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महाभारत और हम :

महाभारत और हम : महाकाव्य महाभारत की रचना महर्षि कृष्ण द्वैपायन व्यास की देन है जो आमजन को वेदों का ज्ञान देने के लिए 'भारत' के नाम से रची गई थी. महर्षि व्यास कहते हैं, 'मैंने इस काव्य में उपनिषदों का सार, वेदों के रहस्य और विस्तार, इतिहास और पुराणों का उन्मेष और निमेष, चातुर्ववर्ण्य का धर्म, पुराणों का आशय, ग्रह-नक्षत्र-तारा आदि का प्रमाण, न्यायशिक्षा, चिकित्सा, दान, पाशुपथ, तीर्थों और पुण्यदेशों का वर्णन तथा नदियों, पर्वतों, वनों तथा सागरों का वर्णन किया है. जो कुछ भी इस विश्व में जानने योग्य है, वह सब इस काव्य में संग्रहीत किया है.' महर्षि व्यास ने 60 लाख श्लोकों की महाभारत संहिता बनाई थी. इसके चार संस्करण थे; पहला संस्करण 30 लाख श्लोकों का था जिसे देवर्षि नारद ने देवलोक में देवताओं को सुनाया था, दूसरा संस्करण 15 लाख श्लोकों का था जिसे देवल और असित ने पितृगणों को सुनाया था, तीसरे संस्करण में 14 लाख श्लोक थे जिसे सुकदेव ने गंधर्व, यक्ष तथा राक्षसों को सुनाया था और शेष 1 लाख श्लोकों के चतुर्थ संस्करण का प्रचार मनुष्य लोक में हुआ. बचपन में मैंने सुना था कि इस ग्रंथ को को...

इसे क्यों लिखा?

इसे क्यों लिखा ?              सवाल यह है कि इस उपन्यास 'परदेसी...जाना नहीं' को मैंने क्यों लिखा?  मैं देख रहा हूं कि पहले गाँवों में पुराने घर खाली हो जाते थे, अब शहरों में भी खाली हो रहे हैं. बीसवीं सदी के मध्यकाल से, भारत में जब से ट्रेनों से आवागमन की सुविधा बढ़ी, गाँव से शहरों के लिए विस्थापन बढ़ा और व्यापार या रोजगार के लिए युवा अपना गाँव छोड़कर महानगरों, शहरों और अर्ध-नगरों में जाकर बसने लगे. यह उत्तर भारत में मारवाड़-राजस्थान, उत्तर प्रदेश और बिहार में और दक्षिण भारत में आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु और केरल में बहुत बड़ी संख्या में हुआ. पहले युवा गए, बाद में 'अपने परिवार' को वहां बुला लिया, गाँव में बुढ़ापा रह गया. जब बूढ़े मर-खप गए तब उनके घरों के दरवाजों में ताले लटक गए. खेत वीरान हो गए और उन पर दूसरे लोगों ने बेजा कब्जा कर लिया. हरे-भरे खिलखिलाते गाँव सूखी उदासी लेकर अपने व्यतीत को याद करने लगे.  बीसवीं सदी के अंतिम कालखंड में आम भारतीयों के मन में शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक रुचि उत्पन्न हुई और शिक्षित नागरिकों ने अपने बच्चों को उच्च-शिक्षा के ...

परदेसी...जाना नहीं

प रदेसी...जाना नहीं     (एक) एयर इण्डिया का वायुयान पालम के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से अमेरिका के लिए उड़ चला. डबडबाई आँखों में बेटे के विछोह का भाव था तो उन आँखों में आशा की उम्मीद भी थी, ‘हरीश का भविष्य वहां संवर जाएगा.’ दयालदास    ने धीमी आवाज में किरण से कहा. किरण रो रही थी, उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, वह सुबकते रही. जाते समय हरीश के चेहरे पर खुशी दिखाई पड़ रही थी क्योंकि वह अमेरिका पढ़ने के लिए जा रहा था, उसे क्या पता कि उसकी माँ के मन की हालत कैसी है?  अपने बच्चे को इतनी दूर भेजना, वह भी अनिश्चित काल के लिए, एक माँ के लिए कितना दुखदायक होता है, उसे केवल माँ को ही समझती है.   दोनों टैक्सी में बैठकर हज़रत निजामुद्दीन स्टेशन की ओर निकल पड़े जहाँ से उन्हें अनुपपुर जाने के लिए ट्रेन मिलने वाली थी, वहां से १४ किलोमीटर की दूरी पर उनका गाँव था जैतहरी, वहां तक जाना था.  पालम हवाई अड्डे से हज़रत निजामुद्दीन स्टेशन बहुत दूर है. रास्ते में ट्रेफिक जाम था, किसी प्रकार डेढ़ घंटे में स्टेशन आया. वहां पता चला कि उत्कल एक्सप्रेस प्लेटफार्म नंबर १२ पर आए...