क्या हुआ?'
'क्या हुआ? कुछ दिन पहले इस संसार में आ गया तो वह मुझ पर रोब झाड़ेगा?'
'ऐसा तो सभी बड़े भाई करते हैं, पर विक्रम ऐसा नहीं है.'
'इसका मतलब यह है कि मैं गलत बोल रहा हूँ.'
'गलत नहीं हो लेकिन तुम्हारे समझने में कोई भूल हो रही है.'
'क्या भूल हो रही है मुझसे?'
'यही कि मैं विक्रम को जितना जानता हूँ, दब के रहने वाला इंसान है, वह दबाव बनाने वाला नहीं है.'
'फिर आप कुछ नहीं जानते.'
'पर मैं तुमको भी जानता हूं.'
'क्या जानते हैं?'
'यही कि तुम बहुत भोले हो लेकिन तुम्हारा गुस्सा बहुत तेज है.'
'ये बात तो है पिता जी.'
'तो, गुस्सा थूक दो और चुपचाप अपने कमरे में जाओ.' ठाकुर साहब ने फैसला सुनाया. प्रह्लाद सिंह वापस लौट गया. थोड़ी देर बाद दोनों भाई आगे-पीछे बैठकर बाइक में घूमने निकल गए.
ऐसे दृश्य इस घर में अक्सर में दिखाई पड़ते हैं. जरा सी बात में झगड़ा तो झटपट सुलह. पर सभी घरों में ऐसा नहीं होता. आम तौर पर अंतर्विरोध धीरे-धीरे अंदर ही अंदर सुलगते रहते हैं और जब सीमा पार कर जाते हैं तो विस्फोट का रूप धारण कर लेते हैं. इस किस्से में दोनों भाइयों की घरवालियों के बीच गज़ब का तालमेल है. दोनों एक दूसरे पर जान छिड़कती हैं. वैसे देखा गया है कि दो सगी बहनोंं में नहीं पटती और जेठानी देवरानी में पटने की बात तो असम्भव जैसी है लेकिन यहां मामला अलग है. दोनों एक सुर में गाती हैं, एक अंतरा पूरा करती है तो दूसरी मुखड़े को उठाती है. छोटे भाई ने अपनी पत्नी को भाभी से लड़वाने भिड़ाने की बहुत कोशिशें की लेकिन असफल रहा.
ठाकुर साहब की पत्नी के निधन के बाद दोनों बहुओं ने बखूबी घर को संभाल लिया यह ठाकुर साहब के लिए बेहद तसल्ली और खुशी की बात है.
ठाकुर साहब ने आवाज़ दी, 'बहू.'
'जी, पिताजी.' दो स्वर एक साथ उठे. दोनों बहुएंं अपने सिर पर पल्लू लिए उनके सामने खड़ी हैं.
'मैने तो एक को बुलाया था, दोनों कैसे?'
'मैं समझी मुझे बुलाया.' बड़ी बहू ने कहा.
'नहींं, पापाजी इस समय रोज मुझे बुलाया करते हैं.' छोटी बहू बोली.
'अच्छा चलो, दोनोंं आ गई, अच्छा हुआ. आज पकौड़े खाने का मन कर रहा है, कौन बनाएगा?'
'मैंं बनाती हूं.' कहती हुई बड़ी बहू किचन की तरफ बढ़ गई और छोटी उसके पीछे लग गई. आधे घंटे के भीतर पकौड़ों की प्लेट लेकर छोटी बहू हाज़िर हो गई. आलू, प्याज और हरी मिर्च के पकौड़े, साथ में टमाटर की हरी चटनी. ठाकुर साहब ने खाना शुरू किया और थोड़ी देर बाद उनकी आँखों से आंसू बहने लगे.
'पापा जी, मिर्च तीखी लगी क्या?' छोटी बहू ने पूछा,
'नहीं बेटा, तुम्हारी सासू माँ की याद आ गई. वह भी इतने प्यार से मेरे लिए बना कर लाया करती थी.'
'अब माँ जी के हाथों से बने पकौड़ों का स्वाद तो हमारे हाथों में नहीं आ सकता लेकिन जब भी आपका मन हुआ करे, इसी प्रकार आप आदेश दिया करें, गरमागरम आपके सामने होंगे. अब चाय बनाकर लाऊं आपके लिए?'
'हाँ, ले आओ लेकिन कप में नहीं, स्टील के गिलास में लेकर आना, आज पुराने दिन याद आ रहे हैं.' ठाकुर साहब ने अपने आंसू पोछते हुए कहा.
(पंद्रह)
हम सब यात्री हैं. अपने माता-पिता के संयोग से डेढ़ बित्ता के बच्चे के रूप में इस भूखण्ड में आए, हमारी जीवन यात्रा शुरू हुई. इसी धरती ने हमें पोषण दिया, हमारा शरीर विकसित हुआ. इस जीवनयात्रा में मनुष्य के रूप में उत्पन्न होना विशेष महत्व का है क्योंकि इसमें सोचने-विचारने की व्यापक शक्ति होती है. मनुष्य इस यात्रा में अपनी यात्राएं करता है. जीवनयापन के लिए या ज्ञान अर्जित करने के लिए की जाने वाली ये यात्राएं उसकी जीवनयात्रा का अंग होती हैं. मनुष्य इधर से उधर भटकता रहता है, गतिमान रहता है लेकिन जहां भी रहता है, धीरे-धीरे वहीं रम जाता है. वहां की धरती, वहां का मौसम, वहां के लोग उसे अच्छे लगने लगते हैं. जीवन में स्थायित्व आ जाता है लेकिन उस व्यक्ति के बाद की पीढ़ी की आंखें किसी नयी जमीन को तलाशती हैं, किसी बड़ी संभावना की तलाश में वह निकल पड़ता है. इस तरह जीवनयात्रा में भी अनेक यात्राएं चलती रहती हैं.
हरीश और नेहा भारत से अमेरिका ज्ञान की तलाश में आए हैं. उनकी पढ़ाई अब अंतिम छोर पर थी. इसके पश्चात क्या किया जाए, यह बात चल रही है. हरीश ने नेहा से पूछा, 'तुम्हारा क्या इरादा है? यहाँ रहोगी या इंडिया जाओगी?'
'मैं क्या बताऊंं? मेरे पापा जो कहेंगे वह मानूंगी.' नेहा ने उत्तर दिया.
'और मैं जो कहूंगा?'
'उस पर विचार करूंगी.'
'मतलब यह है कि मैं दूसरे स्थान पर हूं.'
'पहले या दूसरे स्थान की बात नहीं है, उन्होंने मुझे अमेरिका पढ़ने के लिए भेजा है इसलिए उनसे राय लेना मुझे जरूरी लगता है. उनसे पूछूंगी, हो सकता है कि वे कोई निर्णय देने के पहले तुम्हारी मंशा भी जानना चाहेंगे.'
'मेरी मंशा क्या है?'
'यह तो तुम बताओगे.'
'पर तुमने मुझसे तो पूछा ही नहीं?'
'अच्छा बताओ, तुम्हारा इरादा क्या है?'
'तुम्हारे पापा को बताऊंंगा.'
'ये तो बदमाशी है.'
'बदमाशी कैसे हुई? तुमने ही पापा को बीच में डाला.'
'यार, तुम बात बहुत पकड़ते हो.'
'तो क्या करूं? अब तुम मेरी पत्नी हो और तुम्हारे भविष्य के बारे में विचार करने के लिए मैं तुम्हारे पापा के बाद हूं.'
'इसका मतलब यह हुआ कि मेरी शादी हो गयी है इसलिए मुझे अपने पापा के योगदान को भुला देना चाहिए?'
'ऐसा मैंने कब कहा?'
'तुम्हारा आशय यही है.'
'नहीं. तुमने पापा को बीच में डाला इसलिए मैं बीच में आ गया. असल में, मेरी राय में यह निर्णय तुम्हें खुद लेना चाहिए.'
'मेरा इरादा तो भारत जाने का है और तुम्हारा?'
'मेरा यहीं रहने का है. मैं यहींं रहना चाहता हूं.'
'यानी विपरीत सोच?'
'हाँ, हाल-फिलहाल तो ऐसा ही है.'
'मैंं पुनर्विचार करती हूं. मैं अपना देश छोड़ सकती हूं लेकिन तुम्हें हर्गिज़ नहीं.'
'अच्छे से विचार करो और सोचो कि भारत में क्या है?'
'क्या है? वहाँ की मिट्टी की सुगंध, वहाँ के लोग, वहाँ के मधुर संबंध यहाँ कहाँ? जैसी भी है, हमारी मातृभूमि है.'
'जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय भावुकता में लेना उचित नहीं होता.'
'मुझे वहाँ की बहुत याद आती है. सच पूछो तो यहाँ मेरा दिल नहीं लगता. थोड़ा कम कमाएंगे लेकिन अपनों के बीच रहेंगे. वहाँ दुख-सुख के साथी मिलेंगे, यहाँ कौन है अपना? '
'दिल से नहीं, दिमाग से काम लो मेरी रानी. यहाँ जैसी नौकरी और यहाँ जैसी सुविधाएं वहाँ कहाँ?'
'तुम्हें वहाँ की याद नहींं आती? बिल्कुल लगाव नहीं है तुम्हें अपने देश से.'
'सच बताऊं? याद आती है लेकिन लगाव नहीं रहा.'
'ओह.' नेहा ने दुखी भाव से कहा. 'मुझे लगता है कि तुम अपने पापा से अभी तक नाराज हो.'
'मेरी पापा से नाराजगी कोई मुद्दा नहीं है, सबसे पहले मुझे अपने दोस्त से लिए कर्ज को पटाना है.'
'इसे तुम भारत में रहकर भी पटा सकते हो.'
'वहाँ बहुत समय लगेगा, यहाँ सेलरी वहाँ के मुकाबले अधिक है.'
'तो, कर्ज पटाने तक यहाँ रुक जाते हैं, उसके बाद वहाँ चले जाएंगे.'
'तुम वहाँ जाने के लिए इतना जोर क्यों दे रही हो?'
'क्योंकि मैं भारत जाना चाहती हूं और तुम्हें भी ले जाना चाहती हूं.'
'इस बात का क्या अभी निर्णय लेना है?'
'नहीं, अभी तो देर है लेकिन चर्चा अभी से शुरू करना जरूरी है.'
'तुमने अपना मंतव्य बता दिया और मैंने अपना, हम दोनों एक-दूसरे के विपरीत हैं. तो, निष्कर्ष क्या निकला?'
'यही कि विचारों में मतभेद है. कोई बात नहीं है, सोच-विचार जारी रहना चाहिए.' नेहा ने वार्तालाप रोका.
(सोलह)
दयालदास के पिता वरियलदास पाकिस्तान के सिंध प्रांत को छोड़ कर भारत आए. यह देश विभाजन के कारण की गई मजबूरी की यात्रा थी. उसका एक ही संतान थी, दयालदास जिसके तीन बच्चे हुए. वे तीनों भी अपनी यात्राओं में निकल गए. वह अब घर में वह और उसकी पत्नी किरण बच गयी है. उसका धंधा भी मंदा पड़ गया है. बड़े लड़के के घर छोड़ने के बाद उसके व्यापार में सहयोग देने वाला कोई न बचा. अकेला इंसान कितना कर सकता है? दूकान में बैठे तो कितनी देर बैठे? माल खरीदी के लिए कब और कैसे जाए? दूकान में बैठे-बैठे जितना माल मंगवाया जा सकता है उतना आ जाता है लेकिन मंहगा पड़ता है और क्वालिटी भी ठीक नहीं रहती. बढ़ती उम्र के कारण अब शरीर भी उतना साथ नहीं देता. जब कभी बुखार हो जाता है तो दूकान बंद रहती है इस कारण ग्राहक भटक जाते हैं. दो-दो लड़के होने के बाद भी उसका साथ देने के लिए कोई नहीं है. एक विदेश में है तो दूसरा जैतहरी में रहते हुए भी विदेश में रहने जैसा है. कभी-कभार आकर अपना चेहरा दिखा जाता है और बहू तो जैसे घर का रास्ता ही भूल गयी है. हंसती-बोलती किरण असमय बूढ़ी दिखने लगी. चेहरे की चमक खो गयी है और स्वभाव भी बदल गया है, अक्सर चिड़चिड़ा जाती है जबकि पहले ऐसी नहीं थी. दयालदास शांत और हँसमुख इंसान था लेकिन अब चिंतित और परेशान दिखाई देने लगा है. पचपन साल का है लेकिन पैंसठ का लगने लगा है. जितनी देर तक दूकान में ग्राहक रहते हैं, उतनी देर तक की व्यस्तता उस पर हावी रहती है लेकिन उसके बाद जैसे ही ग्राहक निपट जाते हैं, उसके दिमाग में भविष्य की आशंकाएं घर करने लगती हैं. परिस्थितियों का प्रभाव मनुष्य के चेहरे पर साफ दिखाई पड़ता है.
दयालदास को चिंतित देखकर एक दिन किरण ने पूछा, 'क्या बात है आज कल बहुत परेशान दिखाई देते हो?'
'कुछ नहीं.'
'कुछ तो है.'
'क्यों तुमको नहीं मालूम?'
'कुछ-कुछ तो है.'
'फिर क्यों पूछती हो?'
'इसलिए कि आपको चिंतित देखकर मुझे चिंता होने लगती है.'
'तुम घर-गृहस्थी देखो, बाकी बातों से तुम्हें क्या लेना देना?'
'क्योंं, तुम घर-गृहस्थी से अलग हो?'
'नहीं.'
'तो फिर मेरा सवाल करना ज़ायज़ है.'
'तुम इतनी बातें करना कहां से सीख ली?'
'मैंं तो चुप ही रहती हूं लेकिन कभी-कभी अपना मुंंह खोलना पड़ता है. अपनी तकलीफ मुझसे नहीं बताओगे तो किसे बताओगे?'
'बात तुम्हारी ठीक है लेकिन मैं चारों तरफ से परेशानियों से घिरा हुआ हूँ, तुमको समझ में नहीं आएगा.'
'हो सकता है कि मुझे समझ में न आए लेकिन अपना दुख किसी से बताने में दुख कम होता है.' किरण ने कहा. 'फिर तुम्हारा कोई दोस्त भी तो नहीं है.'
'चलो, खाना परोस दो, भूख लग रही है.' दयालदास ने कहा.
खाना खाते-खाते उसने बताया, 'बाकी परेशानियां अपनी जगह हैं, सबसे बड़ी परेशानी है, मेरा धंधा दिनोंदिन कमजोर पड़ते जा रहा है.'
'क्यों?'
'एक तो मैं अकेला पड़ गया, दूसरा, पहले पूरी दूकान सतीश देखता था. उसके परिचय के ग्राहक उसकी दूकान में चले गए. उसके और मेरे स्वभाव में अंतर है, वह सबसे घुलमिल जाता था, मुझसे अब वह नहीं सधता.'
'इस समस्या का समाधान मेरे पास है.'
'बताओ क्या?'
'तुम दूकान में आने वाले हर ग्राहक को जय राम जी बोला करो.'
'क्या होगा इससे?'
'तुम शुरू तो करो, फिर परिणाम देखना.'
'ठीक है, कल से शुरू करता हूं. सबसे पहले तुमसे, जय राम जी की.'
'जय राम जी की.' दोनों के चेहरे पर मुस्कान फैल गई.
(सत्रह)
प्रभा ने अपने जीवन के 65 बसंत देख लिए थे. तबीयत खराब रहने लगी है. अक्सर ब्लडप्रेशर बढ़ जाया करता है. उसकी बहू उसको समझाती, 'काहे की चिंता है तुमको जो तुम्हारा ब्लडप्रेशर बढ़ जाया करता है? मैं हूँ न.'
'मुझे तुम्हारे रहते कोई चिंता नहीं है लेकिन यह ब्लडप्रेशर क्यों बढ़ जाता है, समझ में नहीं आता.' प्रभा बोली.
'चलो, बिलासपुर चलो, वहां किसी अच्छे डाक्टर को दिखा देते हैं.'
'छोटी सी बात है, ठीक हो जाएगा.'
'इस प्रकार से सोचना ठीक नहीं है, कभी यदि एकदम बढ़ गया तो फिर संभलेगा नहीं.'
'जैसा तुम कहो.' प्रभा मान गई.
वे दोनों ट्रेन से बिलासपुर के लिए निकल पड़े. रास्ते में एक भिखारी आया, एक पैर कटा हुआ, बैसाखी के सहारे चल रहा था. उसने भीख मांगी, दोनों ने कोई उत्तर नहीं दिया और ट्रेन के बाहर देखने लगे. भिखारी चीखा, 'मुंंह नहीं है क्या, बोलकर मना कर देते.'
'नहीं बाबा, कुछ नहीं है.' बहू ने कहा.
'तो 'लोन' ले लो.' भिखारी ने सलाह दी.
कौन मुंह लगे, ये सोच कर बहू चुप हो गई लेकिन उसके दिमाग में यह बात आई कि इसे भिखारी नहीं, किसी थाने का थानेदार होना चाहिए था. वह पुनः खिड़की के बाहर गुजरते हुए पेड़ों को देखने लगी लेकिन बहुत देर तक उसके दिमाग में उस भिखारी की बात घूमती रही.
किसी व्यक्ति का स्वभाव कैसे विकसित होता है? आम तौर पर जो जिस काम से जुड़ा रहता है, वैसा उसका स्वभाव बन जाता है, जैसे व्यापारी होगा तो नम्र होगा, अधिकारी होगा तो दबंग होगा, अधीनस्थ होगा तो दब्बू होगा, पुलिस में होगा तो अकड़बाज होगा, शिक्षक होगा तो सिखाने-समझाने वाला होगा. अगर नियोजित कार्य से विपरीत स्वभाव होगा तो बात बनने की जगह बिगड़ने लगेगी. अगर व्यापारी अकड़ दिखाएगा तो उसका व्यापार ठप होना तय है, अधिकारी यदि विनम्र होगा तो वह अपने मातहतों से काम नहीं करवा सकता, अधीनस्थ होकर यदि रुआब बताएगा तो नौकरी चली जाएगी, पुलिसवाला यदि नम्रता से व्यवहार करेगा तो अपराधियों में उसका डर कैसे बैठेगा, शिक्षक यदि विनयशील नहीं होगा तो विद्यार्थी उसके नजदीक नहीं फटकेंगे.
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि मनुष्य के बचपन में जैसा उसके साथ व्यवहार होता है या जैसा व्यवहार उस समय वह होते हुए देखता है, उसका प्रभाव उस पर आजीवन रहता है. उसने देखा कि पिता घर में सबके साथ डांट-डपट करते रहते हैं या मां चिल्लाती-चीखती रहती हैं तो ये सब चित्र उसके अवचेतन मष्तिस्क में अंकित होते रहते हैं और बड़े होने पर उसका वैसा व्यवहार बन जाता है.
जीवशास्त्रियों की मान्यता है कि मनुष्य का स्वभाव उसे जींस के माध्यम से मिलता है. जैसा उस व्यक्ति के पिता या दादा या परदादा का स्वभाव रहा हो या मां या दादी या परदादी का रहा हो या नाना या नानी का रहा हो, वह अनुवांशिक रूप से मनुष्य में स्थानांतरित होता है.
कुछ लोगों का स्वभाव उसके अपने जीवन में अतीत में हुई घटनाओं के प्रभाव से विकसित होता है. देखरेख के अभाव में वह उद्दंड बन जाता है, अधिक देखरेख के कारण पर-निर्भर हो जाता है, समुचित वातावरण न मिलने के कारण दुराग्रही हो जाता है, अत्यधिक गरीबी को झेलने वाला धन-केंद्रित हो जाता है, ऐश-ओ-आराम की ज़िंदगी जीने वाला आलसी हो जाता है. बौद्धिक रूप से कमजोर व्यक्ति हीन भावना का शिकार हो जाता है और बौद्धिक रूप से समर्थ व्यक्ति अहंकारी और स्वयं को दूसरों से उत्कृष्ट समझने वाला बन जाता है.
मनुष्य की शारीरिक स्थिति भी अपना असर डालती है. स्वस्थ व्यक्ति आत्मविश्वासी होता है वहीं पर बीमार व्यक्ति के मन में लाचारी का भाव आ जाता है और अपंग व्यक्ति जब दूसरों को संपूर्ण अंगों का उपयोग करते देखता है तो स्वाभाविक रूप से चिड़चिड़ा हो जाता है. सम्भवतः यही बात उस भिखारी के साथ हुई होगी, वह स्वभाव से कटु बन गया.
पैसेंजर ट्रेन थी, खरामा-खरामा आगे बढ़ती रही और चार घंटे में बिलासपुर पहुंच गई.
डाक्टर ने प्रभा का बीपी चेक किया, ज्यादा नहीं था, ब्लड जांच करवाने की पर्ची लिख दी और कहा,' खाना खाने के पौने दो घंटे बाद लेब में सेम्पल दे देना और शाम को रिपोर्ट लेकर मुझे दिखा देना.'
ब्लड रिपोर्ट नार्मल थी. दोनों खुशी-खुशी जैतहरी वापस लौट आए. घर पहुंच कर चैन की साँस ली.
(अठारह)
ठाकुर साहब बहुत चिंतित रहा करते थे लेकिन उनके बेटे उनकी चिंता कम करने के बदले चिंता बढ़ाने का काम किया करते थे. वे अपनी दोनों औलादों से बेहद खफा रहते थे. वैसे भी घर में रहने वाली हर औलाद से हर एक पिता खफा रहता है पर यहां मामला कुछ अलग है. दोनों बेटे हद दर्जे तक लापरवाह हैं. उनकी सुबह दिन में ग्यारह बजे होती है, तैयार होते और नास्ता करते बारह बज जाते हैं तब वे दोनों घर से बाहर निकलते हैं. इतनी देर में ठाकुर साहब का पारा चढ़ जाता है. सुबह आठ बजे से रास्ता देखते वे झल्ला जाते. कई बार समझाया कि जल्दी उठा करो लेकिन कहते रहो, हम सुनने वाले नहीं, अपने मन के राजा हैं. राजा तो खैर नहीं थे लेकिन राजकुंवर जरूर थे क्योंकि बड़े बाप के बेटे थे, उनका वर्तमान सुरक्षित था और उनको भविष्य की चिंता नहीं थी. वे दोनों राजा बनने की राह देख रहे थे लेकिन ठाकुर साहब सिंंहासन खाली नहीं कर रहे थे. उनके जीते-जी तो यह सम्भव नहीं था और उनका चेहरा दिनों-दिन गुलाबी होता जा रहा था, निखर रहा था. खैर, आगे-पीछे राजा तो बन ही जाएंगे लेकिन दोनों के दिमाग में एक उलझन थी कि राजा कौन बनेगा, बड़ा भाई विक्रम सिंह या छोटा भाई प्रह्लाद सिंंह? फिलवक्त तो दोनों प्रजा हैं, देखा जाएगा जब राजा बनने का मौका आएगा.
संंयुक्त परिवार का प्रमुख, जिसे कर्ता कहा जाता है, वह अपने जीवन काल में सब कुछ अपनी मुट्ठी में रखना चाहता है. उसका वर्चस्व ही उसकी पूंजी होती है जो आजीवन उसके काम आती है. उसका मन रहता है कि उसकी बात सुनी जाए, उसकी बात मानी जाए तो इसके लिए शक्ति चाहिए होती है. वह शक्ति उसको उसके द्वारा अर्जित या संचित धन-संंपदा से प्राप्त होती है. यदि कर्ता निर्धन है तो उसकी घर में कोई सुनवाई नहीं होती और यदि वह धनवान है तो उसकी पूछ-परख बनी रहती है. धन ही वह नियामक तत्व है जिसमें चुम्बक की तरह आकर्षण शक्ति होती है. अधिक उम्र सामर्थ्यवान को ही शोभती है. थोड़ा सा तानाशाह जैसा स्वभाव और रौबदाब वाली आवाज़ अगर हो जाए तो फिर सोने में सुहागा. ठाकुर साहब के संग ये समस्त गुण साथ-साथ चलते थे. यद्यपि उम्र हो गई थी लेकिन इतनी भी न थी कि जल्दी निकल लेंगे इसलिए उनके पुत्र क्या करें बेचारे, 'वेटिंग लिस्ट' में लटके हुए थे.
जैतहरी गाँव है. निपट गाँव. यहां का माहौल, रहन-सहन, बोलचाल, घर-दूकान सब देहाती हैं. इस गाँव के आसपास कोई नदी नहीं है, दो-तीन बड़े-छोटे तालाब हैं जहां यहां की आबादी दैनिक नित्यकर्म सम्पादित करती है. औरतें अपनी कमर में एक भगौने में घरभर के उतारे हुए कपड़े रख तालाब जाती हैं, वहां उन्हें साबुन लगाकर फीछती हैं, मुगदर से कूटती हैं फिर तालाब के पानी में डालकर खूब हिलाती हैं और उन्हें निचोकर उसी भगौने में रख लेती हैं. अपने साथ लेकर गई मुखारी निकालकर दांतों को साफ करती हैं, कुल्ला करती हैं और फिर पानी में उतर कर तबीयत से नहाती हैं, घर वापस आ जाती हैं. घर में पहुंचकर अपने चूल्हे-चौके में लग जाती हैं.
जैतहरी बीच में है. आसान भाषा में समझने के लिए, जिस प्रकार गाँव की महिलाएं अपने सिर के बालों के बीच मांग निकालती हैं उसी प्रकार जैतहरी की रेललाइन गाँव के बीच में है. रेललाइन के इस पार जैतहरी और उस पार जैतहरी. स्टेशन में रेल की दो पांते समानांतर बिछी हुई हैं जिससे रेल्वे वाले अप-डाउन लाइन कहते हैं. बिछी हुई पांतें न तो ऊपर जाती हैं, न नीचे जाती हैं इसलिए गाँव वाले अप-डाउन का अर्थ समझने में असमर्थ हैं. इस पार से उस पार जाने के लिए या उस पार से इस पार आने के लिए रेल की पातों से होकर गुजरना पड़ता है. कई बार जल्दी रहती है लेकिन यदि किसी दिशा से ट्रेन आती हुई दिख गई तो रुकना पड़ता है क्योंकि गाँव वाले जानते हैं कि दुर्घटना से देर भली. ट्रेन की सीटी की आवाज़ से अंदाज़ा लग जाता है कि कौन सी ट्रेन प्लेटफार्म का सीना चीरते हुए निकलेगी. दिन हो या रात, सीटियों की चिंघाड़ पर हर किसी का ध्यान जाता है लेकिन खास तौर से रात के सन्नाटे में मीठे सपनों में जब इनसे व्यवधान होता है तब बहुत खीझ होती है. ट्रेन का काम है हर समय आना और जाना, गाँववालों का काम है उसे सहना और सहना. शाम के वक्त लोगों के टहलने-घूमने की जगह है वहां का प्लेटफार्म जिसमें सिर्फ मनुष्य नहीं, पशु और पक्षी भी टहलने आ जाते हैं. प्लेटफार्म में रात के सूनसान का लाभ गाँव के कुछ अविवाहित जोड़े भी उठा लिया करते हैं.
जैतहरी में राजनीति का असर बहुत है. दो खेमे हैं, एक कांग्रेसी और दूसरा कांग्रेस विरोधी. अपनी सुरक्षा के लिए किसी न किसी खेमे से जुड़कर रहना रहवासियों की मजबूरी है. सबकी एक-दूसरे पर नज़र बनी रहती है, किसी से जरा सी भूल हुई और गाँव में तुरंत खुसुर-फुसुर चालू हो जाती है और विघ्नसंतोषी उसका अनुचित फायदा उठाने के लिए सक्रिय हो जाते हैं, इनसे निपटने के लिए सुरक्षा चक्र की ज़रूरत आ पड़ती है, ऐसे में किसी पार्टी से जुड़े रहने से उसके नेता और कार्यकर्ता उसका पक्ष लेने के लिए आ खड़े होते हैं, बस, इतना काफी होता है. भीड़ देखकर सब सहमते हैं, पुलिस वाले भी. किसी के पक्ष में यदि भीड़ खड़ी न हुई तो समझो उस व्यक्ति की गर्दन साफ. कुछ लोग बहुत चतुर होते हैं, एक परिवार में सब भाई अलग-अलग पार्टियों से जुड़कर रहते हैं, कहने का मतलब यह है कि परिवार के किसी भी सदस्य को यदि किसी प्रकार की मदद की ज़रूरत हो तो दोनों तरफ के लोग सहज उपलब्ध हैं. घरेलू झगड़ा हो या पड़ोसी से वाद-विवाद, मदद के लिए या हां में हां मिलाने के लिए इन समूहों की ज़रूरत होती है. जिसकी ओर संख्याबल अधिक होता है या जिस तरफ ऊँची आवाज़ में बोलने वाले लोग होते हैं, उनकी बात सामान्यतया मानी जाती है.
अब अपने ठाकुर साहब की बात ले लें तो वे किसी पार्टी के सदस्य नहीं हैं, सभी से उनके मधुर सम्बंध हैं. वे हवा का रुख भांप लेते हैं और उस हिसाब से अपना समर्थन दिया करते हैं. वे जैतहरी के सर्वमान्य नेता हैं. जिधर वे, उस तरफ गाँव वाले. वे दबाव की राजनीति नहीं करते, प्रेम-व्यवहार और धन-संपदा पर आधारित राजनीति किया करते हैं. प्रेम-व्यवहार तो पुरानी पारिवारिक जान-पहचान और प्रणाम-नमस्कार-जय राम जी के बल पर चलता है, वहीं पर धन-संपदा का प्रभाव भी अपना काम बखूबी करता है. उनकी कई घर और दूकानें किराये पर चल रहे हैं. गाँव में किसी को आर्थिक मदद की जरूरत पड़ जाए तो ठाकुर साहब का दरबार हाज़िर है. कुल मिलाकर पूरे जैतहरी में वर्चस्व है, उनकी तूती बोलती है.
ठाकुर साहब इन दिनों सोच में पड़े हुए हैं. एक तो उम्र के साथ उनके स्वास्थ्य में गिरावट हो रही है और दूसरे, पत्नी की मृत्यु के बाद अवसाद से घिर गए हैं. अकेले जीना उनके लिए दूभर हो चला है. जब भी खाली रहते हैं, पुरानी यादें उन्हें घेरने लगती हैं. अपने अंतिम दिनों में वे गंभीर बीमारी से त्रस्त थी, उनको अहसास हो गया था कि अब बचना मुश्किल है, एक दिन ठाकुर साहब का हाथ अपने हाथ में लेकर वह बोली, 'साहब, अब मैं नहीं बचूंगी. मेरी एक इच्छा पूरी हो रही है कि मैं सधवा मरूं लेकिन आपको इस तरह छोड़कर जाना मुझे सहन नहीं हो रहा है, मैं क्या करूं?'
'ऐसा मत कहो, तुम्हें कुछ नहीं होगा, तुम अभी मेरा साथ दोगी.' ठाकुर साहब ने भावविह्वल होते हुए कहा.
'नहीं, मुझे लग रहा है कि मैं डूब रही हूं, गहरे पानी में, मुझे साँस लेने में बहुत तकलीफ हो रही है. मुझे अपना बचपन याद आ रहा है, जवानी के दिन और आपसे ब्याह की बातें याद आ रही हैं. सब कुछ एकदम साफ किसी सिनेमा की तरह मेरे सामने से गुजर रहा है...मैं जा रही हूं...जा रही हूं....' कहते-कहते मालती का सिर एक तरफ लुढ़क गया.
इस उम्र में जीवनसाथी का साथ छूट जाना बेहद दुखदायक और कष्टदायक होता है. नियति के सामने सिर झुका लेने के अलावा किसी के हाथ में और क्या है? मालती के जाने के बाद जिस सूनेपन को ठाकुर साहब भुगत रहे हैं उसे सिर्फ वे ही समझते हैं. उन्हें लगता है जैसे एक अंधेरी गुफा में अपने दोनों हाथों को आगे बढ़ाए चले जा रहे हैं, रास्ता सूझ नहीं रहा है, वे उस सन्नाटे को चीरते हुए जोर-जोर से चीखना चाहते हैं, मालती...मालती...लेकिन उनके गले से आवाज़ नहीं निकल रही है, चारों ओर अंधकार है, उनका दम घुटता जा रहा है, बेचैनी बढ़ती जा रही है, सिर घूम रहा है. दिमाग में बस एक धुन है, 'मालती... तुम कहां चली गई?'
लड़के लापरवाह हैं लेकिन उनकी दोनों बहुएं अच्छे स्वभाव की हैं, बहुत ख्याल रखती हैं. समय-समय पर चाय, नास्ता और भोजन प्रेम से पूछा जाता है, परोसा जाता है और आग्रह करके उन्हें खिलाया जाता है. कभी-कभार लड़कियां मायके आ जाती हैं तो उन्हें देखकर उनके मन को तसल्ली मिल जाती है, दिल बागबाग हो जाता है. वे जब भी घर आती हैं तो उन्हें लगता है जैसे मालती साक्षात उपस्थित हो गई है. पिता का अपनी लड़कियों से लगाव स्वाभाविक रूप से कुछ अधिक होता है. यह भावनात्मक सम्बंध होता है क्योंकि वे अपने पिता से दिल से जुड़ी हुई होती हैं.
इसी तरह से या समझें किसी तरह से ठाकुर साहब की बची-खुची ज़िंदगी बीत रही है.
(उन्नीस)
अमेरिका से हरीश का आज फोन बहुत दिनों बाद आया है. 'हेलो बाबा, मैं हरीश.'
'हाँ बोलो, आज कैसे याद आई हमारी?' दयालदास ने कहा.
'पापा, आप दोनों को अमेरिका बुलाने के लिए फोन किया है. आपने अमेरिका देखा नहीं है, आकर देखिए तो, कितना प्यारा देश है. छः माह के लिए आ जाइए.'
'दूकान बंद करके नहीं आ सकता. इतने लम्बे समय तक यदि दूकान बंद रही तो बची-खुची दूकानदारी भी बर्बाद हो जाएगी.'
'तो मम्मी को भेज दीजिए.'
'वो अकेले कैसे आएगी?'
'मैं टिकट भेज देता हूँ, आप बस, दिल्ली जाकर प्लेन में बैठा देना, मैं यहाँ रिसीव कर लूंगा.'
'और मेरा क्या होगा? कौन खाना बना कर देगा मुझे?'
'खाना बनाने के लिए कोई नौकरानी रख लीजिए.'
'तुम्हारी माँ से बात करता हूं, फिर बताता हूं.'
'ठीक है बाबा.'
'और, बहू रानी ठीक है?'
'हाँ, मज़े में है. प्रेग्नेंट है, अगले महीने ड्यू है.' हरीश खुश होते हुए बोला. दयालदास को पूरी बात समझ में आ गई. उसने कहा, 'ठीक है, अभी फोन रखता हूं, ग्राहकी का समय है.' दयालदास ने फोन काट दिया.
दयालदास ने किरण को बताया, 'हरीश का फोन आया था, तुम्हें अमेरिका बुलाया है.'
'कब फोन आया, मुझसे बात क्यों नहीं करवायी?' किरण ने पूछा.
'थोड़ी देर पहले आया था, दूकान में ग्राहकी थी इसलिए तुम्हें नहीं बुला पाया.'
'अरे, तो मुझे आवाज़ दे देते.'
'चूक हो गयी.'
'तुम बोल रहे थे मुझे वहां बुलाया है, तुम्हें नहीं बुलाया?'
'बोला तो मुझे भी था लेकिन मैंने मना कर दिया. इतने दिनों तक दूकान बंद करना मुझे नहीं जंचा.'
'तो फिर?'
'उसने कहा कि मम्मी को भेज दो. अच्छा है, जाओ तुम घूम आओ.'
'मैं अकेले? न बाबा न, मैं नहीं जाऊंगी. इतनी दूर और अंजान जगह, मेरी हिम्मत नहीं होती.'
'मैं तुमको दिल्ली ले जाकर प्लेन में बैठा दूंगा, वहाँ तुमको हरीश रिसीव कर लेगा.'
'चलो ठीक है, तुम कह रहो हो तो चली जाती हूं. और, बहू का क्या हाल है?'
'अच्छा है. अगले महीने डिलेवरी होने वाली है.'
'ऐसा क्या? ये तो बहुत खुशी की बात है.'
'इसीलिए तो तुमको बुला रहा है.'
'डिलेवरी करवाने के लिए?'
'हांं,और बच्चे को जरा बड़ा करने के लिए. छः माह तक वहां रहना होगा.'
'मुझे अब समझ आया कि मेरे पुत्तर को मेरी याद क्यों आयी?'
'क्यों आयी ? मैं समझा नहीं.'
'इतने भोले मत बनो तुम. वह मुझे आया बनाकर अपना काम निकालना चाहता है, नर्स समझता है, अपनी नौकरानी समझता है.'
'तो क्या तुम उसकी माँ नहीं हो? बेटे का काम करके तुम उसकी नौकरानी हो जाओगी क्या?'
'मैं नहीं जाने वाली वहां. उससे बोलो, अपनी सास को बुला ले वहां सेवा करने के लिए.'
'तुम तो नाराज़ हो गयी.'
'तो खुश होने वाली बात है? सहज में तो उसको हमारा ख्याल नहीं आया, अब मतलब है तो मम्मी को अमेरिका घुमाने के लिए बुला रहा है. गाँव की हूँ पर बुद्धू नहीं हूँ. मेरी तरफ से साफ मना है. मुझे नहीं जाना अमेरिका.' किरण चिढ़ कर बोली.
दयालदास के चेहरे में मुस्कान फैल गयी.
दयालदास की दूकानदारी में कोई खास फर्क नहीं आया क्योंकि ग्राहक एक बार दूसरी दूकान देख लेता है तो फिर लौटता नहीं है. दूकान में रखे हुए माल की गुणवत्ता और कीमत का जितना असर ग्राहक पर होता है, उतना ही असर दूकानदार के व्यवहार का भी होता है. जब भी ग्राहक को किसी सामान की ज़रूरत होती है तो वह सामान कहां मिलेगा, इसका संकेत उसके दिमाग में आता है और वह खिंचा सा उसी दूकान के सामने जा खड़ा होता है. ऐसा आकर्षण उत्पन्न करने के लिए दूकानदार को लगातार यत्न करना पड़ता है तब जाकर उस दूकान के स्थायी ग्राहकों की संख्या बढ़ती है, फलस्वरूप उसकी बिक्री में वृद्धि होती जाती है. जरा सी लापरवाही घातक होती है क्योंकि अगल-बगल में और भी दूकानें ग्राहक को दिखाई देती हैं, व्यापार में प्रतिस्पर्धा सब दूर पाई जाती है.
दयालदास पचपन के ऊपर का हो गया है. पूरा जीवन दूकानदारी में लगा दिया, बाहर की दुनिया से अनजान. वहीं दूकान, एक डेहरी दूर पर घर, उतनी ही उसकी दुनिया. व्यापार ऐसा काम है जिसमें जम कर दूकान में बैठना होता है. जो लोग व्यापार में एकाग्र होते हैं उन्हें दिन-रात अपने व्यापार की ही चिंता लगी रहती है, उन्हें कुछ और सूझता ही नहीं. दयालदास का व्यापार ऐसा था कि उसे रोज दूकान खोलनी होती थी और दिन भर बैठना पड़ता था. बाहर निकलने या जाने का कोई काम नहीं था और न ही वैसी सुविधा. दूकान में बैठे-बैठे फोन पर आर्डर दे दिया, माल आ जाता है इसलिए बाहर जाना बंद जैसा हो गया है. दिन भर की बैठक के कारण तोंद निकल आई है, शरीर फैल गया है, घुटनों में दर्द रहता है और अब ब्लडप्रेशर भी अधिक हो जाता है. क्या किया जा सकता है, व्यापारी की ज़िंदगी उसके व्यापार के इर्दगिर्द ही घूमती रहती है. व्यापार न हुआ, अनब्याही पत्नी की तरह हो गई जो हर पल साये की तरह आसपास मंडराते रहती है.
बहुत दिनों बाद रात को सतीश घर आया. किरण ने उसका हालचाल पूछा, बहू के बारे में जानकारी ली. सतीश ने बताया कि वह गर्भवती है तो दोनों खुश हो गए और कहा, 'हमारे परिवार में दो लोग और जुड़ने जा रहे हैं.'
'दो लोग और, मतलब?' सतीश ने पूछा.
'अमेरिका से भी अच्छी खबर आई है.'
'अरे वाह.'
'हम दोनों को अमेरिका बुलाया है हरीश ने.'
'कब जा रहे हो?'
'नहीं, नहीं जा पाएंगे.'
'क्यों?'
'बस, यूं ही.'
'कोई तो कारण होगा.'
'हिम्मत नहीं होती उतनी दूर जाने की.' किरण ने बात टालते हुए उत्तर दिया. 'तुम चले जाओ.'
'मैं चला जाता लेकिन यहां का हाल अभी आपको बताया, ऐसे हालात में बहू को छोड़कर कैसे जा सकता हूं?. सतीश ने कहा.
'वो तो है.' किरण ने गहरी सांस भरते हुए कहा.
जैतहरी की ठंड बेरहम होती है. आसपास जंगली इलाका है, अमरकंटक जो बेहद ठंडा स्थान है, करीब है. जब ठंडक के साथ तेज हवा बहने लगती है तब रजाई भी काम नहीं आती. रजाई के ऊपर रजाई या कम्बल या शाल डालना पड़ता है तब गर्माहट शुरू होती है. ऐसी ही रात को दोनों पति-पत्नी रजाई ओढ़े पलंग पर बार-बार करवट ले रहे हैं, दोनों को नींद नहीं आ रही है. वैसे तो दयालदास को तकिया में सिर रखते नींद आ जाया करती थी लेकिन आज उसके दिमाग में ऐसी उलझन है जो सुलझ नहीं रही है इसलिए सोने की कोशिश करने के बावज़ूद उसकी नींद उससे दूर हो गई है. किरण ने पूछा, 'क्या बात है आज सोये नहीं, नींद नहीं आ रही है क्या?'
'हाँ, नहीं आ रही है.' दयालदास ने बताया.
'कुछ दिमाग में चल रहा है?'
'हां, ये चल रहा है कि हमारे बच्चों के पालन-पोषण में हमसे क्या भूल हुई जो दोनों लड़के हमसे दूर हो गए?'
'सबके बच्चे दूर हो जाया करते हैं, हमारे दूर हो गए तो कौन सा अज़ूबा हो गया.'
'हरीश का तो समझ में आता है, उसे पढ़ने का शौक था, बाहर गया और वहीं का होकर रह गया लेकिन सतीश तो यहीं है, उसका दूर होना मेरी समझ के बाहर है.'
'क्या करोगे? नई पीढ़ी आज़ादी चाहती है. माता-पिता या सास-ससुर उन्हें नहीं सुहाते.'
'पर हमारी ओर से तो कोई बंधन नहीं था उन पर, फिर और कैसी आज़ादी?'
'मैं बताऊं? तुम हरीश के काम पर नज़र रखते थे और मैं बहू पर नज़र रखती थी. मैंने भी अपनी सास के साथ इसी तरह की कैद में दिन बिताए थे, इस कारण मैं उस तकलीफ को समझती हूं.'
'मेरा तो ठीक है लेकिन तुम यह जानते-समझते हुए बहू पर नज़र क्यों रखती थी?'
'क्या करूं? दो कमरे का घर, दिन भर आमने-सामने रहना तो बिना देखे कैसे रहा जा सकता है, तुम बताओ?'
'बात तो ठीक है तुम्हारी, यही तो मेरे साथ भी होता था.'
'हमारी पीढ़ी में किसी तरह साथ निभाने का भाव रहता था लेकिन नई पीढ़ी में वह भावना नहीं रही. वे जीवन को अपने ढंंग से जीना चाहते हैं, दबाव या तनाव उन्हें नहीं पसंद आता, उनके लिए शायद मानसिक आज़ादी अधिक मायने रखती है.'
'तो क्या अलग रहने के बाद उन्हें किसी प्रकार का दबाव या तनाव नहीं होता होगा?'
'होता होगा लेकिन उसे वे सहन कर लेते होंगे, या स्वयं रास्ता खोजना उन्हें अच्छा लगता होगा.'
'तुम तो आज बड़ी समझदारी वाली बात कर रही हो, क्या बात है?'
'तुम्हारे साथ रहते-रहते थोड़ी-बहुत अक्ल आ गई है मुझे.' किरण ने हंसते हुए कहा. दयालदास अपनी रजाई छोड़कर किरण की रजाई में घुस गए. ठंड और कम हो गई.
(बीस)
प्रभा और नीलम हैं तो सास और बहू किंतु दोनों की आपस में बहुत पटती है. एक दूसरे की तकलीफ को सुनना, उसे समझने की कोशिश करना और हमेशा खुश रहना जैसे उन दोनों का स्वभाव बन गया है.
परिवार में यदि खुलकर बातचीत हो, विचारों का आदान-प्रदान हो तो मतभेद होने के बावज़ूद मनभेद नहीं होने पाता. दो पीढ़ियाँ जब साथ में रहती हैं तो दोनों के बीच समय का लंबा अंतराल होता है. सोच बदल जाती है, बात-व्यवहार बदल जाता है और काम करने की शैली भी बदल जाती है. पुराने लोगों ने अपने जीवन में बहुत कष्ट भोगे हैं, उनके पास धन-साधन कम थे, खाना बनाने के साधन आदिमयुगीन थे, चटनी पीसने के लिए सिल-लोढ़ा था, कपड़े धोने के लिए पानी का नल घर में नहीं था; तालाब ले जाकर धुलाई करनी पड़ती थी. अब आधुनिक युग में और पुराने जमाने में बहुत बदलाव आ गए हैं. खाना बनाने के लिए कुकिंग गैस और कुकर आ गए, मिक्सी मशीन आ गई, घरों में नल लग गए इसलिए सुविधाएं बढ़ती जा रही हैं और घरेलू कामों में समय और श्रम की बचत होने लगी है. पुरानी पीढ़ी को नए लोगों की बातें पसंद नहीं आती, उनके तरीके पसंद नहीं आते इसलिए उनको स्वीकार करना उनकी मज़बूरी जैसी हो जाती है. अब मन मार कर मानो या खुशी-खुशी मानो, यह पुरानी पीढ़ी की खुशी पर निर्भर होता है. कई घरों में इस परिवर्तन को समझ कर यदि नई पीढ़ी को आज़ादी दे दी जाती है तो परिवार का वातवरण सुखमय होता है अन्यथा रोज की चिक-चिक होना तय है.
रात का भोजन विकास को परोसा जा रहा है. नीलम ने पराठा देते हुए प्यार से विकास की ओर देखा. इस प्रकार देखना विकास को समझ में नहीं आया, उसने पूछा, 'क्या बात है, आज कुछ खास है क्या?'
'खास तो नहीं पर कुछ तो है.'
'क्या है? मैं भी जानूं.'
'कितना समय बीत गया है अपन लोग कहीं घूमने नहीं गए हैं. तुम्हारी दूकान मेरी सौत जैसी हो गयी है. इधर मैं, उधर वो.'
'क्या करें, अपना धंधा ही ऐसा है.बारहों माह और सातों दिन का काम है. मैं अकेला हूं, क्या करूं?'
'कोई उपाय खोजो, यहाँ रहते-रहते मेरा जी ऊब गया है.'
'और, कहीं मुझसे तो नहीं ऊब गया?'
'कैसी बात करते हो? घर में जो रसोई बनती है, उससे किसी को ऊब होती है क्या?'
'यानी मैं घर का दाल-भात हो गया हूं, है न?'
'नहींं, आलू की रसीली सब्जी, तीखी वाली.' नीलम ने कड़छुल से सब्जी देते हुए कहा, 'थोड़ी सब्जी और ले लो.
'दे दो. वैसे कहां जाना है?'
'कहीं भी. यहां से बाहर निकलो.'
'किसी हिल स्टेशन में चलें क्या?'
'हाय, अम्मा जी के साथ हिल स्टेशन जाएंगे क्या?' नीलम ने अपनी साड़ी का पल्ला मुंह में दबाते हुए कहा.
'अम्मा भी साथ में जाएंगी?'
'तो क्या, वे घर में अकेली रहेंगी?'
'हाँ, ये बात तो है. एक काम करते हैं, मथुरा-वृंदावन चलते हैं.'
'ठीक है लेकिन तुम्हारी दूकान का क्या होगा?'
'अगले महीने होली है. होली के बाद पांच दिन नौकर छुट्टी मार देते हैं. धंधा भी कमजोर हो जाता है तो दूकान में ताला लगाकर मस्त घूमेंगे-फिरेंगे.'
'ये बात हुई काम की. इस खुशी में तुम खीर खा लो.' नीलम ने एक कटोरी में खीर देते हुए कहा. इतने में विकास की माँ वहां आ गई. 'खाना हो गया बेटा?'
'होने वाला है, खीर खा रहा हूं.' विकास ने उत्तर दिया. 'अम्मा एक खुशखबरी है आपके लिए.'
'कौन सी खुशखबरी?'
'नीलम बताएगी आपको.' विकास ने उठते हुए कहा.
(इक्कीस)
ठाकुर साहब आज झक सफेद धोती, रेशमी हल्का पीला कुर्ता और उसके ऊपर काली जैकेट पहन कर काफी दिनों बाद घर के बाहर निकल रहे हैं. किधर जाएंगे, किसके पास जाएंगे यह मालूम नहीं है लेकिन कहीं तो जाना है उनको. आहिस्ता-आहिस्ता पैदल चलते हुए, रास्ते में मिलती दुआ-सलाम को कुबूल करते हुए वे अपने पुराने साथी मूलचंद की दूकान में पहुंचे. मूलचंद उन्हें देखते ही गद्दी से उठ खड़े हुए, आपस में जय-गोपाल हुई और आदर के साथ ठाकुर साहब को गद्दी में आराम से बैठने के लिए निवेदन किया.
'आज कैसे इधर भटक गए ठाकुर साहब?' मूलचंद ने पूछा.
'यार, तुम मुझे ठाकुर साहब मत कहा करो. मैं तुम्हारा पुराना यार हूं, तुम तो मुझे पहले बिसम्भर बोला करते थे, वही ठीक लगता है.' ठाकुर साहब बोले.
'पहले की बात और थी, तब हम लोग साथ में शाखा जाया करते थे, लाठी चलाना सीखते थे, व्यायाम किया करते थे, कबड्डी खेला करते थे लेकिन अब उन बातों को बीते एक अर्सा हो गया. इस बीच बहुत सी गर्मियां, बरसातें और ठंड निकल गई, अब आप ठाकुर साहब हो गए तो आज जो नाम चलता है, वही बोलना पड़ेगा न?'
'अच्छा तो मैं चलता हूंं, ये क्या आप-आप लगा रखी है? मैं तो अपने पुराने यार से मिलने आया था जो मुझे हमेशा तुम कहा करता था.'
'अच्छा तो तुम मुल्लू से मिलने आए हो. अब मेरी समझ में आया.' मूलचंद ने कहा और दोनों एक दूसरे के हाथ को पकड़ कर ठहाका मार कर हंसने लगे. पुरानी यादें उस गद्दी पर पसरने लगी और दोनों का बचपन वहां वापस आकर हो-तू-तू खेलने लगा.
कुछ देर बाद बातें परिवार की ओर मुड़ी, 'तुम्हारे कितने बच्चे हैं?' बिसम्भर ने पूछा.
'दस. चार लड़के और छः लड़कियां.' मुल्लू ने बताया.
'जोरदार फसल हुई है तेरे घर में.'
'सब ऊपर वाले की मर्ज़ी है.'
'हांं, नीचे वाला तो कुछ करता नहीं.'
'नीचे वाला तो बहुत करता है लेकिन ऊपर वाले की इच्छा से ही यह सब होता है.'
'ऊपर वाला तो हमारा सुरक्षा कवच है, जब चाहे उसका उपयोग कर लो.'
'वैसे सच बताऊं? एक लड़का और के चक्कर में इतने सारे बच्चे हो गए. उस जमाने में परिवार नियोजन जैसा कुछ विचार नहीं आया था इस कारण हमारे घर में फौज खड़ी हो गई.'
'क्या हाल है बच्चों का?'
'सच बताऊं? हाल बेहाल है. सुबह से लेकर रात तक घर में चिल्ल-पों मची रहती है. कस्तूरी है जो उनको झेलती रहती है. दो लड़कियों की शादी हो चुकी है, बाकी लड़कियां घर में हैं, उनकी शादी-ब्याह की चिंता तुम्हारी भौजी कर रही है, अपने को कोई मतलब नहीं है. दो लड़के शादी के बाद अलग घर में रहते हैं, दो अभी हमारे साथ हैं लेकिन क्या पता कब तक?'
'लड़कियों की शादी की चिंता तुम्हें क्यों नहीं है?'
'वो मेरा काम नहीं है.'
'अच्छा, तुमने अपना काम कर दिया, अब बाकी जिम्मेदारी दूसरों की है, है न?'
'न,न, ऐसी बात नहीं है. मुझसे लड़के वालों के सामने नरमाई से बात करना नहीं आता, मैं तो शुरू से ही लट्ठ्बाज स्वभाव का रहा हूंं, तुमको तो मालूम है.'
'लेकिन मेरे तो दोनों लड़के मेरे साथ ही रहते हैं.'
'सभी का स्वभाव अलग-अलग होता है. सहनशील लोग साथ रहते हैं और जिसे घरवालों की बातें सहन नहीं होती वे अलग हो जाते हैं.'
'तुम्हारे यहां तुम तेज हो या भौजी?'
'हम दोनों.'
'फिर तो ऐसा होना ही था. गृहस्थी नर्माई से चलती है, गर्मी से नहीं.'
'मैने अभी बताया तुम्हें, एक बार जैसा स्वभाव बन गया, उसे बदलना असम्भव होता है.'
'नहीं, ऐसा नहीं है. परिस्थिति के हिसाब से मनुष्य का स्वभाव बदल सकता है बशर्ते वह आसपास के वातावरण के प्रति जागरूक हो.'
'चलो. मैंने अपना स्वभाव बदल लिया, घरवाली का कैसे बदला जाए? मान लो घरवाली ने भी बदल लिया तो बच्चों का कैसे बदला जाए?'
'हां, फिर तो मामला गड़बड़ होना तय है.' बिसम्भर बोले और उठने के लिए उद्यत हुए. मुल्लू ने कहा, 'अरे बैठो भी. कितने समय बाद मुलाकात हुई है, कुछ नास्ता मंगवाता हूं.'
'अगली बार आऊंगा तो तुम्हारे घर चलूंगा. भौजी से मिले हुए कई साल हो गए हैं, उनके हाथ के बने इंदरसा, सोंठैला लड्डू और मठरी की बहुत याद आती है, वैसा बढ़िया स्वाद कहीं नहीं आया. अभी मैं चलता हूं.' ठाकुर साहब उठ खड़े हुए और अपने शाही अंदाज़ में वहां से निकल गए.
(बाईस)
दयालदास का परिवार सुखी चल रहा था तब ही शांत जल में एक कंकड़ आ गिरा. दयालदास एक दिन बाथरूम में फिसलकर गिर पड़े, वजनदार शरीर था, अंदरूनी चोट का अनुमान था क्योंकि असहनीय दर्द हो रहा था. किरण ने सतीश को खबर की. सतीश आया. डाक्टर को बुलाया. डाक्टर ने बिलासपुर या जबलपुर ले जाकर दिखाने की सलाह दी और कुछ दर्दनाशक दवाएं लिख कर चले गए. दर्द बढ़ता जा रहा था. मां-बेटे ने आपस में चर्चा की, बिलासपुर में डाक्टर को दिखाना तय किया और अगली ट्रेन से वे बिलासपुर पहुंच गए.
डाक्टर ने एक्स-रे करवाया और देखकर बताया कि 'हिप जाइंट' में गम्भीर चोट है, आप्रेशन करना पड़ेगा. अगले दिन आप्रेशन हो गया. मरीज को आठ-दस दिन अस्पताल में रहना होगा, उसके बाद जाने की अनुमति मिलेगी. दयालदास की दूकान तो बंद थी ही, सतीश की दूकान भी बंद थी. सतीश ने माँ से कहा, 'अम्मा, मैं जैतहरी जाता हूं, तुम बाबा की देखरेख करना. जब डाक्टर यहां से छुट्टी करेंगे तो मुझे खबर करना, मैं आ जाऊंगा.'
'मैं यहां अकेले कैसा करूंगी? मुझे कुछ समझ में नहीं आता. बाहर से चाय-दूध लाना है, खाना लाना है, दवा लाना है, मुझे कुछ नहीं मालूम है.' किरण ने कहा.
'धीरे-धीरे सब मालूम हो जाएगा. ये रुपए रख लो, सब आसपास ही मिलता है. मेरी दूकान तीन दिन से बंद है, उसे खोलना जरूरी है.'
'और तुम्हारे बाबा जरूरी नहीं है क्या?'
'कैसी बातें कर रही हो? जरूरी है तब तो बिलासपुर लेकर आया और आपरेशन करवाया. अब मुझे जाने दो.' उसने अपना बैग उठाया और वहां से चल पड़ा, 'ट्रेन का टाइम हो रहा है.'
किरण उसे जाते हुए देखती रह गई, उसकी आँखें डबडबा गई. दयालदास सब सुन रहे थे, बोले, 'जाने दो उसको, उसकी दूकान बंद है, कितने दिनों तक यहां टिका रहेगा? उसने जितना कर दिया, बहुत किया.'
दस दिन बाद दयालदास को अस्पताल से छुट्टी मिल गई. सतीश बिलासपुर पहुंचा और अपने साथ दोनों को लेकर जैतहरी आ गया.
दयालदास अब बिस्तर से लग गए, बमुश्किल बिस्तर में ही उनका नित्यकर्म होता था, शरीर गुनगुने पानी से अंगोछ दिया जाता था, वहीं भोजन होता था, वहीं सोना. किरण दिन-रात दयालदास की देखरेख में लगी रहती, उनकी पसंद का खाना बनाती, खिलाती और हिम्मत बंधाती. दूकान बंद हो गई, नौकर दिन भर घर में रहता था, सहयोग करता था, वह कहीं नहीं गया. सतीश दिन भर में एक बार आता था, हालचाल पूछ कर चला जाता था. हरीश का फोन आया था, जब अस्पताल में भरती थे तब, उसके बाद उसने मौन साध लिया. दयालदास का दिन कटना मुश्किल हो गया. जब शरीर नहीं चलता तब दिमाग तेजी से चलने लगता है. कैसे-कैसे उल्टे-सीधे विचार उसके मन में आया करते हैं, चक्कर काटकर वापस चले जाते हैं और वापस जाने के लिए फिर आते हैं. शारीरिक लाचारी मनुष्य को अंदर से तोड़ देती है. दिन-रात पलंग में लेटे-लेटे जी उकता जाता है जो किसी सक्रिय मनुष्य के लिए अभिशाप जैसा होता है. खासतौर से हड्डी टूटने से होने वाली सर्जरी ठीक होने में बहुत समय लेती है. उसे समझ में नहीं आ रहा है कि कितने दिनों तक ऐसा चलेगा? दूकान बंद है तो घर कैसे चलेगा? पूंजी टूट जाएगी तो आगे धंधे का क्या होगा? किरण समझाती, 'सब ठीक हो जाएगा. काहे को इतनी फिकर करते हो?' लेकिन फिक्र तो फिक्र होती है. वह दिनोंदिन कमजोर होता जा रहा है. भीतर से टूटते जा रहा है.
दो माह किसी प्रकार बीते, अब दयालदास 'वाकर' के सहारे घर के अंदर चलने लगा है, नित्यक्रिया खुद के भरोसे होने लगी है, जरा सा साहस जगने लगा है तो उसके मन में आया कि दूकान खोली जाए. दूकान खुल गई और धीरे-धीरे पहले जैसी चलने लगी. उसका जीवन फिर से व्यवस्थित होने लगा लेकिन एक बात उसके दिल में चुभ रही थी, उसके छोटे लड़के हरीश का उपेक्षापूर्ण व्यवहार. उसका बस एक बार फोन आया और उसके बाद जैसे वह अपने बाप को भूल गया! उसके यहां बच्चा होने वाला था, उसकी भी कोई खबर नहींं. क्या वह इतना नाराज़ हो गया? ठीक है, हम उसे आगे की पढ़ाई के लिए पैसे नहीं दे पाए, उसके बच्चे होने के काम में शामिल नहीं हो पाए लेकिन क्या सिर्फ इन दो वज़हों से हमारा रिश्ता खत्म हो गया?
कुछ रिश्ते स्वाभाविक होते हैं, जैसे माता-पिता, भाई-बहन और पुत्र-पुत्रियां. ये ऐसे रिश्ते होते हैं जो जन्म से बन जाते हैं, किसी के बनाए हुए नहीं होते; शेष रिश्तेदारियां और परिचय अपने जीवनकाल में बनाए जाते हैं. इन दोनों प्रकार के संंबंधों में एक बात का विशेष महत्व होता है, साथ देने का. किसी को कितना साथ देना है, कितनी दूर तक साथ देना है, देना है या नहीं देना है, यह निर्णय लेना उस व्यक्ति पर निर्भर है जो साथ देने वाला है. व्यवहारिक व्यक्ति किसी को साथ देने के पहले अपनी और सामने वाले की स्थिति और परिस्थिति पर गौर करके उचित निर्णय लेता है वहीं पर भावुक व्यक्ति बिना सोचे-समझे साथ दे देता है. अब यहां पर प्रश्न यह उठता है कि दोनों में कौन सा तरीका सही है? सही-गलत कुछ नहीं होता. जिस व्यक्ति का जैसा स्वभाव होता है, वह वैसा व्यवहार करता है, परिणाम चाहे जो भी निकले.
परिवार संवेदनशीलता के मातहत संचालित होते हैं. यह संवेदना ही सबको जोड़कर रखती है. दूसरे के दर्द को खुद महसूस करना और उसके प्रति समभाव रखना पारिवारिक संबंधों के निर्वहन के अनिवार्य तत्व होता है. यदि आपसी सद्भाव न हो या एक-दूसरे के प्रति संदेह का भाव हो तो परिवार में विघटन होना तय है. शिकायतें और मतभेद चलते रहते हैंं लेकिन जब भी परिवार के किसी सदस्य पर कोई संकट आए तो पुरानी सभी बातें भूलकर उसे भरपूर साथ देना ही श्रेयस्कर होता है.
दयालदास और हरीश के बीच भौगोलिक दूरी बहुत थी, कहां भारत के मध्य में स्थित जैतहरी और कहां अमेरिका में सेनफ्रांसिस्को, अब मानसिक दूरी भी बन रही थी. इस तरह अगर हालात बने रहे तो आगे क्या होगा? ये सब दयालदास के दिमाग में चल रहा है लेकिन किरण पर इन बातों का कोई असर नहीं है. भविष्य में क्या होगा, इन बातों से बेखबर वह घर के कामों में व्यस्त रहती और फुर्सत पाने पर आराम से ओढ़ तान कर सो जाती. कभी-कभी दोनों इस बारे में बातें करते तो वह कहती, 'बच्चों की उनकी अपनी ज़िंदगी है, जीने दो उन्हें. न वे हम पर बोझ बनें और न हम उन पर.'
'पर हमारे बुढ़ापे में हमारा क्या होगा? कौन देखभाल करेगा?' दयालदास ने पूछा.
'क्या हमने बच्चे इसलिए पैदा किए थे कि वे हमारे बुढ़ापे पर अपनी जवानी होम कर दें?'
'नहीं जी, होम करने की बात नहीं है लेकिन माता-पिता के लिए जिम्मेदारी भी तो होती है.'
'देखो, जहां तक जिम्मेदारी की बात है, वह तब ही तक होती है जब वे साथ में रहते हों. दूर हो गए, जिम्मेदारी भी दूर हो जाती है. अब अमेरिका से हरीश इतनी दूर हमारे पैर दबाने के लिए तो नहीं आ सकता न? पढ़ने-लिखने वाला बच्चा था, उसका भाग्य था तो वह अमेरिका जाकर पढ़ा और वहां उसे नौकरी मिल गई. सही लाइन पकड़ लिया उसने. चाहो तो उसे उसकी नौकरी छुड़वाकर जैतहरी बुला लो और करवाओ अपनी सेवा.'
'यह तो सम्भव नहीं है.'
'फिर चुपचाप बैठो और देखो कि आगे क्या होता है? जब तक हम दोनों साथ हैं, जैसा भी होगा, हम निपट लेंगे. जब अकेले हो जाएंगे तो अकेले जीना सीख लेंगे. इन सब बातों की चिंता मत किया करो.' किरण ने समझाया. दयालदास को कुछ समझ में आया, कुछ नहीं.
दयालदास को पुराने दिन याद आ गए जब उसके दोनों बच्चे पढ़ रहे थे, सतीश पढ़ाई में कमजोर था, हरीश तेज था तब दयालदास सतीश से कहा करता था, 'तुम्हारा ध्यान पढ़ाई में ठीक से नहीं लगता, देखो, हरीश को, कितना तेज है?'
'हरीश को पढ़ने दो बाबा, मुझे इसमें मज़ा नहीं आता. क्या फायदा पढ़ने में? यह सब मेरे काम का नहीं है.आपके साथ दूकान में बैठूंंगा.' सतीश ने कहा.
'दूकान में बैठेगा, मेरे जैसा व्यापारी बन के नमक-शक्कर बेचेगा. अरे इसमें क्या रखा है? घर का खर्च चल रहा है, और क्या? यहीं जैतहरी जैसे गाँव में रहेगा और सड़ेगा.'
'जो भी हो, मुझसे सबक याद करना नहीं होता, साफ-साफ बता रहा हूं, मैं नहीं पढ़ने वाला. हरीश को पढ़ने का शौक है, उसे खूब पढ़ाइए, मुझे माफ कीजिए.' सतीश ने अपना भविष्य तय कर लिया था.
उन दिनों दयालदास को अपने बुढ़ापे की चिंता नहीं थी, बच्चों के भविष्य की थी. वैसे, व्यापार में एक आदमी से काम नहीं चलता, कम से कम दो आदमी घर के हों तो अधिक सुविधा हो जाती है लेकिन जैतहरी में कोई तरक्की होती नहीं दिखाई पड़ रही है इसलिए कल के दिन व्यापार बढ़ेगा, इसकी सम्भावना दिखाई नहीं देती. गाँव में सीमित आबादी इसलिए सीमित व्यापार. ऊपर से रोज एक नई दूकान और खुल जाती है, ऐसे में बिक्री बढ़ने के बजाय घटते जा रही है. काम्पिटीशन इतना बढ़ गया है कि आमदनी कम होती जा रही है. इस जगह व्यापार का भविष्य खतरे में है. कुछ समय बाद सतीश की शादी होगी, बच्चे होंगे, घर का खर्च और बढ़ जाएगा तो कैसा निबाह होगा?
वहीं पर हरीश को लेकर दयालदास खुश थे कि लड़का पढ़-लिखकर कहीं अच्छी नौकरी पकड़ लेगा, चार पैसे कमाएगा और सुख से रहेगा. दयालदास देख रहा था कि जैतहरी में जो भी डाक्टर और इंजीनियर हैं, उनकी कमाई खूब है और वे लोग मज़े से रहते हैं. सरकारी नौकरी वाले भी ऐश की ज़िंदगी जी रहे हैं. पढ़-लिखकर ही ये लोग इस स्थिति में पहुंचे हैं. दोनों लड़के नौकरी में चले जाते तो अच्छा रहता, हम अपनी ज़िंदगी किसी प्रकार काट ही लेंगे. लेकिन सतीश की पढ़ाई में रुचि नहीं है, क्या किया जाए?
सतीश मेट्रिक में पास न हो सका और पढ़ाई-लिखाई जैसे अत्यंत कठिन कार्य को त्याग कर अपने बाबा की दूकान में पूरा समय देने लगा जबकि हरीश को दूकान से कुछ लेना-देना नहीं था, उसके लिए घर था और स्कूल था और इसके अलावा कुछ न था. न दूकान, न खेल का मैदान, न दोस्त और न रिश्तेदार. पता नहीं उसे किताबों में लिखे अक्षरों से कितना लगाव था कि वह हर समय उसी में खोया रहता था. उसकी आंखें हर समय किताबों के पन्नों से चिपकी रहती. उसकी लगन का फल सामने आया, बारहवीं का रिजल्ट आया, हरीश ने पूरे गाँव में सबसे अधिक अंक अर्जित किए. दयालदास की खुशी का ठिकाना न था. सतीश भी छोटे भाई की सफलता पर बहुत खुश था लेकिन उसे यह समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी याददास्त इतनी कमजोर क्यों है और हरीश की इतनी तेज क्यों? वैसे याददास्त सतीश की भी ठीक थी, किराना दूकान में सैकड़ों की संख्या में सामान रहता है, उसे हर चीज का भाव याद रहता है, बाजार का उतार-चढ़ाव भी ध्यान में रहता है किंतु 'हिस्ट्री, ज्योग्रफी बड़ी बेवफा, रात को याद करो, दिन में सफा.' उससे वह सब नहीं सधा. अंत में उसे यह समझ आया कि मामला व्यक्तिगत रुचि से जुड़ा हुआ है, किसी की पढ़ाई में दिलचस्पी है तो किसी की व्यापार में. जिसकी जहां लगन, वह वहां मगन.
एक दिन सतीश आया और उसने दयालदास से कहा, 'बाबा, आपसे एक इज़ाज़त लेने आया हूं.'
'हाँ, कहो.' दयालदास ने कहा.
'मैं सतना में व्यापार करना चाहता हूं. यहां तो कोई तरक्की होती दिखाई नहीं पड़ रही है. धंधा कमजोर होते जा रहा है. सतना में थोक व्यापार शुरू करने का इरादा किया है. बड़ी मंडी है, बड़ा शहर है, वहां काम जम गया तो अपने पास पैसा ही पैसा आ जाएगा.'
'अच्छा है लेकिन इसके लिए दूकान और पूँजी कहां से आएगी? थोक व्यापार में तो बड़ी पूँजी की ज़रूरत होती है.'
'ससुर जी की वहां एक दूकान खाली पड़ी है और उस काम में दस लाख रुपए लगाने की बात उन्होंने बोली है.'
'अच्छा, तो तुम ससुराल में जाकर रहने जा रहे हो.'
'नहीं, मैंने उनसे साफ-साफ कह दिया है कि हम उनके घर में नहीं रहेंगे, अलग मकान लेकर रहेंगे.'
'फिर तो ठीक है, मेरी तरफ से हाँ है, अपनी माँ से पूछ लो.' दयालदास ने अपने चेहरे पर दुख का भाव छुपाते हुए और किरण की ओर इशारा करते हुए कहा.
'अब तुम भी हमें छोड़कर जा रहे हो?' पूछते हुए किरण की आवाज भारी हो गई.
'क्या करूं माँ, यहां बहुत हाथ-पैर मारे लेकिन काम बढ़ नहीं रहा है. मेरा यहां से जाने का बिलकुल मन नहीं है लेकिन मजबूरी है.' सतीश ने माँ को समझाने की कोशिश की.
'कभी सोचा है कि हमारी इस उम्र में हमारा क्या होगा? कौन हमारी देखरेख करेगा?'
'मैं बहुत दूर तो नहीं जा रहा हूं, सतना पास में है, एक आवाज दोगी और मैं सामने आकर खड़ा हो जाऊंगा.'
'रात-बिरात को जरूरत पड़ी तब भी आ जाएगा?'
'तुरंत नहीं आ सकता लेकिन अगले दिन आ जाऊंगा.'
'और कहीं रात को प्राण छूट गए तो?'
'कैसी अशुभ बातें मुंह से निकाल रही हो? कुछ नहीं होगा आप लोगों को.'
'हाँ, यह बात तो है कि हम लोगों को कुछ नहीं होगा. अब जब जाने का फैसला कर लिया है तो तू जा, तू भी चले जा.' किरण रोने लगी.
सतीश ने दोनों हाथ जोड़े और उठ खड़ा हुआ. एक माह के भीतर जैतहरी की दूकान का काम सिमट गया, सतना में दूकान खुलने का काम शुरू होने की तैयारी हो गई और एक दिन सतीश और उसकी पत्नी घर आए और दोनों के पैर छू कर अपना नया ठिकाना ढूंढने के लिए निकल गए. दयालदास और किरण उन दोनों की ओर चुपचाप देखते रह गए.
(तेईस)
घर में यदि शांति हो, परस्पर सद्भाव हो तो उसका प्रभाव पूरे परिवार पर पड़ता है. खुश रहना आसान है लेकिन यह बात कम लोगों को समझ में आती है. दुख और सुख सबके साथ लगे रहते हैं लेकिन हर स्थिति में जो लोग स्वयं को संतुलित रखकर जीना सीख जाते हैं, उनकी खुशियां हर समय कायम रहती है. परिवार में सार्थक संप्रेषण आवश्यक है, इससे आपसी संबंधों में पारदर्शिता बनती है और अनेक समस्याओं के समाधान आसानी से निकल आते हैं. किसी के काम की प्रशंसा करना, एक दूसरे को देखकर मुस्कुराना, एक दूसरे का हालचाल पूछना, एक दूसरे की चिंता करना, ये ऐसे सूत्र हैं जो आपस में खुशियां बिखेरते हैं. जो लोग इन बातों का ध्यान नहीं रखते उनके घर में गलतफहमियां जन्म लेने लगती हैं और कटुता का वातावरण विकसित होने लगता है. वातावरण बिगाड़ने में सबसे ज्यादा हाथ बेमतलब की कहा-सुनी का होता है. कब बोलना और कब चुप रह जाना, यह सबको सीखना चाहिए. किसी बात को सही ढंग से समझने के लिए सुनने का धैर्य विकसित करना बेहद जरूरी है. चुप रहकर सुनना बहुत कठिन होता है क्योंकि हमारे बोलने का उतावलापन बाधक बन जाता है. सच तो यह है कि मौन ही वह साधन है जिसकी सहायता से हम सामनेवाले की बात को सही ढंग से समझ सकते हैं. यही मौन स्वयं को जानने का भी साधन है.
आचार्य रजनीश (ओशो) कहते हैं- ‘तुम बोलते वक्त सजग होते हो, सुनते वक्त नहीं होते...जब भी कोई दूसरा तुमसे बोलता है तुम सजग नहीं होते क्योंकि एक ‘इंटरनल डायलाग’ है, एक भीतर चलने वाला वार्तालाप है, जिसमें तुम दबे रहते हो. दूसरा बोले चला जाता है, तुम ऐसा भाव भी प्रकट करते हो कि तुम सुन रहे हो लेकिन वह केवल तुम्हारी भावभंगिमा है, भीतर तुम बोले चले जा रहे हो. जब तुम भीतर बोल रहे हो तो किसकी सुनोगे? तुम भीतर जो बोल रहा है उसको ही सुनोगे क्योंकि बाहर बोलनेवाले की आवाज तो तुम्हारे तक पहुँच ही न पाएगी.’
इन गूढ़ बातों से अंजान विकास के परिवार का माहौल इन्हीं बातों के अनुरूप है. इसके केंद्र में है घर की मुखिया, प्रभा. कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए उसने साहस संजोने के साथ-साथ समझदारी का पाठ भी सीखा था. समझदारी के लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं होता, समझ की जरूरत होती है जो प्रभा में शुरू से थी. यद्यपि उसका ब्याह सड़क पर बैठकर साग-सब्जी बेचने वाले से हुआ था फिर भी वह उसकी आदर्श पत्नी बन कर रही. उसने गरीबी देखी थी, पति का वियोग सहा था, अपनी एक मात्र संतान विकास को छोटे से बड़ा किया और अब मुखिया के रूप में अपने परिवार को संवारने में लगी हुई है. परिवार को नियंत्रित करना और उसका प्रबंध करना, दोनों में फर्क होता है. नियंत्रित करने वाला धीरे-धीरे तानाशाह हो जाता है, शासक जैसा व्यवहार करने लगता है जबकि प्रबंधन में पूरे परिवार की आपसी सहमति होती है तथा अनुशासन होता है.
माहवारी के दिनों में नीलम को बहुत दर्द हुआ करता है. इतना अधिक कि सहन करना मुश्किल हो जाता है. न दिन को चैन, न रात को नींद. विकास ने डाक्टर से बात की तो उसने पूछा, 'कितने बच्चे हैं तुम्हारे?'
'तीन हैं.'
'तो बच्चेदानी को निकलवा दो.'
'तो क्या उससे दर्द होना बंद हो जाएगा?'
'जब बच्चेदानी निकल जाएगी तो मासिकधर्म बंद हो जाएगा, दर्द अपने आप खत्म हो जाएगा.' डाक्टर ने सलाह दी. घर आकर विकास ने नीलम से डाक्टर की बात बताई. नीलम ने कहा, 'माँ जी से बात करके बताती हूं.' नीलम ने कहा.
'अभी मत कराओ. तुम अभी पैंतीस साल की हो, अभी बच्चेदानी निकलवाना उचित नहीं है.' प्रभा ने सलाह दी.
'पर माँ जी, बहुत तकलीफ होती है.'
'कोई नई तकलीफ है क्या? पिछले बीस साल से यह दर्द तुम सह रही हो. देखो, प्रकृति ने स्त्रियों के लिए एक शारीरिक व्यवस्था बनाई है तो उसके पीछे कोई न कोई कारण होगा, कोई अच्छी बात होगी. उसकी अवज्ञा करने से शरीर को नुकसान हो सकता है.'
'फिर, ठीक है माँ जी, जैसा आप उचित समझें.' नीलम ने उत्तर दिया.
प्रभा ने नीलम को गले से लगा लिया.
(चौबीस)
ठाकुर साहब के घर की बातें अनोखी हुआ करती हैं. आपको तो मालूम है कि उनकी दोनों बहुओं के बीच गजब का तालमेल है, प्यार है, आपसी सद्भाव है लेकिन उनके दोनों लड़कों
के बीच ऐसा नहीं है. विपरीत ध्रुव हैं दोनों. बड़ा बेहद सज्जन तो छोटा उतना ही तेज. ठेकेदारी का काम छोटा लड़का प्रह्लाद देखता है, वहीं पर घर का काम और रिश्तेदारी निभाने का काम उनके बड़े लड़के विक्रम के जिम्मे है. ठाकुर साहब की सबके काम पर पूरी नजर रहती है. काम सौंपने और काम होने या न होने की रिपोर्ट बराबर लिया करते हैं और उसके आगे क्या करना है, उसके निर्देश देते है. घर में केवल उनका हुक्म चलता है. केवल घर में नहीं, गांव में भी चलता है. उन्होंने जो कह दिया सो कह दिया. यह उनकी जीवन भर की अर्जित शक्ति है. इसके पीछे उनकी सदाशयता का बहुत बड़ा हाथ है. वे कभी भी किसी का अहित करने की बात सोचते तक नहीं हैं. वे मानते हैं कि मनुष्य में अवगुण होते हैं लेकिन उस पर कम ध्यान दिया जाकर यदि उसके गुणों पर ध्यान दिया जाए तो उसे बेहतर मनुष्य बनाया जा सकता है. उनकी 'बेहतर मनुष्य' की एक परिभाषा है, अधिक काम करने वाला मनुष्य. ठाकुर साहब का जीवन परिश्रममुक्त रहा है, कभी कोई काम नहीं किया लेकिन किसी से काम करवाने का हुनर उनमें बखूब है. उनकी दृष्टि में वह व्यक्ति हीरा है जो बिना थके काम करता है और काम करते वक्त अपने चेहरे पर मुस्कान कायम रखता है. उनके दोनों बेटे इस पैमाने पर खरे नहीं उतरते फिर भी उन्हें भरोसा था कि वे दोनों अपने बाप का नाम रोशन करेंगे. ठाकुर साहब स्वयं बड़े बाप के बेटे थे, उनके बेटे भी उसी परम्परा के वाहक हैं. वे भी दूसरों से काम लेने में दोनों उस्ताद हैं, उनकी इतनी क्षमता से ठाकुर साहब को पर्याप्त तसल्ली है.
आज दोनों लड़के सज-धज कर निकले हैं, कहीं जाने का इरादा है. ठाकुर साहब ने पूछा, 'आज सवारी कहां जा रही है?'
'बस, यूं ही.' प्रह्लाद ने उत्तर दिया.
'यूं ही ? इतना सजकर?'
'आपकी इज्जत का ख्याल करके ऐसा करना पड़ता है, अन्यथा हम तो चड्डी बनियान पहनकर घर से निकल पड़ते.'
'वाह, मेरी इज्जत का बहुत ध्यान रहता है तुम लोगों को?'
'क्यों, कुछ उल्टी-सीधी खबर मिली क्या आपको?'
'हांं, कुछ बातें मेरे कानों में पड़ी हैं.'
'ज़रा सुनें.'
'तुम दोनों आजकल स्कूल के चक्कर बहुत लगा रहे हो, क्या काम रहता है वहां?'
'वहां का हेडमास्टर स्कूल फंड में काफी घपला कर रहा है, हम लोग इस प्रकार के भ्रष्टाचार को नहीं होने देंगे.'
'स्कूल के भ्रष्टाचार से तुम लोगों का लेना-देना?'
'क्यों, स्कूल हमारा नहीं है क्या?'
'ठीक बात है, स्कूल तुम्हारा है लेकिन स्कूल के फंड का कैसा उपयोग करना, यह हेडमास्टर और सरकार के बीच की बात है.'
'सरकार भी तो हमारी है.'
'वह भी ठीक है लेकिन वहां के मामले में तुम लोगों का नाक घुसेड़ना मुझे उचित नहीं प्रतीत होता.'
'आपके पास कौन, हेडमास्टर आया था क्या?'
'हेडमास्टर साहब आए थे क्या, ऐसा बोलो. अपनी उम्र से बड़े लोगों के प्रति बातचीत में आदरभाव दिखाई देना चाहिए.'
'चलिए, भूल हुई लेकिन मुझे यह समझ में नहीं आ रहा है कि आपको इसमें क्या आपत्ति है?'
'एक बात बताओ, ठेकेदारी का इतना बड़ा काम हमारा है, क्या इसमे भ्रष्टाचार नहीं है? जब हम इसमें शामिल हैं तो किसी दूसरे पर उंगली उठाने का अधिकार हमें नहीं है.' ठाकुर साहब ने धीरे से समझाया. दोनों भाई पिता की बात सुनकर चुप रह गए, 'ठीक है, अब से हम किसी के मामले में दखल नहीं देंगे.' प्रह्लाद ने कहा.
'देखो, संसार का नियम है कि बिना लेनदेन के कोई काम नहीं होता. ऊपर से लेकर नीचे तक जाल फैला हुआ है. तो, समझदारी इसमें है कि अपना काम चुपचाप निकालो और दूसरे के काम में टांग मत अड़ाओ.' ठाकुर साहब बोले और अखबार पढ़ने लगे.
(पच्चीस)
जीवनचक्र लगातार घूमते रहता है. सुख-दुख साथ-साथ चलते हैं, कभी ज्यादा कभी कम. सुख का समय पलक झपकते बीत जाता है लेकिन दुख के दिन बड़ी मुश्किल से बीतते हैं. दयालदास अब सत्तर वर्ष का हो चुका है. अब शरीर साथ नहीं देता, दिमाग भी गड़बड़ा गया है. दूकानदारी चौपट हो गई है लेकिन समय काटने के लिए कोई दूसरा उपाय नहीं है इसलिए दूकान रोज सुबह खुलती है, कुछ ग्राहक आ जाते हैं, दूकान रोज रात को बंद हो जाती है. किरण का शरीर भी अब उतना साथ नहीं देता, किसी प्रकार दोनों समय खाना बनाकर परोस देती है और फिर अपनी थाली लगाकर खाने के लिए बैठ जाती है. दोनों को शारीरिक बीमारियों ने घेर रखा है, दवा-डाक्टर के भरोसे जीवन टिका हुआ है. जब बुढ़ापा आता है तब अकेला नहीं आता, अभाव लेकर आता है, कमजोरी लेकर आता है, बीमारियां लेकर आता है और साथ में बेबसी लेकर आता है. कोई आसपास नहीं होता जिससे बातें कर सकें, अपने दिल का हाल कह सकें. पूरी दुनियां बेगानी लगती है, यहां तक कि अपना शरीर भी बेगानों जैसा व्यवहार करने लगता है. शरीर का हर अंग धीरे-धीरे कमजोर होते जाता है. सबसे ज्यादा असर दिमाग पर पड़ता है, इंसान से छोटी-छोटी लेकिन ऐसी भूलें होने लगती है कि खुद को अचरज होता है, जैसे शर्ट की बटन ऊपर-नीचे लग जाती है या पेंट की जिप चढ़ाना भूल जाते हैं. खैर, अब किसको दिखाना है, कौन है ये सब देखने वाला? आसपास कोई नहीं रह गया है, जो रह गया है वह है अकेलापन. कुर्सी में बैठ जाओ तो दीवारें और दरवाजे दिखाई पड़ते हैं और बिस्तर पर लेट जाओ तो सीलिंग और उस पर लटकता पंखा. बीता हुआ जीवन याद आता है, घटनाएं याद आती हैं, कुछ पुराने किस्से याद आते हैं.
दयालदास को याद आ रहा है, उन दिनों वह दस-ग्यारह साल का रहा होगा, उसका खेलकूद में बहुत मन लगता था. उसका प्रिय खेल था फुटबाल. फुटबाल खेलने के लिए वह स्कूल के मैदान में पहुंचने के लिए लालायित रहता था लेकिन उसके बाबा उसे व्यापार सिखाने के लिए लगे रहते. सिंधी परिवारों में बचपन से ही व्यापार से जोड़ने की परम्परा रही है, लिहाज़ा, उनकी कड़ी नजर दयालदास पर रहती थी कि वह पढ़ाई और खेल की तरफ न मुड़े, केवल व्यापार पर ध्यान लगाए. फिर भी, स्कूल जाने की इजाजत मिली हुई थी इसलिए दयाल स्कूल के समय में से समय चुरा कर अपना खेलने का शौक पूरा कर लिया करता था.
उस दिन जैतहरी में बहुत तेज बारिश हुई थी. स्कूल के मैदान में पानी भरा हुआ था. पानी से भरे मैदान में फुटबाल खेलने का मजा कुछ ज्यादा रहता है, सहपाठियों के साथ वह भी मैदान में कूद पड़ा. पानी के कारण मैदान में बहुत कीचड़ हो गया था इसलिए उसमें फिसलते-गिरते खेलने में जो आनंद आया था, उसका क्या कहना? खेल खत्म होने के बाद वह खुशी-खुशी घर वापस आया, दुकान में घुसा और उसका सामना उसके बाबा से हुआ. 'कहां से आ रहे हो?'
'स्कूल से.' दयाल ने उत्तर दिया.
'कपड़े कीचड़ से कैसे सने हुए हैं?'
'वो...स्कूल में फिसल कर गिर गया था.'
'झूठ बोलता है.' एक जोर का थप्पड़ उसके गाल पर पड़ा. 'सच बता मुझे, नहीं तो आज तेरी खैर नहीं.'
'स्कूल में फुटबाल खेल रहा था.' दयाल ने रोते हुए बताया.
'स्कूल पढ़ने के लिए भेजता हूँ तुझे या खेलने के लिए?'
'दोनों के लिए.'
दूसरे गाल में एक और थप्पड़ पड़ा. 'केवल पढ़ने के लिए भेजा है, खेलने के लिए नहीं, समझा?'
'जी, समझ गया.' दयाल दौड़कर घर में घुस गया और माँ की गोद में अपना सिर छुपा कर बहुत देर तक रोता रहा. माँ उसे चुप कराती रही, जब वह चुप हो गया तो उठा और अपने कपड़े बदलने चला गया.
उस घटना का असर यह हुआ कि जब दयालदास के बच्चे बड़े हुए, उसने अपने तीनों बच्चों को पढ़ने और खेलने से कभी नहीं रोका. जो वह नहीं बन सका, नहीं कर सका, उसे वह अपने बच्चों को करते हुए देखना चाहता था, उसने वैसा ही किया. अपने जीवन में जो कुछ इंसान भुगतता है, उन बातों से वह अपने बच्चों को बचा कर रखने की कोशिश करता है. यह क्रिया की प्रतिक्रिया है.
दयालदास दुनिया में अकेला नहीं है, सभी अपने बच्चों में अपने अतीत को झांकते हुए उनका भविष्य देखते हैं. अतीत की बातें उनके मन में बसी हुई रहती हैं, वे मौका खोजते रहती हैं कि कैसे उन यादों को किसी बेहतर परिणाम में बदला जाए. अब यह बच्चों के ऊपर रहता है कि वे खुद को मिले अवसर का कितना लाभ उठाते हैं. दयालदास के तीन में से दो बच्चे इसका लाभ नहीं उठा पाए लेकिन छोटे वाले लड़के हरीश ने इस मिली हुई आज़ादी का भरपूर लाभ उठाया, परिणाम स्वरूप वह आज अमेरिका में है, अच्छी नौकरी पा गया है और अपनी पत्नी के साथ वहां सुखी जीवन व्यतीत कर रहा है. वह वहां सुखी है लेकिन यहां उसके माता-पिता कष्टमय जीवन से जूझ रहे हैं. बुढ़ापा कष्टमय होता ही है लेकिन जब बच्चों का साथ होते हुए उनका साथ नहीं मिलता तो दुखद भी हो जाता है. लड़की ब्याह के अपनी ससुराल चली गई, बड़ा लड़का घर से दूर होकर अलग रहता है और छोटा लड़का विदेश में है, तीन-तीन बच्चों के होते हुए यहां उनके पास कौन है? दोनों एक दूसरे का उदास चेहरा देखते हुए किसी प्रकार दिन बिताते हैं और रात करवटें बदलते, खाँसते हुए बीत जाती है.
दयालदास की लड़की मनीषा सतना से कुछ दिनों के लिए मायके आई हुई है. उसके दो बच्चे भी साथ में आए हैं. माँ-बेटी रात को बड़ी देर तक बातें करते रहते हैं, उनकी बातें खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं. दयालदास की नींद में खलल हो रहा था लेकिन चार दिनों की बात है, यह सोच कर चुप रहना पड़ा. मनीषा के वापस जाने का दिन आ पहुंचा. उसने अपने बाबा से कहा, 'मुझसे आप लोगों की तकलीफ देखी नहीं जा रही है. मैं कैसे आपके काम आ सकती हूं?'
'बेटा, हमें हमारे हाल पर छोड़ दो. जैसे भी दिन हमारे भाग्य में बदे हैं, हमें भुगतना होगा. जिनसे उम्मीद लगा रखी थी, वे तो दूर हो गए हैं, तुम भी इतनी दूर हो कि तुम क्या कर सकती हो? तुमने पूछ लिया, इतना बहुत है.' दयालदास ने उत्तर दिया.
'नहीं बाबा, आप जैतहरी का मोह छोड़ो और मेरे साथ सतना चलो, मैं वहां आप लोगों की देखरेख आसानी से कर सकूंगी. सतीश भी वहीं है. हम लोगों का साथ मिल जाएगा तो आप दोनों को आराम रहेगा.'
'हम लोग सतीश के घर नहीं रहना चाहते. यदि तुम्हारी ससुराल में जाकर रहने की बात तुम कर रही हो तो हमें मंजूर नहीं है.'
'नहीं बाबा, पड़ोस में एक किराए का घर लेकर वहां रहना, मैं वहाँ आकर आप लोगों की मदद कर दूंगी. मैं अपने ससुराल वालों से बात कर चुकी हूंं, वे लोग तैयार हैं.'
'क्यों किरण, तुम क्या कहती हो?' दयालदास ने पत्नी से पूछा.
'बात तो ठीक लग रही है लेकिन तुम्हारे यहां के धंधे का क्या होगा? आमदनी बंद हो जाएगी तो खर्च कैसे चलेगा? तुम्हारे पास क्या इतना पैसा है कि वह हम दोनों की पूरी उम्र तक पूर जाएगा?'
'हां, यह बात तो है, मेरे पास इतना पैसा नहीं है कि हम लोग बैठ कर खा सकेंं. फिर दवा-दारू की भी जरूरत होगी, अस्पताल जाना पड़ सकता है, बहुत पैसा लगेगा.'
'फिर?' किरण ने पूछा.
'तो फिर अभी नहीं जाते, पहले वहां के लिए व्यवस्था हो जाए, उसके बाद विचार करेंगे.'
'आपकी दूकानदारी का जो हाल है, आपकी व्यवस्था बनने से रही.' मनीषा ने कहा.
'तो कैसा करें?
'वह सब मैं देखूंगी.'
'तुम्हारी देखरेख तक तो ठीक है लेकिन हम लोगों पर तुम्हारा खर्च करना ठीक नहीं है, यह पाप हम लोग अपने जीवन के आखिरी दिनों में अपने ऊपर नहीं लेंगे, हम लोग वहां जाने के लिए तैयार नहीं हैं, जब सुविधा बनेगी तब विचार करेंगे, नहीं तो इसी तरह से बची हुई जिंदगी गुजारेंगे.' दयालदास ने मनीषा के सिर पर हाथ फेरा और दोनों की आंखों से आंसू बहने लगे.
मनीषा के जाने के बाद दयालदास के दिमाग में आया कि इस घर को बेच दिया जाए तो पर्याप्त पैसा आ जाएगा लेकिन दूसरे ही क्षण विचार उभरा, 'पिता का मुश्किल दिनों में खरीदा हुआ घर बेच दूं? न..न..मुझसे यह न होगा.'
(छब्बीस)
अमेरिका में रहते हुए हरीश का जी उकता गया है, वह भारत वापस लौटना चाहता है लेकिन प्रश्न यह है कि उसकी पत्नी नेहा अब जाने के लिए राजी होगी या नहीं? पहले तो वह भारत में ही बसना चाहती थी लेकिन इतना अधिक समय बीत चुका है, पता नहीं उसकी मनस्थिति अब क्या है? एक रात सोने के पहले उसने नेहा से पूछा, 'मेरा भारत जाने का दिल कर रहा है.'
'चलते हैं. तुम तो कब से वहां गए ही नहीं हो.' नेहा ने स्वीकृति दी.
'केवल जाने का नहीं, वहां रहने का मन हो रहा है. यहां की ज़िंदगी से मुझे ऊब होने लगी है, मुझे अब अपने देश की याद आ रही है.'
'यह तो मेरे मन की बात हो गई. चलो, तुम यहां की नौकरी छोड़ो, मैं भी छोड़ती हूं. वैसे तो तुम यहां पैसे कमाने के लिए रुके हुए थे, क्या तुम्हारा काम हो गया?'
'मेरा बैंक बेलेंस तुम्हें मालूम है, उसके बाद यह सवाल क्यों?'
'वह मुझे मालूम है लेकिन तुम्हें कितना चाहिए, यह मालूम नहीं.'
'कटाक्ष कर रही हो?'
'नहीं, मनुष्य कि आर्थिक अपेक्षा असीमित होती है. मुझे क्या मालूम कि तुम्हें कितना चाहिए? अब अगर उतना जुड़ गया हो तो फिर चले चलते हैं.'
'यह बाद की बात है, पहले यह तय कर लें कि वहां चलना है.'
'यह तो मेरी तरफ से तय रहा, मुझे भी अपने मम्मी-पापा के नजदीक रहने का मन है, उन्हें मेरी जरूरत है.'
'मेरा भी वही हाल है, पुरानी बातें भूलकर अब मैं भी बाबा और मां के साथ रहना चाहता हूं. उन्हें मेरी जरूरत होगी.'
'लेकिन वहां कहां रहेंगे, क्या करेंगे?'
'उस पर विचार होता रहेगा, फिलहाल यह तय रहा कि हम लोग अपने देश वापस जा रहे हैं.' हरीश ने कहा, नेहा ने स्वीकृति में अपना सिर हिलाया. दोनों ने खुश होकर एक-दूसरे को बाहों में कस लिया.
हरीश का नौकरी छोड़ना उसके नियोक्ता के लिए आश्चर्य की बात थी. वह हरीश की कार्यशैली से बहुत खुश थे, वे उसे नहीं छोड़ना नहीं चाहते थे. उन्होंने पूछा, 'नौकरी क्यों छोड़ रहे हो?'
'सर, अब मैं अपने देश जाना चाहता हूं. मेरे माता-पिता को मेरी जरूरत है.' हरीश ने उत्तर दिया.
'तुम क्यों जा रहे हो, उन्हें यहां बुला लो.'
'यहां केवल छः महीने के लिए बुला सकता हूं, अधिक समय के लिए वीसा नहीं मिलेगा. वे दोनों वृद्ध हैं, बीमार रहते हैं, मुझे वहां जाना होगा.'
'वहां पर देखरेख के लिए केयरटेकर तो मिल जाते होंगे. आप यहाँ से उन्हें पैसे भेज दीजिए, वे व्यवस्था कर लेंगे.'
'गांव है सर, ऐसे लोग वहां नहीं मिलते. अगर मिल भी गए तो अपनापन और आत्मीयता कहां मिलेगी?'
'हाँ, ये बात तो है. आपका त्यागपत्र स्वीकार किया जाता है लेकिन अभी तीन माह तक काम करना होगा.'
'जी, धन्यवाद आपको.'
परदेश में देश की याद आती है और देश में परदेश की. सवाल यह है कि ऐसा क्यों होता है. दरअसल दूरी हमें आकर्षित करती है. वर्तमान भूतकाल को याद करता है. अमेरिका में रहते हुए हरीश को बहुत लम्बा समय हो गया है, वह यहां अपने विवाह के समय भारत आया था, उसके बाद जाना नहीं हुआ. इस बीच एक संतान घर में आ गई, प्यारी सी गुड़िया. इस बार भारत में जाने की वज़ह 'कुछ दिनों' के लिए नहीं, हमेशा के लिए बन रही है. हरीश और नेहा दोनों अपना पारिवारिक दायित्व निभाने और अपनी मिट्टी से जुड़ने के लिए आ रहे हैं. वे अपनी बच्ची स्नेहा को भारतीय संस्कार और शिक्षा देना चाहते हैं, अमेरिका की संस्कृति उन्हें नहीं जम रही है. वे स्नेहा से शुरू से ही हिंदी तथा सिंधी भाषा में ही बातचीत कर रहे हैं और अंग्रेजी का कम-से-कम उपयोग किया करते हैं. अब उसकी उम्र स्कूल भेजने की हो रही है. अभी उसके कोई दोस्त-यार नहीं हैं, जब वह बड़ी हो जाएगी तो फिर उसके दोस्त बन जाएंगे तब वह यहां से जाने के लिए शायद तैयार न हो. इसलिए उसे भारतीय परिवेश में अभी से ढालने के लिए अपने देश में जाना जरूरी लग रहा है. कुल मिलाकर, अमेरिका छोड़ने की पटकथा लिखी जा चुकी है, केवल मंचन करना शेष है.
नेहा ने भी नौकरी से इस्तीफा दे दिया. अमेरिका छोड़ने के पहले बचे हुए अमेरिका को घूमने की योजना बनने लगी, उनकी अपनी-अपनी कम्पनियों से आर्थिक लेन-देन की बात शुरू हो गयी और वायुयान से दिल्ली वापसी की टिकट बन गई. एक दिन उन्होंने अमेरिका को विदा कह दिया और वहाँ से उड़ चले. रास्ते में दोनों के बीच इस बात की सहमति बन गई कि पहले दिल्ली में किसी होटल में चार-पांच दिन रुकेंगे, दिल्ली घूमेंगे, उसके बाद एक सप्ताह के लिए जैतहरी जाएंगे और फिर कानपुर जाएंगे. वहां पहुंच कर दोनों परिवारों से बातचीत करके आपसी सहमति से कोई रास्ता खोजेंगे कि भारत के किस शहर में बसा जाए?
वह दिन भी आ पहुंचा जब वे तीनों अपने सामान सहित दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर आ पहुंचे. दिल्ली में तीन दिन बिताने के बाद वे ट्रेन से जैतहरी के लिए रवाना हो गए. साथ में चार बड़े सूटकेस और तीन बेग थे, सबको लेकर वे तीनों अनुपपुर आए और कार से जैतहरी पहुंच गए.
जैसे ही वे तीनों घर पहुंचे, अचानक उन्हें देखकर दयालदास को विश्वास नहीं हुआ. उसने अपना चश्मा उतारा, रूमाल निकालकर उसे साफ किया और फिर देखा, सामने हरीश, बहू नेहा और उनके साथ एक प्यारी सी छोटी बच्ची अंदर आ रहे थे. दयालदास ने किरण को आवाज लगाई, 'किरण देखो तो, कौन आया है?' किरण ने बाहर आकर उन सब को देखा तो वह भी विस्मित हो गई, 'अरे तुम लोग?' वह दौड़कर उनके पास पहुंची और कुछ दूरी पर ठहर गई, उसकी आंखों से आँसू बहने लगे. हरीश और नेहा ने दोनों के पैर छुए और देर तक सब गले से लिपट कर रोते रहे.
'यहां आने की पहले से खबर नहीं की?' दयालदास ने हरीश से पूछा.
'पहले सोचा था कि आपको खबर कर दूं लेकिन बाद में यह ख्याल आया कि सरप्राइज दिया जाए, आप लोगों को. एक और बात आपको जानकार और बड़ा आश्चर्य होने वाला है.' हरीश ने मुस्कुराते हुए कहा.
'वो क्या?'
'हम लोगों ने हमेशा के लिए अमेरिका छोड़ दिया है, अब आप लोगों के साथ रहेंगे.'
'ऐसा क्या?'
'हाँ, सच में.'
'ये क्या सुन रही हूं मैं?' किरण बीच में बोल उठी.
'सच में, हम लोग अब यहीं रहेंगे, भारत में, अपने देश में.' नेहा ने उत्तर दिया. 'स्नेहा अब बड़ी हो रही है, हम इसका पालन-पोषण भारतीय परिवेश में, यहाँ की बोली-भाषा में करना चाहते हैं.'
'यह तो बहुत अच्छा निर्णय लिया तुम लोगों ने.' किरन की आँखें खुशी से नाच रही थी.
नेहा ने स्नेहा से कहा, 'स्नेहा बेटा, ये तुम्हारे दादा जी और दादी जी हैं, इनके चरण स्पर्श करो.' स्नेहा ने संकोच के साथ आगे बढ़ते हुए, फिर झुककर दोनों के पैर छुए. दोनों ने बारी-बारी से गले लगाया और उसके मुलायम बालों को सहलाते हुए ढेर सारा आशीर्वाद दिया.
भोजन के बाद बातचीत की महफिल जमी. 'वहां कुछ गड़बड़ हो गया क्या जो इतना अच्छा देश छोड़कर यहां आ गए तुम लोग?' दयालदास ने उत्सुकतावश पूछा.
'नहीं, ऐसी कोई बात नहीं. वहां सब ठीक था, अच्छी नौकरी थी, पैसा खूब मिलता था, ऐश-ओ-आराम था.' हरीश ने बताया.
'फिर क्या बात हो गई?'
'वह देश अपना नहीं था. मैं इतने साल वहां रहा लेकिन मुझे हर दिन अपने देश की याद आती थी. अपने देश की मिट्टी की खुशबू और यहाँ के लोगों की आत्मीयता मैं भूल नहीं पाया.'
'संग-साथ तो वहां भी बन गया होगा, उन्हें छोड़कर आने से दुख नहीं हुआ?'
'हुआ, क्यों नहीं? पर सच बताऊं? वहां मैं मशीन बन गया था, पैसा बनाने की मशीन. मेरा इंसान दिनों दिन कम होता जा रहा था. मैं फिर से उसी तरह का इंसान बनना चाहता था जैसा मैं यहां था, जिसमें भावनाएं थी, अपनापन था, आपसी सरोकार था.'
'ये सब वहां नहीं है क्या?'
'वहां घड़ी देखकर जिंदगी चलती है, चलती क्या है, दौड़ती है. कमरे से सड़क और सड़क से कमरे के बीच में आते-जाते रोज सुबह से शाम हो जाया करती थी. घर-घर जैसा नहीं लगता था. सबसे दयनीय स्थिति बेचारी स्नेहा की थी. ऐसा महसूस होता था कि जैसे हम लोगों का दुलार उसके भाग्य में नहीं रहा. वीकेंड को छोड़कर बाकी दिनों में हमारे लिए वह प्लास्टिक की गुड़िया कि तरह थी. रात के वक्त जब हम लोग अपने काम से लौटते तो वह हमें सोई हुई मिलती और सुबह हम लोगों की समय पर ऑफिस पहुंचने की जल्दी. उससे कब प्यार करें? बहुत काम किया वहाँ, बहुत पैसे कमा लिए, जी ऊब गया. अब कुछ ऐसा करने का मन है ताकि काम के साथ-साथ कुछ नाम भी हो.'
(सत्ताईस)
प्रभा का स्वास्थ्य कमजोर होते जा रहा था. ब्लडप्रेशर की दवा नियमित रूप से खा रही है लेकिन कई बार वह बहुत बढ़ जाता है. जब बढ़ता है तो घबराहट होने लगती है, चक्कर आने लगता है. एक दिन वह बेहोश होकर गिर पड़ी. नीलम किचन में थी, उसे मालूम नहीं पड़ा. सब्जी छौंक कर वह किचन से बाहर निकली तो सास को जमीन में पड़े हुए देखा. वह चिल्लाई, 'मम्मी जी...मम्मी जी.'
प्रभा अचेत थी, उसके शरीर में कोई हरकत नहीं हो रही थी. नीलम घबराई हुई घर के बाहर दौड़ी, सामने वाले घर में कस्तूरी मौसी को बुलाकर बोली, 'चलो, देखो मौसी जी, मम्मी जी को क्या हो गया है?'
कस्तूरी भागती हुई आई, नब्ज देखी, छाती में कान लगाया, कुछ समझ में नहीं आया, 'डाक्टर को बुलाओ.' कस्तूरी ने कहा. पड़ोस के एक लड़के को डाक्टर बुलाने के लिए भेजा और दूसरे को विकास को खबर करने के लिए. विकास और डाक्टर साथ-साथ पहुंचे. डाक्टर ने जांच की. ब्लडप्रेशर बहुत अधिक निकला. प्रभा को जमीन से उठाकर पलंग में लिटाया गया. इंजेक्शन लगा, ओ.आर.एस.घोल पिलाया और दवा लिखकर दी. 'एक-दो दिन देखते हैं, फिर तय करेंगे कि आगे क्या करना है.' डाक्टर ने कहा. इस बीच प्रभा को होश आ गया लेकिन उसके शरीर में हरकत बहुत कम थी. अगली सुबह डाक्टर फिर देखने आए, जांच की, बताया, 'शरीर के बाएं हिस्से में हल्का सा लकवा लग गया है, गम्भीर बात नहीं है, दवा और मालिश से कुछ समय में ठीक हो जाएगा.'
अब नीलम का काम बढ़ गया. सुबह जल्दी जागना, सास को टायलेट लेकर जाना, चाय पिलाना. उसके बाद बच्चों की स्कूल भेजने की तैयारी, सास को नाश्ता देना, एक घंटे बाद नहलाना, कपड़े पहनाना. खुद नहाकर पूजा करना, खाना तैयार करना और दिन भर जो चलता है, वह तो चलता ही रहता है.
गाँव में इलाज़ का अलग माहौल होता है. घर-घर में डाक्टर होते हैं. किसी को कुछ आए, न आए, रोग और उसके इलाज़ के बारे में जरूर जानते हैं. कुछ लोग अंग्रेजी दवा बताने का हुनर रखते हैं लेकिन अधिकतर देसी और आयुर्वेदिक उपाय बताने की काबिलियत रखते हैं. जिसे भी सुनाई पड़ता कि प्रभा को लकवा लग गया, वे उसे देखने आते, 'कब हुआ? कैसे हुआ? हमको तो बाद में मालूम चला.' आदि, आदि. उसके बाद एक न एक सलाह देकर अतिथि चले जाते, 'फलाना चूर्ण दो, इस तेल की मालिश करो, ऐसा करना, ऐसा बिलकुल न करना, चिंता मत करो, जल्दी ठीक हो जाएगी.' आदि, आदि.
नीलम सब की बात ध्यान से सुनती, सहमति में अपना सिर हिलाती और उन्हें विदा करती. एक महीने तक एक इलाज़ चलता, दूसरे महीने दूसरा, तीसरे महीने तीसरा इलाज़. इस प्रकार कई महीने बीत गए, प्रभा ने जो बिस्तर पकड़ा सो पकड़ लिया. सास को रोज उठाते-बैठाते नीलम की कमर में दर्द शुरू हो गया लेकिन नीलम ने न तो घर का काम छोड़ा, न सास की देखरेख में कोई कमी की.
एक दिन प्रभा ने नीलम से कहा, 'तू मेरी इतनी सेवा करती है, मैं तेरा कर्ज कैसे चुकाऊंगी?'
'कर्ज चुकाने वाली बात कहां से आ गई? मेरा सौभाग्य है कि मुझे आपकी सेवा करने का मौका मिला. मैं तो पुण्य कमा रही हूं.' नीलम ने कहा.
'मैंने तेरे चेहरे पर कभी कोई शिकन नहीं देखी. मेरा सब कुछ करती है. कोई दूसरा हो तो झल्लाने लगेगा.'
'जब कोई काम बोझ लगता है, तब झल्लाहट होती है लेकिन यदि मन से किया जाए तो खुशी मिलती है. आपकी सेवा करने में मुझे मजा आता है. सच बताऊं? मुझे आपको इतनी तकलीफ में देखकर बहुत दुख होता है. क्या वो दिन थे जब आप ठसके से चलती थी, घर के काम में सहयोग किया करती थी, अब आप सुबह से रात तक और रात से सुबह तक चुपचाप लेटी रहती हैं, कैसा कठिन जीवन हो गया है आपका?'
'जो भाग्य में बदा हुआ है, मेरी बच्ची, भुगतना पड़ेगा. हर कोई चाहता है कि उसके जीवन का अंतिम दिन चलते-फिरते आए, किसी से सेवा न करवाना पड़े लेकिन इंसान का चाहा कहाँ पूरा होता है. मैंने सोचा भी नहीं था कि मुझे ऐसे दिन देखने पड़ेंगे.' प्रभा की आँखों से आंसू बहने लगे. नीलम ने अपनी साड़ी के पल्लू से प्रभा के आंसू पोछे. दोनों चुप हो गए.
जैतहरी छोटी सी बस्ती है. यहाँ के रहवासी अंगूर की बेल की तरह एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. किसी भी घर में कुछ भी हुआ, यहां के लोगों में किसी के घर की कोई भी खबर हो, बहती हवा की तरह सबके पास पहुंच जाती है. प्रभा को लकवा लगने की खबर सबके कानों तक पहुंची, आपसी सम्बंधों के हिसाब से प्रायः सभी एक बार प्रभा को देखने गए, हाल-चाल पूछा, दवा-दारू पर चर्चा की और काम खत्म. उसके बाद मोहल्ले में आपस में चर्चा चलती, 'कैसी है रे तबियत प्रभा की?'
'वो तो बिस्तर पकड़ ली'
'अरे, उसको तो हल्का सा लकवा लगा था, अच्छा नहीं हुआ क्या?'
'साल भर से ऊपर हो गया है, सुना है, अभी भी हालत जस-की-तस है.'
'अरे राम...दवा ठीक से नहीं हुई क्या?.'
'नहीं जिज्जी, उसके बेटे और बहू उसका बहुत ध्यान रखते हैं, नियम से दवा देते हैं, मालिश करते हैं.'
'बेचारी नीलम के ऊपर बहुत भार आ गया.'
'हाँ, आ तो गया लेकिन नीलम गजब की है, उसके सारे काम खुशी-खुशी करती है.'
'आँय, टट्टी-पेशाब और नहाना-धोना भी वही करवाती है?'
'हां हां, सारा काम खुद अपनी देखरेख में करवाती है.'
'और खाना?'
'नीलम भोजन की थाली पकड़कर उसके बगल में बैठ जाती है, प्रभा का दायां हाथ काम कर रहा है, अपने हाथ से खा लेती है.'
'बड़ी भाग्यशाली है प्रभा जो ऐसी बहू मिली.'
'हां, ये तो है.'
'आपकी बहू भी तो बहुत सुंदर है.'
'बस, सुंदर भर है, बाकी किसी काम की नहीं है.'
'ऐसा मत बोलो जिज्जी, घर की बहू है तो घर का काम तो करती होगी.'
'करती होगी तो जब करेगी तब करेगी, अभी तो उसकी सास जिंदा है. वह तो खाना परोस दे, यही बहुत बड़ी बात है.'
'क्या कह रही हो जिज्जी?'
'घर की बात है, किसी से न कहियो, मेरे तो भाग्य फूट गए हैं. शहर की लड़की ब्याह के लाए, उसकी चमक-दमक और फैशन देख लो, बस.'
'अच्छा बताई आपने, हमको भी अपना लड़का ब्याहना है, हम तो अब शहर की तरफ देखेंगे ही नहीं.'
'मत कहो, पड़ोस वाली गुप्ताइन के यहाँ गाँव की लड़की आई है, उसके भी यही लक्षण हैं, काम की न काज की, नौ मन अनाज की.'
'मतलब लड़की शहर की हो या गाँव की, सबका हाल एक जैसा है!'
'हौ.'
'फिर हम कैसा करें जिज्जी, हमारी तो घिघ्घी बंध रही है.'
'भगवान के ऊपर छोड़ दो, भली करेंगे राम.'
'आपने तो डरा दिया, अब चलती हूं, माता रानी की जय.'
'जय हो माता रानी की.'
(अट्ठाईस)
ठाकुर साहब के चेहरे की रौनक दिनोंदिन बढ़ रही है. घर में पहले से ही पर्याप्त धन सम्पदा है, उन्होंने उसे घटने नहीं दिया बल्कि अपने जमाने में बढ़ाया. बाजार में उनकी पूंजी ब्याज में चढ़ी हुई है, उसका ब्याज आता है, दूकानें हैं उनका किराया आता है, ठेकेदारी में अच्छा मुनाफा होता है, कुल मिलाकर चौतरफा आवक बनी हुई है. कोई बुरी आदत पाली नहीं इसलिए खर्च सीमित रहता है, एक चाय पीने की लत है उनको, उसमें भला क्या लगना है? दोनों बहुएं उनका पूरा ध्यान रखती हैंं, समय से चाय-नास्ता, दोनों समय भोजन और रात को मलाई डालकर एक बड़े गिलास में दूध उनकी सेवा में रोज के रोज हाजिर हो जाता है. भोजन के मामले में तनिक नखरची हैं, बताने का मतलब यह है कि दोनों समय भोजन अलग किस्म का होना चाहिए. ऐसा नहीं हो सकता कि सुबह की बची सब्जी, दाल या रोटी रात को चल जाएगी. आम तौर पर वे दिन के समय रोटी, चावल, दाल, दो किस्म की सब्जी और कढ़ी या रायता या कच्चे आम का पना लेना पसंद करते हैं. रात के भोजन में पराठा, या पूरी और कोई भी एक रसेदार सब्जी, बस, इतना मिल जाए तो उनकी आत्मा प्रसन्न हो जाती है. गर्मी के दिनों में खरबूज और पके आम उन्हें अनिवार्य रूप से मिलना चाहिए क्योंकि इनकी मिठास में ठाकुर साहब के प्राण बसे हुए हैं.
ठाकुर साहब का छोटा लड़का प्रह्लाद कुछ दिनों से रात को देर से घर आ रहा है. वे जानना चाहते थे कि वह इतनी देर तक कहां रहता है, क्या करता है? उन्होंने अपने 'जासूस' लगाए तो मालूम पड़ा कि प्रह्लाद इन दिनों अपने कुछ दोस्तों के साथ जुए के फड़ में रहता है. ठाकुर साहब इस सूचना को पाकर चिंतित हो गए. जिसको भी जुए की लत लग जाती है, लग जाती है. फिर भी उन्होंने प्रह्लाद से इस बारे में बात करने का निर्णय लिया. एक रात वे अपने कमरे में न सोकर घर के मुख्य दरवाजे के पास अपनी बैठक में उसका इंतजार करते बैठे रहे. रात को लगभग डेढ़ बजे घंटी बजी, ठाकुर साहब ने दरवाजा खोला. पिता जी को देखकर प्रह्लाद चौंका, फिर संंयत होने का अभिनय किया और अन्दर घुसने लगा तब ही उन्होंने उसे रोका और सोफा पर बैठने का इशारा किया. वह चुपचाप बैठ गया. ठाकुर साहब ने पूछा, 'कहां थे इतनी रात तक?'
'दोस्तों के साथ था.' उसने कहा.
'क्या कर रहे थे उनके साथ?'
'गप-शप, और क्या?'
'हाथ में घड़ी पहने हो कि नहीं?'
'हाँ, पहने हुआ हूं, क्यों?'
'तो तुम्हें समय का ध्यान रहना चाहिए कि घर में रात को कितने बजे तक पहुंचना है.'
'आज ध्यान न रहा.'
'तुम्हें बहुत दिनों से समय का ध्यान नहीं रहता, इसीलिए आज मैं भी जाग रहा हूं कि तुम्हें बताऊं कि कितना बजा है.'
'अब, उनसे बातचीत करते थोड़ी सी देर हो गई तो इतने सवाल-जवाब क्यों?'
'सवाल ये है कि तुम इतनी रात तक क्या करते हो, मुझसे सच बोलो.'
'आपसे किसी ने मेरी शिकायत की क्या?'
'मुझे तुमसे शिकायत है कि तुम आजकल ताश खेलते हो.'
'हां, तो इसमें कौन सी बुरी बात है. आपने ताश नहीं खेली क्या?'
'हां, खेला है, तीन-दो-पांच या कोट-पीस खेला है लेकिन जुआ कभी नहीं खेला.'
'उस खेल में मजा आता था कि नहीं?
'आता था लेकिन..'
'लेकिन क्या? उसी मजे के लिए हम लोग रमी खेलते हैं.'
'पर रमी में हार-जीत होती है, रुपयों की.'
'हां, होती है लेकिन हमारे दांव पैसे के होते हैं, रुपयों के नहीं.'
'ये कब बढ़ते-बढ़ते रुपयों तक पहुंच जाएंगे, तुम्हें इसका इल्म नहीं है.'
'पिता जी, आप तो बात का बतंगड़ बना रहे है.'
'बतंगड़ नहीं, सच्चाई बता रहा हूंं. अपने जैतहरी के सेठों के लड़के बर्बाद हो गए, इसी जुए के चक्कर मेंं, तुम उनको अच्छी तरह से जानते हो.'
'जी, जानता हूं, पर....'
'कोई पर-वर नहीं, आज अपनी माँ के चित्र में हाथ रखकर कसम खाओ कि अब से ताश को हाथ नहीं लगाओगे.'
'बहुत कठिन है ये, मैं क्या करूं?' प्रह्लाद ने धीमे से कहा.
'आसान है, एक बार मन में संकल्प कर लो, बन जाएगा.' ठाकुर साहब ने उसका हौसला बढ़ाया. प्रह्लाद माँ के चित्र की ओर बढ़ा और छूकर कहा, 'आज से ताश को हाथ नहीं लगाऊंगा.' पिता ने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए, पुत्र उनकी बाहों में समा गया. दोनों की आँखों में आँसू थे.
(उन्तीस)
इस बीच सतना से सतीश सपत्नीक हरीश और उसके परिवार से मिलने के लिए घर आ गया. सात दिन कैसे बीते, मालूम ही नहीं चला. नेहा ने अपनी सास का किचन देखा तो उसने किचन को अप-टू-डेट कर दिया. किरण का किचन पुराने जमाने का था, नए सामानों की कमी थी, नेहा ने बाजार से नए बर्तन और रसोई की कुछ नई सुविधाएं लाकर रखी, किरण बोलती रह गई, 'ये सब क्यों कर रही हो नेहा, मुझे इन चीजों की जरूरत नहीं.' लेकिन नेहा उसकी बातों को अनसुना करके अपने मन का कर के मानी. किरण भी खुश, नेहा भी खुश.
पिछले अनेक वर्षों की बातें करनी बाकी थी, सब आपस में एक-दूसरे से बोलते-बतियाते रहे. शिकवे-शिकायतों पर भी चर्चा हुई और गलतफहमियां दूर हुई. घर में जैसे रौनक वापस आ गई. दयालदास और किरण को स्नेहा के रूप में खिलौना जैसा मिल गया, उन दोनों को ऐसा लगा जैसे उनकी उम्र बढ़ने की बजाय इन दिनों में कुछ कम हो गई.
हरीश के सामने एक बड़ा सवाल था कि कहां बसा जाए? जैतहरी छोटी जगह है, यहां बसने पर विचार करने का प्रश्न नहीं उठता, फिर कहां रहें? दिल्ली, मुम्बई, हैद्राबाद, बेंगलोर, चेन्नई आदि शहरों के नाम उसके दिमाग में थे लेकिन सबसे बड़ी बाधा दयालदास थी. वे जैतहरी छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे और हरीश के लिए जैतहरी में वर्तमान और भविष्य की कोई सम्भावना नहीं थी. हरीश ऐसी जगह की तलाश में था जहां उसे कोई अच्छी नौकरी मिल जाए या अमेरिका में कमाए धन को इंवेस्ट करके कोई व्यापार शुरू किया जाए. कुछ भी हो, हरीश अब अपने माता-पिता को छोड़कर नहीं जाना चाहता था, उनके लिए ही तो वह अमेरिका जैसा देश छोड़कर यहां आया था. उसके मन में आया, 'पहले शहर का चुनाव कर लिया जाए, उसके बाद मैं बाबा और अम्मा को समझा लूंगा.'
कानपुर जाने के लिए आठवें दिन का रेल रिजर्वेशन था. दो अटेचियों में सामान रखा और वे लोग रवाना हो गए. कानपुर में उन लोगों को लेने के लिए नेहा के माता-पिता स्टेशन आए, फूलों का गुलदस्ता लेकर आए थे. घर पहुंचे, साथ बैठकर खाना खाया और फिर बातचीत का दौर शुरू हुआ. 'अरे भाई, अमेरिका क्यों छोड़ दिया, दोनों की अच्छी भली नौकरी थी वहां?' नेहा के पापा ने पूछा.
'आप लोगों के साथ रहने का मन हो रहा था हम दोनों का. वहां काम था, नौकरी थी, पैसा था, बेहतर सुख-सुविधाएं थी लेकिन परिवार नहीं था, हम दोनों अपने पुराने परिवार की तलाश में भारत वापस आए हैं.' हरीश ने उत्तर दिया.
'यह बहुत अच्छी बात है लेकिन तुम लोगों को न जैतहरी में अब जमेगा, न कानपुर में.'
'हम लोग जहां रहेंगे, वहां आप लोग रहना.'
'इसका मतलब यह हुआ कि तुम लोग हमारी जन्मभूमि से हम लोगों को दूर करोगे?'
'आपकी जन्मभूमि कानपुर है या भारत है?'
'दोनों है लेकिन..'
'देखिए, मम्मी जी अपनी जन्मभूमि छोड़कर कानपुर आई थी कि नहीं? वैसा ही प्रयोग अब आपके साथ करना है हमें.'
'बुढ़ापे में ये दिन देखना बचा है क्या?'
'आपको और बुढ़ापा? आप मजाक कर रहे हैं पापा जी. अभी तो आप 70 साल के जवान हैं.' हरीश ने गुगली बाल फेंकी, निशाना सही था, पापा जी क्लीन-बोल्ड हो गए. सब लोग हंसने लगे.
एक दिन हरीश सुबह का अखबार देख रहा था, उसकी नजर एक विज्ञापन पर अटक गई. कानपुर के काकादेव इलाके में एक पुराना बंगला बिकाऊ था जिसका क्षेत्रफल 8000 वर्गफुट ने कुछ अधिक था. नास्ता करने के बाद वह और नेहा कार में उस बंगले को खोजने के लिए निकल गए. खोजते-खोजते एक बंगले के सामने उनकी कार रुकी. बाबा आदम के जमाने में बना हुआ लोहे का गेट, जिसे एक तरफ ही खोला सकता था, वह भी उठाकर क्योंकि खुलते समय वह जमीन से टकराता हुआ आगे-पीछे होता था. अगल-बगल में बनी हुई बाउंड्री वाल जगह-जगह से भसक रही है. पांच-छः ऊँचे पेड़ जो बिना किसी देखरेख
के बेशर्मों की तरह खड़े हुए थे. बंगले तक पहुंचने के पहले बहुत बड़ा मैदान है जिसमें कभी रंगीन फूलों का बाग रहा होगा, वहां चारों तरफ सूखी घास और इधर-उधर भटकटैया के पौधे झुके हुए से खड़े हुए हैं. सामने एक लाल रंग का पुराना बंगला जिसे देखने से पता चलता था कि पिछले कई वर्षों से उसकी रंगाई-पुताई नहीं हुई है. झिझकते हुए दोनों आगे बढ़े और बंगले के पास पहुंचे, पुराने जमाने की कालबेल की बटन को दबाया. अंदर से एक महिला स्वर उभरा, 'कौन है?'
'हम लोग हैं. दरवाजा खोलिए.' हरीश ने कहा. धीरे-धीरे दरवाजा खुला, 'हमने आज अखबार में विज्ञापन देखा कि आप इसे बेचना चाहते हैं, हम इसे देखने और आपसे बातचीत करने के लिए आए हैं.'
'आइए, अंदर आकर सोफे में बैठिए, थोड़ी देर रुकिए.' वृद्धा ने कहा.
कुछ देर में एक सज्जन प्रकट हुए, हाथ में छड़ी लिए हुए डगमगाते हुए आए और सोफे में आराम से बैठ गए. मैं मिस्टर वर्मा, रिटायर्ड डिस्ट्रिक्ट जज.' उन्होंने अपने बारे में बताया. हरीश और नेहा ने अपना परिचय दिया और आने का कारण बताया.
'देखो, मैंने इस जगह की कीमत रखी है चार करोड़, न एक रुपया कम, न एक रुपया ज्यादा. सौदा मेरे आपके बीच सीधा होगा, बीच में कोई दलाल नहीं होना चाहिए. पूरा पैसा एक नम्बर में लूंगा और रजिस्ट्री का खर्च आपको वहन करना होगा. चाहिए हो तो हाँ बोलो, अदरवाईज मेरा समय खराब मत करो.' वे बोले.
हरीश को उनकी बात का तरीका प्रभावित कर गया. इस प्रकार साफ-साफ बात करने वालों से डील करने में कोई लफड़ा नहीं होता. हरीश ने सोचा कि इनसे यह पूछ लिया जाए कि इस प्रापर्टी को वे क्यों बेच रहे हैं?
'आप नाराज न हों तो एक बात पूछूं? आप इसे क्यों बेच रहे हैं और इसे बेचकर आप कहां रहेंगे?'
'गुड क्वश्चन. हमारा एक बेटा और एक बेटी हैं, दोनों अमेरिका में जॉब करते हैं. वे दोनों भारत नहीं आना चाहते, हमें अमेरिका बुला रहे हैं, हम लोग वहां जाकर रहेंगे.'
'पर अमेरिका में आप लोगों के रुकने के लिए केवल छः महीने का वीसा मिलेगा, फिर आपको यहां वापस आना पड़ेगा.'
'हम लोग वहां कैसे रहेंगे, यह सिरदर्द उनका है. हम तो वहां जा रहे हैं. हो सकता है कि हम लोग उसी छः महीने में इस संसार से निकल लें.' मिस्टर वर्मा ने हंसते हुए कहा.
'नहीं, ऐसा क्यों कहते हैं? आप लोग सौ साल जिएं.'
'तो क्या विचार बना?' उन्होंने पूछा.
हरीश और नेहा ने अत्यंत धीरे से आपस में बात की और कहा, 'विचार तो बन रहा है. आपकी कीमत और शर्तें हमें मंजूर है. आप जमीन के पेपर्स की फोटोकापी दे दीजिए, आप जुडीश्यरी से जुड़े हुए रहे हैं इसलिए आप सब जानते हैं कि किसी प्रापर्टी को खरीदने के पहले उसकी जांच-पड़ताल जरूरी है.'
'हां, क्यों नहीं लेकिन मुझे यह कैसे तसल्ली होगी कि आप इसे खरीदने का निश्चय कर चुके हैं?'
'मैं आपको दस लाख का चेक दे देता हूं. इसे आप रखिए, मैं प्रापर्टी की जांच के बाद जब आपको बताऊंगा तब आप इसे बैंक में जमा कर दीजिएगा, समझ लीजिए, यह एडवांस है.'
'कब बताएंगे?'
'यह तो मैं नहीं बता सकता क्योंकि मैंने सुना है कि यहां रेवेन्यू विभाग के लोग काम लटकाने के विशेषज्ञ हैं. फिर भी एक महीना लग सकता है. इस बीच मैं आपके सम्पर्क में रहूंगा, आप अपना मोबाइल नम्बर दे दीजिए.'
'रजिस्ट्री कब करेंगे?'
'तुरंत करवा सकता हूं, रकम तैयार है.' हरीश ने चेकबुक निकालते हुए कहा. चेक भरा और मिस्टर वर्मा के हाथों में देकर अपने दोनों हाथ आभार व्यक्त करने के लिए जोड़ दिए.
'ओके, लेकिन मेरी एक शर्त और है, आप दोनों को मिसेज वर्मा के हाथ से बनी चाय पीनी पड़ेगी.'
'यह हमारा सौभाग्य होगा.' नेहा ने कहा.
हरीश ने रिश्वत देकर प्रापर्टी के विवरण एक सप्ताह में हासिल कर लिए. मालिकाना हक मिस्टर वर्मा का था, उसमें कोई बाधा समझ में नहीं आई. हरीश ने मिस्टर वर्मा को फोन करके बताया और बैंक में चेक प्रस्तुत करने के लिए कहा. मिस्टर वर्मा की सहमति से रजिस्ट्री के पेपर्स तैयार किए गए, अगले सप्ताह रजिस्ट्री हो गई. मिस्टर वर्मा ने बंगला खाली करने के लिए पंद्रह दिन का समय चाहा, हरीश ने कहा, 'सर, पंद्रह दिन नहीं, आपके लिए एक माह का है.'
इस प्रकार हरीश और नेहा के कानपुर में बसने की भूमिका बन गई. नेहा के माता-पिता इस खबर से बेहद प्रसन्न हुए कि अब उन्हें अपना शहर छोड़कर अन्यत्र नहीं जाना होगा.
बस, घर खबर करना बाकी है, हरीश ने इस समाचार को जैतहरी पहुंच कर बताने का निर्णय लिया.
'इतना बड़ा प्लॉट लिए हो, क्या करोगे? घर तो 3000 वर्गफुट में अच्छा-भला बन जाता है.' नेहा के पापा ने प्रश्न किया.
'हमारे दिमाग में वहां पर सामने एक डिपार्ट्मेंटल स्टोर खोलने की और पीछे घर बनाने की योजना है.' हरीश ने बताया.
'चार करोड़ से ऊपर जमीन खरीदने में लग गया, करीब इतना ही स्टोर और घर बनवाने में लगेगा, इतना इंतजाम है तुम्हारे पास?'
'कुछ है, जो कम पड़ेगा उसकी व्यवस्था हो जाएगी.'
'क्या बैंक से कर्ज लोगे?'
'नहीं, आपके रहते हुए हमें बैंक जाने की जरूरत क्या है?'
'अरे वाह, हमारे पैसे पर तुम्हारी नजर है?'
'अपने हाथों से दे देंगे तो हम लोग जीवन भर आपके कृतज्ञ रहेंगे.'
'सही कह रहे हो, हमारे जाने के बाद तुम लोगों का ही हो जाएगा.'
'नहीं, ऐसा क्यों कहते हैं पापा जी, आप दोनों सौ-सौ साल जिएं. आपने बैंक से कर्ज लेने की बात कही है, हम बैंक से न लेकर आपसे लेंगे. आपसे लेने में हमें दो फायदे होंगे.'
'क्या?'
'एक तो बैंक वालों के नखरे नहीं सहने पड़ेंगे, ये पेपर लाओ, वो पेपर लाओ, जमानतदार लाओ और दूसरा हमें ब्याज नहीं देना पड़ेगा.'
'वाह-वाह, बहुत दूर की सोच रखते हो आप हरीश जी. ठीक है, मेरे पास जो कुछ है उसमें से 75% दे दूंगा.'
'ये हुई न कोई बात.' हरीश ने कहा.
कानपुर से वापस जैतहरी चलते हैं. दयालदास खुश था कि उसके बेटे-बहू यहाँ वापस आ गए. उसे चिंंता हो रही है कि इन लोगों को कानपुर गए बहुत दिन हो गए, वहां क्या करने लगे? अचानक फोन की घंटी बजी, उस तरफ हरीश था, 'बाबा, हम लोग ट्रेन में बैठ गए हैं, कल दिन में जैतहरी पहुंच जाएंगे.'
'ठीक है.' दयालदास ने कहा.
अगले दिन हरीश, नेहा और स्नेहा जैतहरी आ गए. चर्चा शुरू हुई. 'बाबा, हम लोगों ने कानपुर में बसने का मन बनाया है.' हरीश ने बताया.
'अरे, कानपुर में?' दयालदास का मन विचलित हो गया कि उसके दोनों लड़के अपनी ससुराल में रहेंगे.
'जी हाँ, वहाँ एक पुराना बंगला खरीद लिया, खूब बड़ी जगह है. उसमें घर बना लेंगे और एक बड़ी दूकान भी. मेरा अनुमान है कि एक साल में दोनों बन कर तैयार हो जाएंगे, उसके बाद आप दोनों वहीं चलकर रहना, साथ हो जाएगा और आप वहाँ रहेंगे तो दूकान की देखरेख ठीक से हो जाएगी.'
'मैं जैतहरी छोड़कर नहीं जाने वाला. यहीं पैदा हुआ, यहीं मरना चाहता हूं.'
'बाबा, कहां जन्म लेना और कहां मरना, यह किसी के हाथ में नहीं होता. कौन जानता है कि कहां की मिट्टी उसके भाग्य में लिखी हुई है? आपका इस जगह से प्रेम समझ में आता है लेकिन अब इस उम्र में आपको अपनी सोच में लोच लाना होगा. हम आपको इस हालत में छोड़कर कहीं और नहीं रह सकते. आप लोगों के साथ रहने की लालसा लेकर हम लोग अमेरिका छोड़कर यहां आए हैं. जैतहरी में हमारे रहने लायक माहौल नहीं है, हमें कहीं बाहर बसना है. बहुत सोच-विचार के बाद हमने कानपुर में बसने का निर्णय लिया है. बहुत बड़ा शहर है कानपुर और जिस जगह में मैंने प्लॉट लिया है वह समझ लो, भाग्य से मिला है. उस जगह की कमर्शियल वेल्यू बहुत अधिक है, हमें सस्ते में मिल गया. वहाँ एक डिपार्टमेंटल स्टोर खोलेंगे जिसमें यही सब सामान रहेगा जो आपकी दूकान में रहता है लेकिन उसका स्वरूप आधुनिक होगा. आपको वहां बैठकर शानदार अनुभूति होगी.'
'तुम्हारी बात ठीक लग रही है लेकिन तुम्हारी माँ से चर्चा के बाद अंतिम फैसला होगा.' दयालदास ने कहा.
'सही है.' हरीश ने कहा. 'अभी तो साल भर आपको यहीं रहना है.'
(तीस)
प्रभा की तबीयत न संभली. जीवन उसको विष पीने जैसा लगने लगा. सक्रिय मनुष्य के ऊपर जब ऐसी मुसीबत आती है दो-चार दिन तो आराम से निकल जाते हैं लेकिन साल पर साल बीत जाएं तो कोफ्त होने लगती है. उसकी बहू नीलम का खिला हुआ चेहरा अब बुझा हुआ सा दिखाई पड़ने लगा है, कमर में दर्द कम होने का नाम नहीं ले रहा है. बेचारी सुबह से लेकर रात तक लगातार लगी रहती है. कितना करेगी आखिर? अगर मुझे अच्छा नहीं होना है तो माता रानी इस दुनिया से उठा क्यों नहीं लेती? मौत भी ऐसी होती है जो मांगने से नहीं आती.
'मन में क्या विचार चल रहा है अम्मा जी?' नीलम चाय लेकर सामने खड़ी थी.
'यही कि इस बिस्तर पर पड़े-पड़े जी उबिया गया है. दवा खा-खा के तंग आ गई हूं. मेरे अच्छे होने की उम्मीद मुझे अब नहीं दिखाई पड़ती. भगवती उठा ले मुझे.' प्रभा ने उत्तर दिया.
'राम राम, सुबह के समय ऐसे अशुभ बोल मुंह से नहीं निकालते अम्मा जी.'
'तो क्या करूं? मेरी तकलीफ तो मैं सह रही हूं, मुझसे तेरी तकलीफ देखी नहीं जाती.'
'मुझे कौन सी तकलीफ है? मजे में हूं मैं. अपनी छोटी से गृहस्थी है, थोड़ा सा काम रहता है, हो जाता है.'
'और मेरी सेवा?'
'यह मेरा सौभाग्य है कि साक्षात भगवती मेरे घर में हैं, मैं रोज उनके दर्शन करती हूं और उनकी थोड़ी बहुत सेवा कर देती हूं. आपके पास जब मैं होती हूं, सच में, मुझे आनंद मिलता है.' नीलम ने प्रसन्न होकर कहा.
'जरा सामने से कस्तूरी मौसी को बुला दे, कहना मैंने याद किया है.' प्रभा ने नीलम से कहा.
'कैसे याद किया तुमने प्रभा?' सामने कस्तूरी खड़ी थी.
'आओ जिज्जी, मेरे पास बैठो. ये जो मेरी बहू नीलम है, यह मेरी स्वर्गवासी माँ का पुनर्जन्म है. बताओ, हर समय मेरी सेवा करने के लिए लगी रहती है और बोलती है, 'मेरा सौभाग्य है कि साक्षात भगवती मेरे घर में हैं, मैं रोज दर्शन करती हूं.'
'सही बोलती है.'
'ये लो, आप भी उसी की तरफ हो गई.'
'क्यों नहीं? नीलम की पूरी गाँव में चर्चा हो रही है. मातारानी ऐसी बहू सबके घर में भेज दे.'
'वो तो ठीक है लेकिन ये बताओ कि मैं उसका कर्ज कैसे चुकाऊंगी?'
'कौन किसका कर्ज चुका रहा है, क्या पता?'
'मेरा एक काम करोगी जिज्जी, मेरे मरने के बाद आप नीलम का ख्याल रखोगी?
'अपने जीते-जी जरूर रखूंगी, मेरा वचन है.' कस्तूरी ने अपने दोनों हाथों से प्रभा के दोनों हाथ पकड़ कर कहा. इतने में प्रभा की आँखे घूमने लगी, उसकी साँस अजीब ढंग से चलने लगी. शरीर अकड़ने लगा. कस्तूरी चिल्लाई, 'नीलम, नीलम, जल्दी आओ, कैसा कर रही है तुम्हारी अम्मा.' नीलम भागती हुई आई, प्रभा के सिर को छुआ, ठंडा था. उसने अपने दोनों हाथों से प्रभा की छाती दबाना शुरू किया और कस्तूरी से बोली, 'मौसी किसी को भेजकर डाक्टर को बुलाओ.'
कुछ देर में प्रभा की आँखें पथरा गई और उसका शरीर पूरी तरह से शांत हो गया, मातारानी ने आज उनकी प्रार्थना सुन ली.
(इक्तीस)
ठाकुर साहब घर में अपनी कुर्सी पर बैठकर सुबह का अखबार पढ़ रहे हैं. उनकी नजर एक समाचार पर पड़ी जिसका शीर्षक था, 'जैतहरी में लगेगा पावर प्लांट'. आराम की मुद्रा में बैठे ठाकुर साहब सावधान की मुद्रा में आ गए. समाचार था, जैतहरी-अनुपपुर मार्ग में एक पावर प्लांट मोजर बीयर कम्पनी द्वारा लगाया जाएगा. जैतहरी से तीन किलोमीटर दूरी पर जगह का चयन कर लिया गया है. इस प्लांट के लिए 2200 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया जाएगा जिसकी जद में मुर्रा, टकौली और अमगवां गाँव आएंगे. इस प्रोजेक्ट के लगने की सूचना से जैतहरी और अनुपपुर के लोगों में हर्ष व्याप्त है.
ठाकुर साहब ने अपने दोनों बेटों को आवाज देकर बुलाया, प्रह्लाद आया, 'क्या बात है पिता जी?'
'यह समाचार पढ़ो, ध्यान से पढ़ो.'
पढ़कर प्रह्लाद ने कहा, 'मुझे तो यह खबर दो-तीन महीने पहले लग गई थी.'
'तुमने मुझे बताया नहींं?' ठाकुर साहब ने डांटते हुए पूछा.
'पक्की खबर नहीं थी, बहुत सी अफवाहें उड़ती रहती हैं इसलिए नहीं बताया. आज अखबार में छप गया इसका मतलब यह है कि वह खबर सही थी लेकिन इस प्रोजेक्ट में बहुत सी बाधाएं आएंगी. कब दादा मरेंगे, कब बरा-भात खाएंगे!'
'क्या मतलब, तुम्हें ऐसी भी कुछ खबर है?'
'हां, कुछ सरकारी जमीन है, उसका अधिग्रहण ले-दे कर हो जाएगा लेकिन अधिकतर जमीन आदिवासियों की है. आदिवासियों की जमीन खरीदने में कई कानूनी अड़चनें आएंगी. यह काम आसान नहीं है, बहुत कठिन है.'
'फिर कैसा होगा?'
'होगा वही जो मंजूर-ए-कलेक्टर होगा.'
'क्या मतलब?'
'कलेक्टर जिले का मालिक होता है. उसी की मंजूरी से आदिवासियों की जमीनें खरीदी जा सकती हैं. अच्छी बात यह है कि अभी जो कलेक्टर हैं, वह ईमानदार हैं और क्षेत्र में विकास की चाहत रखते हैं लेकिन उनके अधीनस्थ अधिकारी एक नम्बर के बेईमान और कामचोर हैं. देखने की बात यह होगी कि किसकी चलती है, कलेक्टर की या एस.डी.एम., तहसीलदार और पटवारी की?'
'क्या इन छुटभैयों में इतनी ताकत है कि अपने बड़े साहब की बात न सुनें?'
'उनकी बात सुनेंगे लेकिन किसी काम में अड़ंगा लगाने में ये लोग उस्ताद हैं. जब तक मोजर बीयर से पेट भरकर रकम वसूल नहीं कर लेंगे तब तक फाइलें आगे नहीं बढ़ेगी, यह तय है.'
'मोजर बीयर वाले कोई भोले-भाले हैं क्या जो इन बातों को नहीं समझते. वे बिजनेसमैन हैं, सबके मुंह में पैसा ठूंस देंगे.'
'हां, यह बात आपने ठीक कही. आप यह बताइए कि इस प्रोजेक्ट से हमें क्या फायदा होने वाला है?'
'सबसे पहले जमीन अधिग्रहण होगा, उसके बाद उस जमीन को बाउंड्रीवाल से घेरा जाएगा. वाल बनाने का ठेका हमारे हाथ लग सकता है.'
'जी, सही बताया आपने, मैं कम्पनी वालों से जान-पहचान बनाने का प्रयास करता हूं.' प्रह्लाद ने कहा.
प्रह्लाद का अनुमान सही था. सन 2011 में इस प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई, जमीन के अधिग्रहण में दो साल लग गए. सरकारी अड़चनों के अलावा स्थानीय स्तर पर विरोध, झगड़ा और मार-पीट तक की नौबत आई. कम्पनी के द्वारा ग्रामीणों के साथ हुई बैठक में भरोसा दिलाया गया कि कम्पनी के कामकाज में स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी तब जाकर समझौता हुआ. यह बात दूसरी है कि काम निकल जाने के बाद कम्पनी वाले वहां के लोगों को दिए गए वायदे से मुकर गए और किसी को रोजगार नहीं दिया.
जयतहरी वालों को इस प्रोजेक्ट से एक लाभ यह मिला कि इससे जुड़े पांच हजार मजदूरों की रोजाना उपयोग में आने वाली चीजों की मांग की पूर्ति करने का सुनहरा अवसर मिला जिससे अनाज, किराना तथा सामान्य वस्तुओं की दूकानों की बिक्री में अभूतपूर्व वृद्धि हुई. हाँ, काफी दबाव और प्रयास के बाद प्रह्लाद को बाउंड्रीवाल के 30% हिस्से को बनाने का ठेका मिल गया.
ठाकुर साहब के लड़कों को पावर प्लांट का काम नहीं पुसाया. वे लोग सरकारी ठेके लिया करते थे जहां एक का चार होता था, यहां एक का डेढ़ करना मुश्किल था क्योंकि दूसरे राज्य के ठेकेदार कम कीमत में बढ़िया काम कर रहे थे. उन्होंने एक चौथाई काम करने के बाद अपना हाथ वापस खींच लिया और अपना ध्यान सरकारी निर्माण कार्यों की ओर केंद्रित कर लिया.
ठाकुर साहब लड़कों के इस निर्णय से खुश नहीं थे. उनका मानना था कि ऐसा करने से नाम ब्लैकलिस्ट हो जाएगा और आगे कोई काम नहीं मिलेगा. पैसा कमाना ही सब कुछ नहीं है, नाम कमाना बड़ी बात है लेकिन दोनों लड़कों ने अपने हाथ खड़े कर दिए तो ठाकुर साहब का आदर्शवाद धरा रह गया. बहुत दिनों तक उन्होंने अपने बेटों से बात नहीं की लेकिन कितने दिनों तक बिनबोले रहा जा सकता है?
दिन के 11 बज गए हैं, प्रह्लाद कहीं बाहर जाने के लिए तैयार होकर निकल रहे हैं. अचानक आवाज गूँजी, 'प्रह्लाद.'
'जी पिता जी.' प्रह्लाद ने जवाब दिया. बहुत दिनों से पिता जी की आवाज नहीं सुनी थी इसलिए आज उनकी आवाज सुनकर उसे अच्छा लगा.
'क्या हो रहा है आजकल?'
'कुछ नहीं, क्या होना है जो होगा?'
'क्या टाइमपास चल रहा है?'
'टाइम अच्छा नहीं चल रहा है.'
'उसको अच्छा करो.'
'अपने हाथ में है क्या?'
'तुम्हारे पास दो हाथ हैं, चारों तरफ काम है, उसे देखने-समझने और पकड़ने की कोशिश करो, टाइम ठीक हो जाएगा.'
'आप बताइए, हमें नजर नहीं आ रहा है.'
'मैं घर में रहता हूं, तुम लोग बाहर रहते हो, तुम्हारे पास अधिक जानकारी होनी चाहिए.'
'आपकी बात ठीक है लेकिन कहीं कोई चर्चा हो तो सूचना हाथ लगे,'
'ठीक है, जब कुछ समझ में आए तो बताना.' ठाकुर साहब ने बात पूरी की.
उस रात ठाकुर साहब सामान्य थे, दूध पीकर सोये और सोते रह गए. अगली सुबह पूरे जैतहरी में ठाकुर साहब के निधन की खबर आग की तरह फैल गई. उनके अंतिम संस्कार में गाँव के हर घर का एक आदमी मौजूद था.
(बत्तीस)
जैतहरी में पहले वणिक अधिक थे, धीरे-धीरे सिंधी परिवारों की संंख्या बढ़ गई और यहाँ के व्यापार में सिंधियों का वर्चस्व स्थापित हो गया. इनके पूर्वज पाकिस्तान से आए और यहां बस गए. इनकी व्यापारिक बुद्धि लाजवाब है. अपने अथक परिश्रम और लगन की वजह से इनकी दिनोंदिन तरक्की होती गई और आज उनकी तीसरी पीढ़ी यहां के व्यापार जगत में राज कर रही है. आज ये लोग जिस काम में हाथ डालते हैं, धन बरसने लगता है. आम तौर पर इस कौम का पढ़ाई-लिखाई से बहुत अधिक वास्ता नहीं रहता, बच्चों को शुरुआत में ही व्यापार के बीज डाल दिए जाते हैं, परिणामस्वरूप वह युवा होते-होते एक परिपक्व व्यापारी के रूप में व्यापार के मैदान में आ जाता है. दयालदास का खुद का रुझान बचपन से पढ़ाई पर था, वह न पढ़ पाया तो उसने अपने छोटे लड़के को पढ़ने के लिए अमेरिका तक भेजा. उसके रिश्तेदार और गाँव के लोग उस पर ताना कसा करते थे, 'दयालदास अपने लड़के को कलेक्टर बनाएगा.' वह कलेक्टर तो नहीं बना लेकिन उसने अमेरिका में रहकर बहुत अच्छी कमाई की और अब भारत आ गया है, अपने माता-पिता के पास.
दयालदास का जैतहरी छोड़कर कानपुर जाने का मन नहीं है लेकिन हरीश की बात में दम है. खैर अभी तो साल-डेढ़ साल लगेगा, तब तक क्या हो जाता है, केवल ऊपर वाला जानता है. देखा जाएगा. अभी स्नेहा गोद में खेल रही है, दयालदास को और कुछ नहीं चाहिए. किचन बहू ने सम्भाल लिया है, रोज नयी-नयी डिश खाने को मिल रही है. नेहा बहुत मिलनसार है, सबसे अच्छे से बात करती है और अपनत्व रखती है. घर का काम निपटा कर वह बाबा के पास आकर बैठ जाती है और अपने बचपन की बातें, स्कूल और कालेज के किस्से, अमेरिका के संस्मरण सुनाते रहती है. हरीश का समय उसके पुराने सहपाठियों से चर्चा में बीत जाता है. जिसके पास जाता है, उसे इतना खिला-पिला देते हैं कि घर में खाने के नाम से उसे परेशानी हो जाती है, थोड़ा-बहुत खा लेता है. एक महीना कैसे बीता, मालूम नहीं पड़ा. अब हरीश के कानपुर जाने का समय आ गया क्योंकि उसने मिस्टर वर्मा को बंगला सौंपने के लिए एक माह का समय दिया था. बंगला मिल जाने के बाद उसे तोड़वाना, नक्शा तैयार करवाना और उसके बाद निर्माण कार्य शुरू करना.
हरीश, नेहा और स्नेहा कानपुर चले गए तो दीनदयाल का घर फिर से सूना हो गया लेकिन यहां आना-जाना तो लगा रहेगा.
कानपुर पहुंच कर हरीश ने मिस्टर वर्मा को फोन किया. 'मैंंने दो दिन पहले खाली कर दिया है, अभी हम लोग एक होटल में रुके हुए हैं.' उधर से आवाज आई.
'घर का इतना सारा सामान लेकर आप होटल में हैं?' हरीश ने जिज्ञासा व्यक्त की.
'घर का सारा सामान हमने घर में ही छोड़ दिया है, आप चाहें तो उसका उपयोग कर सकते हैं. हम लोग अपने कुछ कपड़े और रोज के उपयोग की कुछ वस्तुएं अपने साथ ले आए हैं.'
'वह सामान हमारे काम का होगा नहीं.'
'किसी को दे दीजिएगा.'
'लेकिन मुझे यह समझ में नहीं आ रहा है कि आप लोग होटल में क्यों रुके हुए हैं, आप तो अमेरिका जाने वाले थे?'
'हमारा बेटा अगले सप्ताह हमें लेने के लिए भारत आएगा, तब हम उसके साथ जाएंगे.'
'ठीक है, बहुत धन्यवाद अंकल आपको. आपकी यात्रा शुभ हो.'
'थैंक यू माई डीयर.आप होटल पेराडाइज में आकर वहाँ की चाबी ले जाएं.' मिस्टर वर्मा की आवाज आई और फोन कट गया.
अगली सुबह चाबी लेकर हरीश और नेहा 'अपने' बंगले में पहुंचे, ताला खोला और अंदर गए. देखा-ताका और अपना नया ताला लगाकर वापस आ गए. पुराना सामान खरीदने वाले का पता लगाया, साथ ही इमारत को तोड़ने वाले की जानकारी ली और एक महीने में उस जमीन पर लगे बड़े पेड़ों को छोड़कर वहां पूरा मैदान हो गया.
हरीश, नेहा और स्नेहा फिर जैतहरी वापस आ गए.
एक दिन रात के भोजन के बाद सब बैठे थे, एक चर्चा निकली.
'तुम लोग हमसे कह रहे हो कि हम लोगों को कानपुर में जाकर रहना है, इस घर का क्या होगा?' दयालदास ने प्रश्न किया.
'बेच देंगे, और क्या?' हरीश ने कहा.
'बेच देंगे?'
'हाँ, और क्या करेंगे? जब यहां रहना नहीं है तो खाली रखने का क्या मतलब?'
'बाप-दादा की खरीदी जगह को बेच दोगे?'
'आप बताइये, और क्या किया जा सकता है?'
'मेरे ख्याल से इसे ऐसे ही रहने दो. तुम्हारे पास पैसे की कमी तो है नहीं जो इसे बेचना चाहते हो.'
'कानपुर में इतना बड़ा प्रोजेक्ट खड़ा करना है, हमारे पास जो है, लग जाएगा लेकिन मुझे लगता है कि और पैसे की जरूरत पड़ेगी. जब घर या दूकान का निर्माण होता है तो हमेशा बजट से अधिक खर्च हो जाता है. 'एक बार बनना है, चलो, यह भी करवा लेते हैं, वह भी हो जाए तो अच्छा रहेगा', ऐसा होता है. हमारे पास जो है, उसमें अगर हो गया तो कोई बात नहीं, अन्यथा इसे बेचने का निर्णय लेना पड़ेगा.' हरीश ने समझाया.
'तब की तब देखी जाएगी.' दयालदास ने कहा. 'कोशिश करो कि यह घर कायम रहे.'
पंद्रह दिन कैसे बीते, मालूम नहीं पड़ा. दयालदास और किरण के चेहरे में व्याप्त तनाव कम होने लगा, अब वे हर समय खुश रहते हैं. यह उम्र ऐसी होती है जब कांपते हाथों को किसी के साथ की बहुत जरूरत होती है. यह उनकी कल्पना के बाहर था कि हरीश उनके बुढ़ापे का सहारा बनेगा. हरीश का यहां आना उनके लिए संसार के आठवें आश्चर्य की तरह था. हरीश के व्यवहार में आया परिवर्तन उनके लिए अविश्वसनीय है. खास तौर से नेहा का व्यवहार बेहद शालीन और प्यारा है. इतनी पढ़ी-लिखी और अमेरिका में पढ़ी तथा नौकरी की हुई लड़की में भारतीय संस्कार की जो छाप दिखाई देती है, वह खास तौर से ध्यान देने योग्य है.
कानपुर के डिपार्ट्मेंटल स्टोर और घर का नक्शा तैयार हो गया. नगरनिगम में नक्शा पास करने के लिए दिया गया. नक्शा नियमानुसार बना था लेकिन पास नहीं हो रहा था. पता करने पर मालूम हुआ कि नक्शा चीफ इंजीनियर की टेबल में रखा हुआ है, बिना पत्रम-पुष्पम चढ़ाए काम नहीं होगा. हरीश चीफ इंजीनियर के पास पहुंच गया. 'सर, मेरा नक्शा पास कर दीजिए, काम रुका हुआ है.' हरीश ने कहा.
'ऐसे ही पास करवाना चाहते हैं या कुछ देंगे भी?' साहब ने मुस्कुराते हुए कहा.
'कितना चाहिए?'
'पांच लाख.' साहब ने उंगलियों के इशारे से समझाया.'
'ये बहुत ज्यादा है.'
'ज्यादा है? आपको कम बता रहा हूं, वर्ना दस से कम में नहीं होता.'
'आपकी बात ठीक हो सकती है, मैं विरोध नहीं करता लेकिन मैं आपको दो लाख दे सकता हूं.'
'बहुत कम है.'
'तो ढाई ले लीजिए.'
'चलो, तीन में नक्की करते हैं.'
'ठीक है, कल लाकर दे जाऊंगा. उसके बाद मुझे कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए.'
'आप बेफिक्र रहो.'
अगले दिन तीन लाख साहब के टेबल में पहुंच गया, शाम तक साहब के दस्तखत हो गए. नक्शा पास हो गया. उसके बाद निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया.
पुरानी कहावत है, 'ब्याह कर के देख, मकान बना के देख'. हरीश और नेहा ने ब्याह कर के देख लिया, अब मकान बनाने का काम हाथ में लिया. जब किसी बने-बनाए मकान की भव्यता को हम देखते हैं तो इस बात की कल्पना नहीं होती कि उसे बनाने में कितना श्रम, कितना धन और कितना समय लगा होगा. हरीश ने निर्माण कार्य को करने के लिए बमुश्किल एक ठेकेदार खोजा, उससे स्क्वेयर फुट के भाव से बात तय हुई. उसने आश्वासन दिया कि एक साल में काम पूरा हो जाएगा. सबसे पहले मकान का काम शुरू किया गया. जब वहाँ के प्लिंथ कालम की ढलाई हो गई तब शो-रूम में काम शुरू हुआ. निर्माण कार्य में एक खासियत होती है कि वह धीरे-धीरे आगे बढ़ता है जबकि हमारा दिमाग उसके मुकाबले तेज होता है. फिर, बीच-बीच में त्यौहार आ जाते हैं तो मजदूर छुट्टी कर देते हैं, काम रुक जाता है. राज मिस्त्री के साथ इलेक्ट्रीशियन, प्लम्बर और बढ़ई का काम साथ-साथ चलता है, कोई एक यदि गैरहाजिर हुआ तो काम अटक जाता है. हरीश को निर्माण कार्य का कोई अनुभव नहीं था इसलिए शुरुआत में कुछ समझ में नहीं आ रहा था लेकिन महीने-दो महीने में बहुत कुछ समझ में आने लग गया. सरिया और सीमेंट की क्वालिटी चेक होने लगी, ठेकेदार को भुगतान हाथ खींच कर होने लगा. भवन तैयार होने के बाद टाइल्स, सीलिंग फिटिंग, इलेक्ट्रिक फिटिंग, पेंटिंग, दरवाजे और खिड़कियों की फिटिंग, बाथरूम के काम, फर्नीचर और इंटीरियर डेकोरेशन के काम करवाते-करवाते हरीश का वजन चार-पांच किलो कम हो गया. रात को सोने के पहले अगले दिन के काम की योजना दिमाग में बनती और उसकी वज़ह से नींद में व्यवधान आ जाता. सुबह तैयार होने के बाद उन सबको फोन लगाना होता है जिनकी जरूरत उस दिन के काम के लिए होती है. कहावत में दम है, '....मकान बनवा के देख.'
हरीश और नेहा का बैंक बेलेंस जमीन खरीदने में लगभग आधा हो गया था, इधर मकान और शो-रूम का काम एक साथ शुरू हो गया तो उनका बचा हुआ पैसा फुर्र से उड़ गया.
निर्माण के दौरान हरीश ने जरूरत पड़ने पर बैंक से ऋण ले लिया, न श्वसुर से आर्थिक मदद लेनी पड़ी, न जैतहरी का घर बेचना पड़ा. इस बीच व्यस्तता के कारण हरीश को अधिकतर कानपुर में रहना पड़ा, जैतहरी जाना कम हुआ, नेहा और स्नेहा इस बीच में कई बार हो आए. जब काम अंतिम चरण में था तब तीन दिनों के लिए हरीश जैतहरी गया.
'तू दुबला हो गया रे.' किरण ने उसे टोका.
'सिर्फ दुबला नहीं हुआ, मेरा खून भी सूख गया है.' हरीश ने उत्तर दिया.
'अरे, ऐसा क्यों?'
'कंस्ट्रक्शन का काम इतना कठिन और कष्टदायक है कि जो भुगतता है, वही जानता है.'
'ऐसा क्या?'
'हाँ जी, किसी प्रकार अब पूरा होने को है, अब आप लोगों को वहाँ जाना है, वहीं रहना है.'
'हम लोग गृहप्रवेश के कार्यक्रम में जरूर जाएंगे लेकिन वहां रहने की बात नहीं जम रही है.'
'ये लो, इतना अच्छा घर बनवाया आप लोगों के लिए, और आपको वहां रहना जम नहीं रहा है.'
'तुम्हारी बात ठीक है लेकिन हमें जैतहरी में ही रहने दो. अपनी मिट्टी को छोड़ कर जाने का मन नहीं हो रहा है. जीना यहाँ, मरना यहाँ'. दयालदास बीच में कूदे.
'मैं जीने मरने की बात नहीं कर रहा हूं, वहां रहने की बात कर रहा हूं.'
'पूरी जिंदगी यहाँ बीती है, इस जगह से मुझे बहुत प्यार है. यहां जैसा माहौल कानपुर जैसे शहर में कहां मिलेगा?'
'मैं जब सेनफ्रासिस्को गया था तब मेरे मन में भी इस तरह का संंशय था लेकिन कुछ दिनों में दूर हो गया. हम जहां भी रहते हैं, धीरे-धीरे उस जगह से लगाव होने लगता है, जान-पहचान हो जाती है, मौसम से भी दोस्ती हो जाती है.'
'पर...'
'अब कुछ और नहीं सुनूंगा, आप दोनों को मेरे साथ चलना होगा और वहीं रहना होगा. देखिए, आप दोनों के साथ रहने के लिए मैं अमेरिका छोड़कर यहां आया, आप मेरे दिल की बात को समझने की कोशिश कीजिए. अपना ये घर नहीं बेचा, सिर्फ इसलिए कि जब आपका मन हो, यहां आकर रहें, और क्या चाहिए?'
'किरण, क्या कहती हो तुम? हरीश ने जिद ठान ली है.' दीनदयाल ने अपनी पत्नी से पूछा.
'ठीक है, चलते हैं. कुछ समय के लिए चलते हैं, अगर वहां हमारा दिल नहीं लगा तो अपने इस घर में वापस आने का विकल्प खुला हुआ है न?' किरण ने हरीश से पूछा.
'बिल्कुल, वहां अच्छा नहीं लगा तो वापस आ जाना, हम आपको नहीं रोकेंगे.' हरीश ने कहा.
डेढ़ साल में काम पूरा हो गया और सबसे पहले गृह प्रवेश हुआ जिसमें दोनों परिवार सम्मिलित हुए. दीनदयाल घर की व्यापकता और साज-सज्जा को देखकर विस्मित हो रहा था, किरण भी. एक छोटे से ग्रामीण घर से विस्थापित होकर शहर के आधुनिक वातावरण में रहने का अवसर उन दोनोंं के लिए स्वर्गिक सुख जैसा था.
(तैंतीस)
ठाकुर साहब ऊपर से टनाटन हैं लेकिन अंदर से कमजोर होते जा रहे हैं. एक तो अपनी पत्नी का जाना वे भूल नहीं पा रहे हैं जिसका विपरीत प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर पड़ रहा है और दूसरा बढ़ती हुई उम्र अपना असर दिखा रही है. घुटने और कमर के दर्द से वे बहुत परेशान रहते हैं. आयुर्वेदिक और देशी दवाओं के भरोसे चल-फिर रहे हैं लेकिन रात को सोते समय उन्हें असहनीय दर्द होता है, रह-रह कर कराह उठते हैं. उनकी कराह सुनने वाली तो कब की दुनिया छोड़कर चली गई इसलिए उनके दर्द को समझने वाला कोई नहीं है. घर में उनका रुआब है इसलिए उसे कायम रखने के लिए वे अपनी व्यक्तिगत तकलीफें किसी को बताते नहीं और चुपचाप खुद भुगतते रहते हैं. घी खाया हुआ पुराना शरीर है इस कारण सक्रियता बनी हुई है लेकिन अब साहस कम होते जा रहा है. उम्र के बढ़ने के साथ शरीर पर विपरीत असर पड़ता है, मन भी कमजोर होने लगता है. वैसे उनके पास सब है, धन-दौलत, जमीन-जायदाद, मान-सम्मान और बाल-बच्चे, कोई ख्वाहिश बची नहीं है लेकिन अभी और जीने की इच्छा बाकी है. उनकी बढ़ती उम्र उनकी इस इच्छा के विरोध में है. वे अस्सी पार कर चुके हैं, आखिर कब तक चलेंगे?
जैतहरी में एलोपैथी के डाक्टर हैं लेकिन आयुर्वेद का कोई नहीं है, वैसे, आयुर्वेदिक इलाज बताने वाले जानकार लोग बहुतायत में हैं. आज उनके एक पुराने सहपाठी घनश्याम उनसे मिलने घर पर आए हुए हैं.
'आओ घनश्याम, बैठो.' ठाकुर साहब ने स्वागत किया.
'बहुत दिनों से मुलाकात नहीं हुई थी, सोचा आज मिल लूं.' घनश्याम ने कहा.
'अच्छा हुआ, आ गए, मैं आजकल घर से कम निकलता हूं.'
'क्यों? इस उम्र में चलना-फिरना जरूरी होता है, शरीर चलायमान रहता है.'
'तुम्हारी बात ठीक है लेकिन अब घुटने साथ नहीं देते, कमर भी पिराती है.'
'सरसों तेल की मालिश किया करो, दर्द में आराम मिलेगा.'
'घुटने की मालिश अपने हाथों से कर लेता हूं लेकिन कमर में मालिश किससे करवाऊं. बेटे-बहुओं से बोलना अच्छा नहीं लगता.'
'एक आदमी रख लो, वह कर दिया करेगा.'
'लेकिन मालिश से कुछ सुधार नहीं समझ में आता. मेरा घुटना जस का तस है जबकि रोज मालिश करता हूं.'
'देखो, अब इस उम्र में कुछ-न-कुछ चलता रहेगा, इसी के साथ जीना पड़ेगा.'
'ये बात ठीक कहे, अच्छा यह बताओ, तुम्हारा क्या हाल है?'
'मेरा हाल न पूछने लायक है, न बताने लायक.'
'अरे, ऐसा क्या हो गया?'
'तुम्हारी भाभी के जाने के
बाद सड़क में पड़ा हुआ ढेला हो गया हूं. तीन लड़के हैं, कभी यहां तो कभी वहां. कहीं भी चैन नहीं है.'
'वे तुम्हारी देखरेख ठीक से नहीं करते?'
'करते हैं परंतु तीनों एक-दूसरे का मुंंह देखते हैं.'
'क्या मतलब?'
'बड़े के पास रहता हूं तो वह सोचता है, मैं अकेला क्यों करूं, मंझला और छोटा क्यों नहीं करते? मंझले के पास रहता हूं तो वह बड़े और छोटे की ओर देखता है और छोटे के पास रहूं तो वह बड़े और मंझले की ओर धकेलने की फिराक में रहता है. मेरा कोई ठिकाना नहीं रह गया है.'
'यह बहुत चिंताजनक स्थिति है. तुम्हारा खुद का घर है, उसमें क्यों नहीं रहते?'
'अब कहां खुद का घर? वह बिक गया.'
'अरे, कब बेच दिया?'
'चार साल हो गए, बच्चों को व्यापार के लिए पैसे चाहिए थे, घर बेचकर उन्हें दे दिया.'
'और खुद के लिए कुछ बचाकर रखा या नहीं?'
'वही गलती हो गई, सब उनके बीच बराबर-बराबर बांट कर दे दिया.'
'हे भगवान! अब हाथ में क्या है?'
'तीन लड़के.'
'और वे धता बता रहे हैं.'
'नहीं, ऐसा नहीं कह सकते लेकिन कोई भी लम्बे समय तक मुझे अपने पास रखने को तैयार नहीं है.'
'फिर?'
'फिर क्या? मैं भी बदल-बदल कर उनके घरों में रहता हूं, सबकी रसोई का स्वाद लेते रहता हूं. दरअसल, बहुएं अच्छी हैं, तीनों आदर देती हैं.'
'यह खबर तुमने अच्छी सुनाई. इस हिसाब से तुम भाग्यशाली हो, जिंदगी का मजा लो और खुश रहो.'
'अच्छा, चलता हूं.' घनश्याम ने कहा.
'ऐसे कैसे जाओगे? चाय पीकर जाओ.' ठाकुर साहब ने आवाज दी, 'दो कप चाय बनाओ, मेरे पुराने दोस्त आए हुए हैं.'
अंदर से आवाज आई, 'जी पिता जी, अभी बना कर लाती हूं.'
(चौंतीस)
घर में माथापच्ची चल रही है कि डिपार्ट्मेंटल स्टोर का क्या नाम रखा जाए? दोनों परिवार के सभी सदस्यों के नाम सामने आए लेकिन आम-सहमति नहीं हुई. अंततः 'My Family Store' के नाम पर सब सहमत हो गए.
उद्घाटन की तैयारियां शुरू हो गई. सबसे पहले स्टोर में बेचने के लिए सामानों की सूची तैयार की गई. थोक व्यापारियों की दूकानों में जाकर आर्डर दिए गए. एक सप्ताह सामान आने और उसे आलमारियों में सजाने में लग गया. इस बीच स्टाफ नियुक्त हो गए. शुभारंभ की तिथि तय हो गई. कानपुर के मेयर को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया. निमंत्रण पत्र बने और परिचितों में वितरित किए गए. अखबारों में विज्ञापन और समाचार दिए गए. शो रूम के बाहर टेंट लगाकर मंच बना, सबके बैठने की व्यवस्था बनी, 'हाई टी' का इंतजाम किया गया.
नियत तिथि और समय पर कार्यक्रम आरंभ हुआ. मुख्य अतिथि मंचासीन हुए, उनके आजू-बाजू हरीश और नेहा के माता-पिता बैठे और आखिर में हरीश स्वयंं. सबसे पहले हरीश ने माइक संभाला. 'आदरणीय महापौर जी, देवियों और सज्जनों, My Family Store के उद्घाटन के अवसर पर आपका स्वागत है. इसके आरम्भ होने के पीछे एक लम्बी कहानी है. मैं पिछले पंद्रह और मेरी पत्नी नेहा नौ वर्षों से अमेरिका में रह रहे थे. मैंने ग्रेजुएशन और पोस्ट-ग्रेजुएशन अमेरिका के सेनफ्रांसिस्को शहर से किया. उसके बाद वहीं नौकरी लग गई. अमेरिका के बारे में एक बात बताना चाहता हूं कि वह देश दुनिया के सभी देशों के लोगों का देश है. अमेरिका में रहने वालों का जीवन भारत से बिलकुल अलग है, अधिक अनुशासित, बेहतरीन साफ-सफाई और खुद में मस्त रहने वाले लोग हैं. यहां पग-पग में रिश्वत देनी पड़ती है, वहाँ बिलकुल नहीं. अमेरिका छोड़कर आने का मन नहीं था, अच्छी नौकरी थी, भरपूर वेतन मिलता था, पांच दिन की मेहनत और उसके बाद दो दिन मौज-मस्ती के. आपके मन में यह प्रश्न उठ रहा होगा कि हम लोग आखिर क्यों आ गए यहां?
मेरा मन बहुत खिन्न था अपने पिता से, जिन्हें मैं बाबा कहता हूं. कारण यह था कि मेरी पोस्ट-ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए मैंने बाबा से आर्थिक मदद के लिए कहा तो उन्होंने साफ इंकार कर दिया. मैं उनसे नाराज हो गया. उसके कई साल बाद जब हमारे घर में नया मेहमान आने वाला था तब हम लोगों की मदद के लिए मैंने इन्हें अमेरिका बुलाया था, तब भी इन दोनों ने मना कर दिया. मेरी इनसे नाराजगी दो गुना हो गई. सच बताऊं? मैंने इन्हें अपनी ज़िंदगी से सदा के लिए दूर कर दिया.
सेंफ्रांसिसको में ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दौरान मेरी दोस्ती हुई थी, प्रदीप से. वह जिगरी यार बना जब उसने मेरी पोस्ट-ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने के लिए अपने पापा से बोलकर एडमीशन फी और दो साल तक अमेरिका में रहकर पढ़ाई करने के लिए धनराशि का इंतजाम करवाया था.
उसके पापा यहीं भारत में रहते हैं, समर्थ और दयालु व्यक्ति हैं. मेरी वहां नौकरी के दौरान प्रदीप एक दिन मुझे मिला और मुझसे बोला, 'हरीश, मैं भारत वापस जा रहा हूं.'
'कैसे? यह फैसला अचानक?' मैंने पूछा.
'अचानक नहीं, बहुत दिनों से योजना बन रही थी.'
'मुझसे कभी चर्चा नहीं की.'
'नहीं बता पाया, सॉरी.'
'कोई बात नहींं. यह बताओ कि अमेरिका को छोड़कर भारत क्यों जा रहे हो?'
'मेरे मम्मी-पापा अब बूढ़े और अशक्त हो गए हैं, उन्हें मेरी जरूरत है.'
'उन्हें तुम्हारी जरूरत है, यह बात ठीक है लेकिन वहां उनकी देखरेख में नौकर रखवा दो, वे लोग देखेंगे.'
'नौकर और बेटे-बहू की देखरेख में अंतर होता है या नहीं? कितना लम्बा समय बीत गया हमें अमेरिका में रहते. जीवन के आखिरी समय में वे सूनापन झेल रहे हैं. रोज रात को सपनों में वे हमें देखते होंगे, रोजाना दिन में हमारा चेहरा उन दोनों के सामने घूमता होगा. मैं उनकी स्थिति की कल्पना करता हूं तो खुद को दोषी पाता हूं. अब मैं दोषमुक्त होना चाहता हूं.' प्रदीप ने भरे गले से बताया. कुछ दिनों बाद प्रदीप और उसका परिवार भारत पहुंच गया और जाते-जाते एक बीज मेरे दिमाग में बो कर चला गया.
उसके बाद मुझे एक अजीब सी बेचैनी महसूस होने लगी. धीरे-धीरे उस बीज में अंकुरण शुरू होने लगा, मुझे भी अपना कर्त्तव्यबोध होने लगा, बाबा और माँ की याद आने लगी. मुझे बचपन के वे दिन याद आए जब मेरे बाबा मुझे पढ़ने के लिए उत्साहित किया करते थे जबकि उन दिनों सिंधियों के परिवार में पढ़ने-लिखने को हतोत्साहित किया जाता था, कहा जाता था, 'क्या करोगे पढ़कर? दूकान में बैठो, चार पैसे कमाओ तो जिंदगी में काम आएगा.'
जब मैंने हायर सेकेंड्री की परीक्षा में टॉप किया तो वे मुझे कंधे में बिठाकर मिठाई की दूकान में ले गए और बोले, 'आज तुझे जितनी मिठाई खाना है, खा ले और जिसको भी खिलाना है, उनके लिए पैक करवा ले.'
अपनी आर्थिक अक्षमता के बावजूद बाबा ने मुझे अमेरिका पढ़ने के लिए भेजा, तीन साल तक वहां होने वाला खर्च उठाया और उन्होंने जो किया उसे मैं भूल गया और आगे की पढ़ाई का खर्च न उठा सकने की बात को याद करके रखा हुआ हूं! कैसा नाशुक्रा इंसान हूं मैं?
कई दिन उहापोह में बीते, कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं, कैसे करूं? एक रात मैंने अपनी पत्नी नेहा से अपने मन की उथल-पुथल बताई तो उसने मुझे हौसला दिया और कहा, 'चलो, वापस चलते हैं.' और, हम लोग अपने देश में अपने माता-पिता के पास रहने के लिए आ गए.
यहां आने के बाद यह समस्या थी कि हमें कहां रहना है? मध्यप्रदेश में जैतहरी नामक एक गाँव है जहां हमारा परिवार रहता है, यह जगह छोटी है, हमारे लायक कोई सम्भावना नहीं थी इसलिए देश के कई बड़े नगर हमारी नजर में थे, उनमें से कोई एक चुनना था. एक मजेदार बात यह है कि कानपुर हमारी उस सूची में नहीं था. पर कहावत है न कि जिस मिट्टी का अन्न और जल भाग्य में होता है, वहीं रहना होता है.
नेहा के घर कानपुर में अपने सास-ससुर से मिलने आया था. एक सुबह के अखबार में एक बंगला बिकने के लिए विज्ञापन देखा, उसी बंगले में आप लोग बैठे हुए हैं लेकिन अब बंगला नहीं है. पीछे हमारा घर है और आगे यह My Family Store. यहां पर मैं आप सबका स्वागत कर रहा हूँ, इस उम्मीद के साथ कि यह स्टोर कानपुर शहर के वासियों के लिए उनकी जरूरतों की पूर्ति में सहायक होगा. मैं विश्वास दिलाता हूँ कि हमारा यह नया कारोबार आपकी अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा. वैसे तो हम हिंदुस्तानी हैं लेकिन माल बेचने का हमारा तरीका विदेशी रहेगा. जैसा हमने अमेरिका में व्यापार देखा और समझा है; वहां दूकानदार का काम ग्राहक की जरूरत की समस्या का समाधान करना होता है, क्वालिटी पर कोई समझौता नहीं किया जाता, कीमत एकदम वाजिब तय की जाती है, कोई मोलभाव नहीं होता और ग्राहक की किसी भी शिकायत का तुरंत निदान किया जाता है. हमारा वायदा है कि हम अपनी ओर से व्यापार के सभी नैतिक आचरण को कायम रखते हुए आपकी सेवा करेंगे.' हरीश ने कहा.
हरीश के बाद मुख्य अतिथि महापौर ने कहा, 'देवियों और सज्जनों, My Family Store के उद्घाटन के अवसर पर हरीश जी, नेहा जी और सभी परिवारजनों को मेरी हार्दिक बधाई. कानपुर के नागरिकों के लिए खुल रहे इस संस्थान में उनकी रोज की जरूरतों का सामान प्रदान करने की यह योजना अत्यंत प्रशंसनीय है. इस अवसर पर मैं एक बात आपसे जरूर कहना चाहूंगा, हरीश जी और नेहा जी ने अमेरिका की शानदार जिंदगी को छोड़कर अपने माता-पिता की यहां आकर उनकी सेवा करने का जो निर्णय लिया है, यह विदेशों और बड़े शहरों में नौकरी या व्यापार करने वालों के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण है, उनके लिए सार्थक मार्गदर्शन है. हमारे देश में लाखों वृद्धजन अपने घरों में अपना बुढ़ापा किसी तरह काट रहे हैं. वे अशक्त हैं, बीमार हैं, उन्हें कोई देखने-सुनने वाला नहीं है. बच्चे करोड़ों कमा रहे हैं, ऐश कर रहे हैं और यहां उनके मां-बाप दवा और देखरेख के लिए तरस रहे हैं. बहुत से वृद्धाश्रम में रह रहे हैं. ऐसा भी सुनने में आया है कि उनकी मृत्यु के बाद उनके अंतिम संस्कार के लिए उनके बच्चे नहीं पहुंच सके, पड़ोसियों ने क्रिया-कर्म निपटाया. कितना दुखद है यह सब सुनना! हरीश जी और नेहा जी ने एक आदर्श प्रस्तुत किया है, उन लोगों के लिए जो अपने जन्मदाताओं को त्याग कर कहीं दूर बस गए हैं. मैं इन दोनों के इस प्रयास और सोच की भूरि-भूरि प्रशंसा करता हूं. मेरी हार्दिक शुभकामनाएं हैं कि अच्छे उद्देश्य से आरम्भ किया गया यह प्रयोग सफल हो और लाभप्रद भी.
कार्यक्रम समाप्त होने के पश्चात हरीश अपने बाबा के सामने खड़ा हो गया, बाबा रोने लगे, दोनों के बीच मौन संभाषण हुआ. हरीश ने अपने घुटनों के बल बैठ कर बाबा के चरण स्पर्श किए और उनके चरणों पर अपना माथा रखकर बड़ी देर तक रोता रहा. उपस्थित मेहमानों की आँखें भी सजल हो गई.
* * * * *
'आँख हमारी मंज़िल पर है
दिल में खुशी की मस्त लहर है
लाख लुभाएं महल पराये
अपना घर फिर अपना घर है
आ अब लौट चलें
नैन बिछाए बाहें पसारे
तुझको पुकारे देश तेरा
आ अब लौट चलें...'
-शैलेंद्र
* * * * *
(समाप्त)
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