तीसरी बात यह भी महत्व की है कि आँख मूँद कर या उसके रंग-रूप को देखकर उस पर भरोसा मत करो, चाहे वह भगवान ही सामने क्यों न हो क्योंकि इस कथा में वे स्वार्थी, पक्षपाती और छलिया समझ में आए.
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पृथ्वी पर दानवों द्वारा अत्याचार बढ़ जाने के कारण भगवान विष्णु से इंद्र ने आग्रह किया कि वे अवतार लेकर पृथ्वी का भार कम करें. भगवान विष्णु 'तथास्तु' कह कर सहमत हो जाते हैं और देवताओं को आदेश देते हैं कि वे प्रजा के कल्याण के लिए पृथ्वी पर अवतीर्ण हों. वे स्वेच्छानुसार ब्रह्मर्षियों और राजर्षियों के वंश में जन्म लेकर मनुष्यभोजी असुरों का संहार करने लगे. देवता, दानव, अप्सरा, यक्ष, मनुष्य, पशु, पक्षी, सर्प के रूप में कैसे इस पृथ्वी पर अवतरित हुए उसका विस्तृत विवरण इस ग्रंथ में उल्लेखित है.
कुरुवंश की स्थापना के विषय पर यह उल्लेख है कि इसकी स्थापना परम प्रतापी राजा दुष्यंत ने की थी. राजा दुष्यंत एक दिन अपनी सेना के साथ जंगल में भटकते हुए कण्व ऋषि के आश्रम में पहुंच गए. वहां कण्व ऋषि उपस्थित नहीं थे. दुष्यंत ने ऊँचे स्वर में पुकारा तो एक लक्ष्मी समान तपस्वनी स्त्री आई और उसने राजा को देखकर कहा, 'आइए, स्वागत है.' दुष्यंत उसके रूप पर मोहित होकर उससे पूछा, 'तुम कौन हो? तुम्हारे पिता कौन हैं? यहाँ किसलिए आई हो? मैं जानना चाहता हूँ.'
'मैं महर्षि कण्व की पुत्री शकुंतला हूँ.' स्त्री ने उत्तर दिया.
'असम्भव, महषि कण्व तो अखंड ब्र्ह्मचारी हैं, तुम उनकी पुत्री कैसे हो सकती हो?'
'महर्षि विश्वामित्र जब तपस्या कर रहे थे, इंद्र ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए मेनका नाम की अप्सरा को भेजा. उन दोनों के संंयोग से मेरा जन्म हुआ. मेरी माता मेनका मुझे वन में छोड़कर चली गई तब शकुंतों (पक्षियों) ने हिंस्रक पशुओं थी मेरी रक्षा की थी इसलिए मेरा नाम शकुंतला रखा गया. महर्षि कण्व मुझे वन में निस्सहाय देखकर वहाँ से उठा लाए और मेरा पालन-पोषण किया. शरीर का जनक, प्राणों का रक्षक और अन्नदाता, ये तीनों पिता कहे जाते हैं इसलिए मैं महर्षि कण्व की पुत्री हूँ.' उसने सविनय उत्तर दिया.
'तुमने मेरा मन मोह लिया है, मैं तुमसे गंधर्व विवाह करना चाहता हूँ.' दुष्यंंत ने आग्रह किया.
'मेरे पिता इस समय यहाँ नहीं है, उनकी अनुमति से ही विवाह हो सकता है.'
'लेकिन मैं यह चाहता हूँ कि तुम मुझे स्वयं वरण कर लो क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना हितैषी और जिम्मेदार होता है. यही धर्म की मान्यता है.'
'राजन, यदि यह धर्मसम्मत है तो मैं अपना दान कर सकती हूँ लेकिन इसके लिए आपको एक प्रतिज्ञा करनी होगी कि आपके बाद मेरा पुत्र ही राज्य का सम्राट बनेगा तथा आपके जीवनकाल में ही यह युवराज घोषित होगा.' शकुंतला ने कहा.
दुष्यंत ने तुरंत प्रतिज्ञा कर ली और गंधर्व विधि से शकुंतला के साथ पाणिग्रहण कर लिया. दुष्यंत ने उसके साथ समागम किया और उसे विश्वास दिलाया कि शीघ्र ही वह अपने राजमहल में उसे शीघ्र ही बुलवा लेगा. उसके पश्चात राजा दुष्यंत अपनी राजधानी हस्तिनापुर की ओर चला गया.
दुष्यंत अपने राज-काज में लग गए और शकुंतला को बुलाना ले जाना भूल गए. आश्रम में शकुंतला ने एक शिशु को जन्म दिया और वह धीरे-धीरे बड़ा होने लगा. बाल्यावस्था में ही वह युवकों जैसा बलशाली, ओजस्वी तथा विक्रमी हो गया और आश्रम में आकर्षण का केंद्र बन गया. आश्रम में उसे सब लोग सर्वदमन के नाम से पुकारते थे. जब वह बालक 6 वर्ष का हो गया, महर्षि कण्व ने शकुंतला से कहा, 'अब तुम्हारा पुत्र सर्वदमन युवराज होने के योग्य हो गया है, इसे इसके पिता के पास ले जाओ. तुम्हारा भी बहुत दिनों तक मायके में रहना कीर्ति, चरित्र और धर्म के अनुकूल नहीं है, तुम भी वहां जाओ.' तब शिष्योंं ने गुरु की आज्ञानुसार शकुंतला और सर्वदमन को हस्तिनापुर में राजा दुष्यंत के पास पहुंचा दिया.
हस्तिनापुर में पहुंचकर शकुंतला ने राजा दुष्यंत को प्रणाम करके सम्मनपूर्वक कहा, 'राजन, यह बालक आपका पुत्र है, अब इसे आप अपना युवराज बनाएं. आप अपनी प्रतिज्ञा पूरी करिए.'
राजा दुष्यंत रुष्ट होकर बोले, 'अरी दुष्ट तापसी, तू किसकी पत्नी है? मुझे तो कुछ भी स्मरण नहीं है. तेरे साथ धर्म, अर्थ और काम का कोई सम्बंध नहीं है.'
शकुंतला यह सुनकर निश्चल भाव से खड़ी रह गई, उसकी आँखें लाल हो गई, होंठ फड़कने लग गए. दुख और क्रोध से भरी शकुंतला ने कहा, 'महाराज, आप जानबूझ कर ऐसा क्यों कह रहे हैं? आपका हृदय इस बात का साक्षी है कि झूठ क्या और सच क्या है. हृदय पर हाथ रखकर सच-सच कहिए. आपका हृदय कुछ और कह रहा है और आप कुछ और. यह तो बहुत बड़ा पाप है.
मैंने आपके इस पुत्र को अपने गर्भ में धारण किया है. जब इसका जन्म हुआ तो आकाशवाणी हुई थी, ''यह बालक सौ अश्वमेध यज्ञ करेगा." यह बालक आपके अंग से उत्पन्न हुआ है, आप अपने आप को इसके रूप में मूर्तिमान क्यों नहीं देखते? भले ही मुझे छोड़ दीजिए, मैं आश्रम चली जाऊँगी परंतु यह आपका पुत्र है, इसे मत छोड़िए.'
'शकुंतले, मुझे याद नहीं है कि मैंने तुमसे पुत्र उत्पन्न किया है. स्त्रियाँ तो प्रायः झूठ बोला करती हैं, तुम्हारी बात पर भला कौन विश्वास करेगा? जा, यहां से चली जा.' दुष्यंत कहा.
'राजन, तुम कपट न करो. सत्य से बढ़कर धर्म नहीं होता, झूठ से बढ़कर निंदनीय कुछ भी नही. यदि झूठ से ही तुम्हारा प्रेम है तो मैं स्वयं चली जाऊंगी. मैं ऐसे झूठे के साथ नहीं रहना चाहती. राजन, मैं कहे देती हूँ कि चाहे तुम इस बालक को अपनाओ या न अपनाओ, मेरा यह पुत्र सारी पृथ्वी पर शासन करेगा.' इतना कह कर शकुंतला वहाँ से वापस चल पड़ी.
उसी समय सभी सभासदों की उपस्थिति में आकाशवाणी हुई, ''तुम पुत्र का पालन-पोषण करो क्योंकि तुम्हीं ने इस पुत्र का गर्भाधान किया है. शकुंतला का अपमान मत करो, वह सत्य बोल रही है. इस बालक का नाम भरत होगा."
आकाशवाणी को सुनकर महाराज दुष्यंत ने सभासदों से कहा, 'आप लोग आपने कानों से इस भविष्यवाणी को सुना है. मैं जानता था कि यह मेरा पुत्र है लेकिन यदि मैं शकुंतला के कहने मात्र से इसे स्वीकार कर लेता तो प्रजा को संदेह होता कि मैं शकुंतला के रूप से मोहित होकर उसे स्वीकार कर लिया.'
दुष्यंत ने अपने पुत्र का माथा चूमा और अपनी छाती से लगा लिया. दुष्यंत ने धर्म के अनुसार अपनी पत्नी शकुंतला का सत्कार किया और कहा, 'देवि, मैंने तुम्हारे साथ जो सम्बंध किया था वह किसी को मालूम न था. प्रजाजन तुम्हें रानी के रूप में स्वीकार कर लें इसलिए मैंने तुम्हारे साथ ऐसी क्रूरता की. अब हम दोनों एक-दूसरे के प्रिय हैं.'
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यह मनमोहक कथा महाभारत में इसी प्रकार वर्णित है जबकि आम तौर पर राजा दुष्यंत द्वारा दी गई एक अँगूठी को शकुंतला द्वारा दिखाने की बात प्रचलित है.
पहली बात यह है कि कामातुर पुरुष अपने वाणी कौशल से स्त्री को अपनी बात मनवाने में सफल हो जाता है और स्त्रियाँ उसके कहने पर आ जाती हैं जो भविष्य में घातक सिद्ध होती हैं इसलिए स्त्रियों को पुरुषों की लुभावनी बातों पर सहमत नहीं होना चाहिए.
दूसरी बात यह है कि शकुंतला ने जो शर्त रखी थी कि 'उनसे उत्पन्न पुत्र को राजा घोषित किया जाए' यह समझ में नहीं आया कि उसे यह कैसे पता था कि उनकी उत्पन्न संतान लड़का होगा, लड़की नहीं.
तीसरी बात यह है कि दुष्यंत ने शकुंतला से गंधर्व विवाह किया था और उसे छः साल तक शकुंतला को बुलाने की सुध नहीं आई, ऐसा कैसे सम्भव है जबकि वन से लौटते समय उसने शकुंतला को आश्वस्त किया था कि वह उसे राजधानी बुला लेगा.
और, यदि आकाशवाणी न हुई होती तो शकुंतला और उसके बालक का क्या होता?
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इन्हीं के वंश में आगे चल कर कौरव और पाण्डव का जन्म हुआ था जिनके मध्य हुए विवाद और युद्ध की कथा का विवरण महाभारत में किया गया है.
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